Category: Films

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असभ्य होते समाज और पूंजीवाद पर कटाक्ष करती एक “मास्टरपीस” है “जोकर”

फ़िल्म जगत में जब पॉप कल्चर की बात आती है तब अधिकतर उस एक हिस्से को याद किया जाता है जहाँ खुद के भीतर की प्रतिभा कमाई का एक साधन

काव्य समीक्षा: कुछ बातें मन की

मनीष मूंदड़ा से मेरा परिचय क़रीब ६ वर्ष पुराना है। पहले मैं इन्हें एक सफल उद्योगपति और एक कुशल फ़िल्म प्रोड्यूसर के तौर पर जानता था, धीरे ट्विटर की कृपा

ताशकंद फाइल्स: रहस्य और षडयंत्र

रविवार की एक दोपहर मेरे पिता ने मुझे यह फिल्म देखने के लिए प्रोत्साहित किया. साफ-साफ कहूँ तो इस फिल्म से मेरी अपेक्षाएं अधिक नहीं थी लेकिन फिल्म देखकर मैं खिल

लोकतंत्र को ममता से खतरा है

लोकतंत्र खतरे में था, है और तब तक रहेगा जब तक राजनीतिक स्वार्थ से हटकर राजनीतिक दल नहीं सोचते. लोकतंत्र को खतरा पूरे भारत में नहीं बल्कि देश के कुछ