रामायण और पृथ्वी पर पहला ग्रीन ऐक्टिविज़म

शोर्दूला मुखर्जी लिखित सर्ग-हारा रामायण से लक्षमण-शक्ति प्रसंग…

….और फिर लंकानरेश श्री रावण के महान पुत्र परम बलशाली आदरणीय मेघनाद दा ने राम के भाई लक्षमण को नागपाश में बाँध दिया. राक्षसों ने मिलकर मेघनाद दा को लाल सलाम किया और उनके अमर होने के लिए नारे लगाए. साथ ही दो-तीन नारे साम्राज्यवाद और जॉर्ज वॉशिंगटन के विरुद्ध भी लगे।

उधर राम की छावनी में हड़कंप मचा था. अब क्या हो? कैसे हो? लक्षमण को जीवित कैसे किया जाय? इन सब मुद्दों पर चर्चा के लिए सुग्रीव के पोलित ब्यूरो की बैठक हुई. कुछ सदस्य चाहते थे कि हनुमान जी के लाल लंगोट के रंग का एक ध्वज पोलित ब्यूरो के कार्यालय में लगाया जाय परंतु हनुमान जी ने ऐसा करने से रोक दिया.

जामवन्त ने प्रस्ताव रखा कि किसी वैद्य की खोज हो. उनके बीच बाबर की शक्ल …सॉरी…बानर की शक्ल में बैठे लंकानरेश, त्रिलोक विजेता, परम बलशाली रावण जी के गुप्तचर ने पोलित ब्यूरो चीफ़ जामवन्त जी को गुमराह करने की कोशिश यह कहते हुए की कि; वैद्य वग़ैरह से अच्छा है कि किसी एम बी बी एस, एम डी से लक्ष्मण जी का इलाज करवाया जाय क्योंकि वैद्य वग़ैरह मूलतः क्वैक होते हैं.

तब पोलित ब्यूरो के वरिष्ठ सलाहकार विभीषण बोले; महावैद्य सुखेन ही लक्ष्मण जी को पुनः जीवित कर सकते हैं.

फिर क्या था, हनुमान जी गए और उन्होंने महावैद्य सुखेन जी से प्रार्थना की कि वे संकट की इस घड़ी में राम और लक्ष्मण का साथ दें. महावैद्य सुखेन हनुमान जी के साथ आए. उन्होंने लक्ष्मण की नाड़ी पकड़कर उन्हें देखा. फिर बोले; इनकी रक्षा मात्र संजीवनी बूटी से हो सकती है. आप में से किसी को जाकर संजीवनी बूटी लानी होगी.

जामवन्त ने हनुमान जी की ओर देखा. हनुमान जी समझ गए कि बूटी लाने उन्हें ही जाना होगा. उन्होंने राम का नाम लिया और उड़ पड़े संजीवनी लाने.

उड़ते उड़ते वे द्रोणगिरि पर्वत पर जा पहुँचे. वे वहाँ पहुँचे और संजीवनी को पहचान लिया. परंतु वहाँ के ग्रीन ऐक्टिविस्ट नहीं चाहते थे कि वे वहाँ से संजीवनी लेकर लंका जाएँ. इन ऐक्टिविस्ट ने पहले राम और हनुमान के विरुद्ध नारे लगाए और हनुमान जी को रोकने का भरसक प्रयास किया. परंतु जब चार-पाँच पर हनुमान जी की गदा का प्रहार पड़ा तब वे डर गए. जब उन्हें और कोई मार्ग दिखाई नहीं दिया तो अंत में हर ग्रीन ऐक्टिविस्ट संजीवनी से जाकर लिपट गया. हनुमान चाहते तो एक एक को मार सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और मन ही मन पूरा पर्वत ही लंका ले जाने का निर्णय लिया और जय श्रीराम का नारा लगाते हुए पर्वत ही उखाड़ लिया.

वाल्मीकि जी की परिकल्पना कि हनुमान जी संजीवनी को पहचान नहीं पाए इसलिए पूरा पहाड़ ही लेकर लंका चले गए सही नहीं है. उनके पहाड़ को उखाड़ने के पीछे वहाँ के ग्रीन ऐक्टिविस्ट का संजीवनी से चिपकना ही एकमात्र कारण था.

प्रसिद्ध माओवादी विचारक और बीसवीं सदी में हिंदू धर्म के अविष्कार पर टीका लिखनेवाले वाले सूमू दा ने भी इसबात की पुष्टि करते हुए लिखा है कि;

विश्व का पहला ग्रीन ऐक्टिविज़म द्रोणगिरि पर्वत से ………..

Shiv Kumar Mishra
Senior Reporter Lopak.in @shivkmishr

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