सोशल मीडिया पर “सस्ता नैरेटिव” सेट करती कांग्रेस!

सोशल मीडिया की सबसे खास बात यह है कि यह विचारो से भी तेज़ एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाता है. यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सोशल मीडिया इस समय पूरी दुनिया का नैरेटिव सेट कर रहा है. इसी सोशल मीडिया ने बहुत लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अगर वो कुछ गलत कहेंगे तो उनकी एकबार की गलती करोड़ों बार सोशल मीडिया पर दोहराई जाएगी. पीयूष गोयल जी के साथ भी यही हुआ. हालांकि उनके तथ्यों को अपने तरीके से बताया गया, ताकि वो “प्रोपगंडा” काम करे जिसको चलाने का पिछले 5 वर्षों से प्रयास किया जा रहा है.

कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल आज बोर्ड ऑफ ट्रेड मीटिंग में थे. वहां केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी भी बैठे हुए थे. अपने विचारों को बताते हुए पीयूष गोयल ने कई उपाय सुझाये. ज़ाहिर सी बात है कि नई पीढ़ी को बढ़ावा देने के लिए कुछ न कुछ तो करने की आवश्यकता अवश्य है. लेकिन इस दौरान सबसे आवश्यक बात यह होगी कि किस प्रकार से मनोवैज्ञानिक तरीके से युवाओं को इस क्षेत्र में और उत्साहित किया जाए. इसी तरफ ध्यान देते हुए पीयूष गोयल जी ने एक पंक्ति कही, जिसको अब एक “नैरेटिव” के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. पीयूष गोयल जी ने कहा – “आइए! एकसाथ मिलकर एक नए आईडिया, नए उत्साह और नए तरीके से इस देश की तरक्की के लिए कार्य किया जाए और यह सिद्ध किया जाए कि कुछ भी नामुमकिन नहीं है ताकि 1 ट्रिलियन डॉलर्स के टारगेट को छुआ जा सके. ज़्यादा गणित में मत जाइए. उस गणित ने ग्रैविटी की खोज करने में आइंस्टाइन की सहायता नहीं की.”

आखिरी पंक्ति पढ़कर आपको थोड़ा आश्चर्य हुआ होगा. आपको लगा होगा कि आखिर एक केंद्रीय मंत्री ऐसे कैसे कह सकते हैं. लेकिन क्या हो यदि आपको पूरी बात बताई ही न जाये. क्या हो यदि आपको सिर्फ एक पंक्ति के आधार पर एक पूरे व्यक्ति का बुद्धि परीक्षण करने को कहा जाए. ज़ाहिर सी बात है कि आपको इसमें पीयूष गोयल ही मूर्ख लगे. नैरेटिव ऐसे ही काम करता है.

अब जरा सोचकर देखिये की आप एक केंद्रीय मंत्री हैं. आपको एक कार्यक्रम में न केवल अपने विचार प्रस्तुत करने जाना है बल्कि यह भी बताना है कि कैसे देश के युवा इस ओर नए उत्साह के साथ आगे बढ़ सकते है. वहीं इसके साथ ही आपको यह भी बताना है कि कैसे आपको 1 ट्रिलियन डॉलर्स का एक्सपोर्ट टारगेट पाना है. इन सभी बातों को सीमित समय के अंदर रखने के लिए आप कुछ तर्कों और सकारात्मक विचारों के साथ जाएंगे. पीयूष गोयल ने भी वही किया. उनका आधा बयान दिखाकर उनके बारे में जो अफवाह फैलाई जा रही है, उसका खंडन भी खुद पीयूष गोयल ने ही किया है. ANI को दिए अपने व्यक्तव्य में उन्होंने कहा कि मेरे कथन को एक अलग ही दृष्टि से दिखाया जा रहा है, जो कि एकदम सही नहीं है.

दरअसल उस पूरे कार्यक्रम में अपने भाषण के अंत में पीयूष गोयल ने युवाओं को सकारात्मक बने रहने का संदेश दिया था. “गणित ने ग्रेविटी की खोज में आइंस्टाइन की सहायता नहीं की…” उनका कथन सिर्फ इतना ही नहीं था. इसके आगे भी उन्होंने वो कहा जो आपको बताया नहीं जा रहा. उनका कहना था कि – “…अगर सभी पुराने फॉर्मूला और प्राप्त जानकारियों के ही आधार पर आगे बढ़ते, तो वह कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता था जो आज एक सच्चाई है.”

एक बुद्धिमान व्यक्ति यह समझ सकता है कि यहां कहने का तात्पर्य क्या है. गणित हमेशा से मौजूद थी. असल आवश्यकता थी उन सीमाओं से परे देखने की, जो उस समय की सीमित जानकारियों में दिखाई नहीं देता था. मैनेजमेंट में भी यही होना चाहिए. पुराने तरीकों से हटकर कुछ नया करने से ही कुछ अद्भुत प्राप्त किया जा सकता है. यही पीयूष गोयल के कहने का तात्पर्य था. सबसे पहली बात यह आती है कि आखिर उस वीडियो को उठाया क्यों गया. चलिए मान लें कि पीयूष गोयल देश के एक बड़े मंत्री हैं और बड़े मंत्रालयों का कार्यभार वो संभाल चुके हैं. तो उनका प्रसिद्ध होना ज़ाहिर सी बात है, और उनकी इस त्रुटि के लिए उनपर चुटकी ली जा सकती है, लेकिन अगर उनके उस कथन को आधार बनाया गया तो उसको सिर्फ आधा ही क्यों दिखाया गया. यही यक्ष प्रश्न है. क्या इसको नैरेटिव सेट करने का एक तरीका भर कहा जा सकता है?

खुद कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से यह वीडियो ट्वीट किया गया. यह बताने के लिए पर्याप्त है कि क्यों इसको वैसे नहीं देखा जा सकता जैसे किसी मंत्री की सामान्य त्रुटियां
देखीं जाती है. सभी मनुष्य है. सबसे कुछ गलतियां होती है. यह सत्य है कि ग्रैविटी की खोज आइंस्टाइन ने नहीं बल्कि न्यूटन ने की थी. तथ्यात्मक रूप से यहां पीयूष गोयल की गलती दी जा सकती है लेकिन उनके पूरे तर्क को न सुनकर सवालों के कठघरे में खड़ा कर देना क्या उचित है? वो भी इस स्तर तक कि खुद उस केंद्रीय मंत्री को जवाब देना पड़े. लोकतंत्र में जन-प्रतिनिधियों से सवाल पूछना एक स्वस्थ्य लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन आधे तथ्य को बता, पूरे तथ्य को छिपा लेना भी कोई सही बात नहीं होती.

राजनीति में नैतिकता शायद बची नहीं. यह बात आम जनमानस तक भी पहुंच चुकी है. और शायद यही क्रूर व्यवहार पीयूष गोयल के साथ भी हुआ. तथ्यों में कभी कभी गलती हो जाती है. और यह बात उस पार्टी को भलीभांति पता होगा जिनके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी रह चुके हैं. लेकिन अप्रोच में गलती न हो, यह बड़ी बात होती है. कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता है कि एक हज़ार दिन के भीतर देश के सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का कार्य करने वाले मंत्री पीयूष गोयल ही थे. रेलवे मंत्री रहते हुए भी उन्होंने एक बेहतरीन कार्य किया है. यह बात और है की उनकी एक छोटी सी त्रुटि ने उनको उपहास का पात्र बना दिया. लेकिन इस प्रकार की गलतियां कांग्रेस के नेता न जाने कितनी बार करते आये हैं. यहां तक कि सभी राजनैतिक दलों को “यह उनका निजी बयान है” कहना भी कांग्रेस पार्टी ने सिखाया है.

यह उन सभी मंत्रियों और मंत्रिपद पर बैठने का स्वप्न पाले उन लोगों के लिए एक सबक है कि राजनीति में त्रुटियों का कोई “स्कोप” नहीं होता. सोशल मीडिया में किसी का भी मज़ाक बनाया जाना सामान्य बात है. लेकिन जब राजनैतिक पार्टियों में “नैरेटिव वॉर” चलने लगे तब सामान्य जनता को भी पूरे तथ्यों का पता होना चाहिए. बात कैसे लिखी जाए इससे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि बात क्या लिखी जा रही है. कुछ बड़ा प्राप्त करने के लिए बड़े लक्ष्य निर्धारित करने होते हैं. उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सकारात्मक होने की अत्यधिक आवश्यकता होती है. एक जन प्रतिनिधि का कार्य यह भी होता है कि वह लोगों में विश्वास भरे की कोई मुश्किल लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है. इस बीच ऐसी त्रुटियों को नजरअंदाज करना ही बेहतर है क्योंकि जो लक्ष्य हमें प्राप्त करना है, वह काफी बड़ा है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *