छगनलाल हलवाई मत बनें रवीश जी!

छगनलाल हलवाई की एक दुकान थी. मोहल्ले में अकेली दुकान होने के चलते उसके यहाँ ज़्यादातर ग्राहक आते थे. 10 साल दुकान इतनी बढ़िया चली की मोहल्ले के बड़े लोगों से उनकी जान पहचान भी हो गयी. अब रुतबा इतना बड़ा हो चला कि पांच सितारा होटल के मालिकों के साथ भी जान पहचान हो गयी. बढ़ते हुए रुतबे में छगनलाल ने अपनी ही मिठाइयों में मिलावट भी शुरू कर दी. ग्राहक ऐसे थे कि उन्होंने कभी मिठाइयों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया. लेकिन अचानक से मोहल्ले में एक के बाद एक नई दुकान शुरू हो गयी.

छगनलाल की दिक्कत यह थी कि पहले विकल्पों की कमी का जो लाभ उसको मिलता था, वह मिलना बंद हो गया. स्थिति यह हो चली की बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा में छगनलाल का बिजनेस गिरता चला गया और एक दिन ऐसा आया जब दुकान बिकने का समय आ गया. रुतबेदार लोगों की भी हालत कुछ खस्ता थी. आज छगनलाल लोगों को ये बताता चल रहा है कि मिठाईयां कितनी खराब होती है. और उसको बना कर बेचने वाले तो और भी ज़्यादा खराब. छगनलाल ने आज भी मिठाईयां बेचना बंद नहीं किया है. अंतर बस इतना है कि आजकल वो हर डब्बे के ऊपर ये लिखकर बेचता है कि “मिठाईयां सेहत के लिए अच्छी नहीं होती. इनको मत खरीदो!”

असल जीवन में भी हमारे रवीश कुमार का यही हाल है. आज कल वह लोगों को यह बताते चल रहे हैं कि क्या खबर देखें, और क्या न देखें. जबकि वह खुद खबर चलाते हैं. उनका कहना है कि आजकल पत्रकारिता का स्तर गिर चुका है, जबकि वह खुद एक पत्रकार है. एक समय में उनका प्राइम टाइम बहुत रोचक लगता था. आज कल स्थिति यह है कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो सरकार के विरुद्ध एक खीझ निकाल रहे हैं. सरकार का विरोध करना कोई गलत बात नहीं है. बात यहाँ यह आती है कि जब आप अपने ही क्षेत्र के लोगों को चरित्र प्रमाण पत्र देने लगते हैं. आप वही कार्य कर रहे हैं जो आपको खुद पसंद नहीं है. किसी भी मीडिया चैनल को कोई भी प्रमाण पत्र दिया जा सकता है, सार्वजनिक जीवन में लोग ऐसा आमतौर पर करते भी हैं, लेकिन जब आप खुद रमन मैग्सेसे अवार्ड विजेता हैं और देश के बड़े लोग आपको सुनते हैं, आपके बात रखने के तरीके और उसके असर को वो महसूस कर सकते हैं, तो वहाँ बोलने से पहले ज़रूर यह सोचना चाहिए कि क्या बोला जा रहा है.

जब किसी सार्वजनिक सभा में लोग आपको “मीडिया पर भरोसा न करने” की बात करते सुनते हैं तब वह आपस में यही बात करते होंगे कि “रवीश कुमार तो कहते हैं कि न्यूज़ चैनल नहीं देखना चाहिए.” और फिर वही लोग अगले दिन अखबार के पन्ने पर रवीश का प्राइम टाइम देखने का विज्ञापन देखते हैं. आपकी बात वहां कमज़ोर पड़ जाती है. यह नहीं कहा जा रहा है कि आपके क्षेत्र में गलतियां नहीं हो रही. पत्रकारिता पर नित नए आरोप लगते आये हैं और विडंबना यह है कि यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और बना रहेगा. पत्रकारों को भी सीमाओं का ध्यान देना चाहिए. सवाल पूछने वाले भी सवालों से परे नहीं हैं. लेकिन एक तबके ने यह मान लिया है कि वह सवालों के परे हैं. और उसी एक श्रेणी में दुर्भाग्यवश आप भी अब आने लगे हैं. कल को ऐसा न हो कि लोग आपको भी छगनलाल हलवाई बोल दे.

दो मापदंडों पर चलने में कोई अच्छी बात नहीं है. यह आपके ही स्तर को नीचा गिराता है. जब आपके मुख से यह बात सुनते हैं कि एक विशेष समाज के विरुद्ध साज़िश हो रही है तब लोग आपकी उस बात पर भी ध्यान देते हैं जहां आप एक खास राजनैतिक विचारधारा को मानने वाले लोगों से दूर रहने की बात करते हैं. अगर वो नफरत फैला रहे हैं तो आप भी कहीं न कहीं तो उनके विरुद्ध एक नफरत का माहौल बना रहे हैं जहां आप लड़कियों को यह बताने लगते हैं कि किससे विवाह करें और किससे नहीं? उसके बाद तो आप यह भी प्रमाण पत्र देते हैं कि वो अच्छा पति, भाई और प्रेमी बन सकता है या नहीं? यह आपकी व्यक्तिगत सोच हो सकती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि यही सच हो.

वैश्विक आतंकवाद के चलते अब दुनिया ये जान चुकी है कि आतंकवाद की सोच और उसकी विचारधारा का मूल रूप कहाँ से उत्पन्न होता है. मगर चूंकि हमारे यहां यह एक संवेदनशील मामला है (और बात सही भी है) तो कोई उस विषय पर हाथ नहीं डालता. सब छूकर निकल जाते हैं. लेकिन कुछ लोग हैं जो उस विचारधारा को सीधे शब्दों में बोल देते हैं. यही तो आखिर अभिव्यक्ति की आज़ादी है जिसकी पैरोकारी में आपने स्क्रीन काली की थी. किसी के विचारों को आप संवाद से ही सुधार सकते हैं या गलत सिद्ध कर सकते है. यहां तो आप युवाओं को संवादहीनता की तरफ धकेल रहे हैं जहां एक खास विचारधारा को छूना भी शायद सेकुलरिज्म के विरुद्ध होने जा रहा. यही बात बेहद कष्टदायक है.

आपके विचारों को मानने और सम्मान देने वाला एक बड़ा तबका देश के अंदर है. देश की राजनैतिक स्थितियों को देखकर आप भले ही कुछ भी बोलें लेकिन बात वहीं आकर अटकती है कि इस देश में ऐसे भी लोग हैं जो आपसे इत्तेफाक नहीं रखते और आपके विचारों का समर्थन नहीं करते. उनका जीने का अपना अलग तरीका है. लेकिन यह किसी मायने में उनको गलत तब तक सिद्ध नहीं करता है जब तक वो कुछ देशविरोधी गतिविधियों में शामिल न हो. निश्चित रूप से देश में नफरत का बीज बोना देशद्रोह की श्रेणी में आता है, लेकिन उसका सर्टिफिकेट कौन देगा? ये देश या फिर आप? इस देश ने इंदिरा गांधी को भी गद्दी पर बैठाया है और नरेंद्र मोदी को भी. इस देश की बौद्धिक गुणवत्ता को कम से कम IT सेल के साथ मत तौलिए. अच्छा नहीं लगता.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *