गरीबों पर मार नहीं बल्कि एक सकारात्मक प्रयोग है “तेजस एक्सप्रेस”

विकास अपने साथ नई संभावनाएं लाता है. ऐसी संभावनाएं जिसको समझने के बाद आप अपनी जीवनशैली में एक सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं. मगर उस विकास का क्या करना जहां लोग ही आपको गरीबों का दुश्मन बताएं. इस देश में शायद यही होता आया है. बचपन से हमने कई लोगों के मुंह से सुना था कि “यह तो अमीरों का काम है” तो किसी ने कहा होगा कि “यह अमीरों के लिए है”. तेजस एक्सप्रेस को लेकर भी यही भ्रांति अपनाई जा रही है. तेजस एक्सप्रेस इस समय कई लोगो को आकर्षित कर रही है.

लखनऊ से दिल्ली तक चलने वाली ये तेजस एक्सप्रेस भारतीय रेलबे की पहली कॉर्पोरेट ट्रेन है. यानी यह एक ऐसा प्रयोग है जिसमें भारतीय रेलवे यह देख रहा है कि क्या कुछ रुट्स पर भारतीय रेलवे प्राइवेट ट्रेन भी चला सकती है या नहीं. सबसे पहले हम इसकी सेवाएं देख लेते हैं. सुबह 6:30 से लखनऊ से चलने वाली ट्रेन दोपहर के 12:30 बजे दिल्ली पहुंचाएगी. इसी रूट में कानपुर और ग़ाज़ियाबाद भी पड़ेगा जहां ट्रेन रुकेगी. शाम को 4:30 बजे नई दिल्ली से यह चलेगी और रात 10:45 पर लखनऊ पहुंचाएगी. हफ्ते में 6 दिन चलने वाली यह ट्रेन मंगलवार को छुट्टी पर रहेगा. लेकिन सबसे मजेदार बात ये है कि ये देश की पहली ट्रेन है जो लेट होने पर मुआवज़ा भी देगी. एक घण्टे देरी पर 100 रुपये और 2 घण्टे या उससे अधिक देरी पर 250 रुपये. वहीं 25 लाख का फ्री इंश्योरेंस के साथ ही सामान पिकअप और ड्राप करने की सुविधा भी यहां मिलेगी, बस उसके लिए आपको पैसे भरने होंगे. इसमें आपके घर से सामान उठाकर आपकी सीट के नीचे रख दिया जाएगा और यात्रा खत्म होने पर ठीक वैसे ही आपके घर भी पहुंचा दिया जाएगा.

इसके टिकट्स आप IRCTC पर ही बुक करा सकते है. रेलवे काउंटर पर इसके टिकट्स नहीं मिलेंगे तत्काल और प्रीमियम तत्काल जैसी सुविधा भी इसमें नहीं होगी. इसके टिकट्स यदि आप चाहें तो 60 दिन पहले ही बुक करा सकते हैं. वहीं आप पूरी बोगी भी बुक कर सकते हैं जिसमें 78 सीटें (AC चेयर कार) होंगी. यानी एक टिकट का दाम हम 1 हज़ार भी लगाएं तो पूरी बोगी का हिसाब बैठेगा 78 हज़ार रुपये (वैसे ये असलियत में 1 लाख से ऊपर ही जायेगा). टिकट कैंसिल करने पर भी आपके पैसे कटेंगे, लेकिन सामान्य ट्रेनों से थोड़ा कम. इसमें कैटरिंग की सुविधा हवाई जहांज के तर्ज पर होगी जिसमें चाय कॉफ़ी की मशीन के साथ ही नाश्ते की भी व्यवस्था होगी. हर सीट के आगे LCD स्क्रीन, मोबाइल चार्जर, रीडिंग लाइट्स जैसी सुविधाएं होंगी और इन सबके पैसे आपको नहीं देने है.

इसके अंदर किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार, छूट या ड्यूटी पास है ही नहीं. इसका शुरुआती किराया ₹1,125 (₹895 बेस फेयर, ₹185 कैटरिंग, ₹45 GST) वहीं एग्जीक्यूटिव चेयर का किराया ₹2,310 (₹1966 बेस फेयर, ₹99 GST, ₹245 कैटरिंग) है. वहीं दिल्ली से लखनऊ का सबसे सस्ता टिकट ₹1280 रुपये का है. वहीं ₹2,450 एग्जीक्यूटिव कार का सबसे सस्ता दाम है. इसमें डायनामिक फेयर (फ्लेक्सी फेयर) का भी कांसेप्ट है जिसमें सीटों की बुकिंग के हिसाब से किराया बढ़ता जाएगा. यही चीज़ एयर लाइन्स में भी होती है लेकिन वहां समय के हिसाब से यह बढ़ता है. एग्जीक्यूटिव AC चेयर कर और AC चेयर कार जैसी सिर्फ 2 तरह की ही बोगियां इसमें होंगी, यानी कोई जनरल बोगी इसमें नहीं होगी. AC चेयर कार के डिब्बे (9) एग्जीक्यूटिव चेयर कार (1) के डिब्बों से ज़्यादा होंगे. इनमें क्रमशः 78 और 56 सीटें होंगी. दोनों ही तरह की बोगियों के दरवाजों पे सेंसर लगा होगा, जैसे आप मेट्रो में देखते हैं. हर सीट के नीचे एयर प्लेन की तर्ज़ पर एक बटन भी होगा जिसको दबाकर कोच अटेंडेंट को बुलाया जा सकेगा. इसके दरवाजों का कंट्रोल भी लोको पायलट के पास रहेगा.

अब इतनी सुविधाओं के साथ यह तो तय है कि इसके मेंटेनेंस और रखरखाव के लिए भी पैसे चाहिए होंगे? चूंकि यह एक प्रयोग है तो इसको उस नज़रिए से बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए जिसमें सबकी ज़िम्मेदार सरकार ही होती है.

अब यहां बात आती है लोगों के विरोध की. कुछ लोगो का इतना किराया देखकर ऐसे मुंह बना हुआ है जैसे यह सरकार द्वारा कोई लूट की जा रही हो. भारतीय रेलवे एक ऐसी संस्था है जिसको प्रॉफिट में लाने के कई प्रयास किये जाते रहे हैं. लेकिन लोगों का कहना है कि यह गरीबों के साथ मजाक है और इसमें कुछ जनरल बोगियां भी जोड़ी जानी चाहिए. आखिर गरीबों का क्या होगा? क्या वो ऐसी सुविधाएं पाने के हकदार नहीं है. बात सही भी है. गरीबों का क्या होगा यह एक मूल प्रश्न है, मगर यहां बात सिर्फ यात्रा की नहीं है, बल्कि सुविधाजनक यात्रा की है. कोई भी प्रश्न पूछने से पहले यह ज्ञात रहना चाहिए कि कोई भी गरीब इतनी महंगी यात्रा की नहीं सोचता.

एक समय मध्यम वर्गीय परिवार (छोटा परिवार) इस ट्रेन में सफर अवश्य कर सकता है, और करेगा भी, लेकिन एक गरीब के लिए सफर करना ही बहुत बड़ी बात होती है. लेकिन दो अलग अलग बातों को आपस में मिलाकर कई लोगों द्वारा एक भावनात्मक अलगाव पैदा किया जा रहा है. एयरलाइन्स की मौजूदगी क्या गरीबों को चिढ़ाती है? बिल्कुल नहीं. दरअसल उन्हीं एयरलाइन्स के चलते न जाने कितने गरीबों की दो वक्त की रोजी रोटी चलती है. ठीक वैसा ही इंडियन रेलवेज भी जितना बढ़ेगा उतना ही नई संभावनाओं का आकार बढ़ता जाएगा. दिक्कत वहां आती है जहां यह यक्ष प्रश्न पूछकर हो रहे विकास को बौना करने का प्रयास होता है कि आखिर इसने पंक्ति में आखिरी खड़ा व्यक्ति कहाँ जाएगा?

दिल्ली और लखनऊ जैसे महानगरों के बीच भारतीय रेलवे की करीब 70 से ज़्यादा ट्रेनें चलती हैं. इसमें हर प्रकार के डिब्बे मौजूद होते हैं. देश का अमीर से अमीर और गरीब से गरीब व्यक्ति इन ट्रेनों में सफर कर सकता है. पिछले 5 सालों में कई ऐसी नई ट्रेनें हैं जो रेलवे द्वारा इन दो रूट पर चलाई गई हैं. यह बताती हैं कि देश के अंदर ट्रेनों की कोई कमी नहीं है. लेकिन हां, उस विचारधारा से व्यक्ति कैसे लड़े जिसमें हर एक हर एक बड़ी ट्रेन को उसके किराए से लेकर तौल दिया जाता है. एक बात यह है कि अगर देश के अंदर विकास हो रहा है तो उसका सबसे बड़ा कारण देश के आर्थिक व्यवस्था का और सुदृढ़ होना है. किसी भी नए बदलाव को सकारात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि देश के गरीबों को दरकिनार कर दिया जाए लेकिन एक कॉर्पोरेट ट्रेन कभी भी सरकारी व्यवस्था के अनुसार नहीं चलती. उसका मुख्य उद्देश्य ही लाभ प्राप्ति होता है. देश के अंदर चल रही कितनी ही कंपनियों का मुख्य लक्ष्य ही लाभ प्राप्ति होता है. तो इसका मतलब यह नहीं कि वह गरीबों का खून चूस रहे हैं, बल्कि उन्हीं व्यवस्था के अंतर्गत कई सारे गरीबों के घर चल रहे हैं. किन्हीं दो व्यवस्थाओं के बीच तालमेल से ही एक बड़ी व्यवस्था चलती है. एक शॉपिंग सेंटर के अंदर भी एक ही तरीके के कई प्रोडक्ट मौजूद होते हैं लेकिन उस शॉपिंग सेंटर में गया हुआ एक व्यक्ति अपने अनुसार कोई भी प्रोडक्ट खरीदता है. हमारी ट्रेन की व्यवस्था भी कुछ ऐसी ही है.

तो कृपया एक सकारात्मक बदलाव को छोटे नज़रिए से न देखें. यह भारतीय रेलवे की व्यवस्था और उसके स्तर को सुधारने का एक विषय है. खुद BSNL छोड़कर वोडाफोन का इंटरनेट चलाने वाले तो कम से कम यह ज्ञान न ही दे कि देश का “प्राइवेटाइजेशन” हो रहा है

2 Comments

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    राघवेंद्र
    October 7, 2019 - 6:39 am

    आपकी सभी बातें सही हैं बस मेरा एक प्रश्न है कि उसी ट्रैक पर जब बाकी ट्रैन लेट होती हैं तो फिर तेजस समय पर कैसे पहुंचेगी । यदि नही पहुंची तो यात्रियों को मुआवजा मिलेगा तो फिर ट्रैन घाटे में जाएगी । जो कि निजीकरण में घाटा क्यों सहेंगे ।
    दूसरा हमेशा यही होता रहा है कि सरकार ही सरकारी चीजों को तरजीह नही देती है नोटबन्दी में ग्राहक सरकारी बैंकों के ज्यादा थे लेकिन नगदी प्राइवेट के हाथों में ज्यादा पहुंच रही थी । तो क्या ऐसा नही होगा कि तेजस के लिए बाकी ट्रैन को लेट करवाया जाएगा ।।

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    Bheesham Kumar
    October 7, 2019 - 7:39 am

    Kya yahi prayog sarkari trains ke saath nahi ho Sakta tha? Iski vajah baki sarkari trains late hongi kyoni is train ke liye baki trains Ko rok diya jaega. Ya late Kiya jaega. Agar ye proyog Safal Raha to baki trains main lagu Kiya jaega. Iss se govt Ko privitation kerne ka bahana mi jayega. Or sarkari karmchariyon Ko zabardasti vrs de ker nikala jaega. Or phir train Ko Tata Ambani Ko diya jaega chalane ke liye. Or phir facility ke Naam per Janta se loot hogi. Tab tum jeese log zimmedar honge

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