पर्यावरण को नुकसान या प्रदूषण में कमी की वजह बनेगा मुंबई मेट्रो फेस 3?

3,166 एकड़ में फ़ैली आरे मिल कॉलोनी आजकल कुछ ज्यादा ही चर्चाओं में है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यहां करीब 2100 पेड़ काटने के आदेश दिए गए हैं. मुंबई का इलाका जिसको मुंबई का फेफड़ा भी कहा जाता है, वो इस समय एक आंदोलन का गवाह बन रहा है. दरअसल हमारे देश के अंदर बातें जितनी सीधी दिखती हैं, वह होती नहीं है. विकास के साथ प्रकृति को भी लेकर चलना और इन दोनों में ही सामंजस्य बैठाना बेहद कठिन कार्य होता है.

विश्व भर में बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं को देखने के बाद जब आप भारत की प्राथमिकताओं को देखते हैं तब आपको यह तय करना पड़ता है कि आने वाले समय में हमें कहां तक पहुंचना है. किसी भी एक चीज का लक्ष्य निर्धारण करने के बाद आपको उस पथ पर निरंतर बढ़ते रहना चाहिए. लेकिन जब बात देश चलाने की हो रही हो तो वहां पर हर राज्य का देश की तरक्की में सहयोग बेहद आवश्यक होता है. छोटी-छोटी छोटी चीजों को लेकर ही कुछ बड़ा किया जा सकता है. मुंबई का मेट्रो प्रोजेक्ट भी उन्हीं में से एक है.

आरे मिल कॉलोनी में 4 अक्टूबर को पेड़ों की कटाई रोकने की आखिरी उम्मीद भी हाई कोर्ट द्वारा खत्म कर दी गयी जिसके बाद लोगों का एक हुजूम उन पेड़ों को कटने से रोकने के लिए जंगल तक जा पहुंचा. गोरेगांव में उपस्थित आरे मिल कॉलोनी वह जगह है जहां फिल्म-सिटी भी मौजूद है. यह कॉलोनी मुख्यतः डेरी के उत्पाद और उनसे जुड़े कार्यों को बढ़ावा देने के लिए बसाई गयी थी. 4 मार्च 1991 को जवाहर लाल नेहरू ने वहां एक पौधा लगाकर इस कॉलोनी की नींव रखी थी. संजय गांधी नेशनल पार्क से जुड़कर यह इलाका और हरा भरा हो गया.

इसकी कुछ ज़मीन केंद्र और कुछ राज्य में बटी हुई है. साल 2014 में जब वर्सोवा से घाटकोपर तक मुंबई मेट्रो का पहला फेस खोला गया तब इसको आगे बढ़ाने के भी सुझाव आने लगे थे. अब दिक्कत ये हो गयी कि मेट्रो कोच पार्किंग के लिए जगह तलाशी जाने लगी जिसका उत्तर आरे के जंगल निकल कर आये. यही पर फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) बनाने की मांग की गई. इसके बाद लोगों को समझ में आया कि जंगलों की क्या कीमत होती है. आरे बचाने के लिए NGT को चिट्ठियां लिखी गयी जिसके बाद एक याचिका दायर की गई.

ऐसा नहीं कि आरे के जंगलों के अलावा किसी दूसरे इलाके की खोज करने को नहीं कहा गया. साल 2017 के फरवरी माह में देवेंद्र फडणवीस ने इस इलाके के अलावा कोई और जगह तलाशने को कहा था लेकिन बात बनी नहीं. मुंबई यूनिवर्सिटी के जिस इलाके को चिन्हित किया गया था वह तकनीति कारणों से ठीक नहीं था. बात पलट कर वही आई कि इलाके के रूप में बस आरे के जंगल ही सही स्थान हैं. वैसे ये जंगल असल में जंगल है ही नहीं क्योंकी इसकी स्थापना तो व्यापारिक कार्यों के लिए हुई थी. यही कारण था कि कोर्ट ने किसी भी याचिका पर सुनवाई से मना करते हुए पेड़ों की कटाई पर स्टे लगाने से मना कर दिया. उसने भी इसको जंगल मानने से इनकार कर दिया. भारत में मेट्रो के जनक कहे जाने वाले ई.श्रीधरन ने भी यही बात कही की मेट्रो का प्रोजेक्ट एक इको-फ्रेंडली प्रोजेक्ट है जिससे पर्यावरण को नुकसान नहीं अपितु लाभ होगा.

लाभ कैसे होगा इसकी भी चर्चा कर लेते हैं. दरअसल मुंबई लोकल ट्रेनों में करीब 7.5 मिलयन लोग रोज़ सफर करते हैं. इससे न सिर्फ उन ट्रेनों में लोड बढ़ता है बल्कि प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है. बाकी जो लोग बचते हैं वह ओला या उबर जैसी कम्पनियों के सहारा लेते हैं. स्पष्ट सी बात है कि अब यह दोनों ही चीज़े पानी से तो चलती नहीं हैं. इसके लिए भी पेट्रोल और डीज़ल की आवश्यकता पड़ती है. यहीं से अधिक प्रदूषण की सम्भवनाएँ बढ़ती हैं. मेट्रो आने से इसमें कमी आएगी, ऐसी सम्भवनाएँ जताई जा रही हैं. वहीं गति में भी तेजी दिखाई ज़रूर पड़ेगी. कमाल की बात यह है कि जो फ़िल्म सिटी यहां पर मौजूद है, वह भी एक बड़ा क्षेत्रफल घेरे है. तो बात यह आती है कि आखिर दोहरे मापदंड क्यों?

वहीं अगर बात पेड़ कटने की है तो खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि इसके एवज में एक पेड़ की जगह 4 पेड़ लगाए जाएंगे. लेकिन किसी को उससे मतलब नहीं. सबको आरे की पेड़ों की कटाई रोकनी है. पर्यावरण को नुकसान नहीं होना चाहिए, लेकिन पर्यावरण के साथ सामंजस्य बैठाते हुए विकास की तरफ आगे बढ़ते रहना है. यह नगत सही है कि मुंबई में कई ऐसे बंजर इलाके हैं जहां पर मेट्रो के प्रोजेक्ट्स चलाये जा सकते हैं लेकिन तकनीकी रूप से वह सही नहीं होगा. यदि ऐसा होता तो वह पहले ही कर लिया जाता. वहीं मुंबई लोकल चलाने के लिए रेलवे पिछले तीन साल से 4000 करोड़ का नुकसान झेल रहा है.

दरअसल पर्यावरण बचाना सिर्फ एक मुहिम का नहीं बल्कि एक आदत का नाम है. एक इलाके को बचा कर आप पर्यावरण की पूरी तरह से रक्षा नहीं कर सकते हैं. इतने पेड़ों का कटना निश्चित रूप से दुखद है और इसमें कोई संदेह नहीं है लेकिन क्या हम प्रदूषण फैलाने में अपना योगदान नहीं देते? जैसे आपकी दैनिक आवश्यकताएं हैं वैसे ही एक शहर की भी कुछ दैनिक आवश्यकताएं होती हैं जिसकी पूर्ति समय रहते होनी चाहिए. विकास समय की मांग है. इससे न सिर्फ लोगों के समय की बचत होगी बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषण से बचेगा.

अब यह आपको तय करना है कि आप क्या पक्ष लेना चाहते हैं.

5 Comments

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