अपने ही देश के तथ्यों को नकार एजेंडे पर भागती मलाला!

पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को कौन नहीं जानता है. वो लड़की जिसने सिर पर गोली लगने के बाद भी न केवल जीवित रहने का संघर्ष किया बल्कि उसमें कामयाब भी रही. इसी वजह से कहीं न कहीं शिक्षा को लेकर मलाला एक प्रतीक चिन्ह की तरह सामने आई. यही कारण था कि उनको नोबेल पीस प्राइज से सम्मानित भी किया गया. वैसे नोबेल प्राइज जिसके नाम से है, वो अल्फ्रेड नोबेल वहीं हैं जिन्होंने डायनामाइट का अविष्कार किया था. आज उनके नाम पर शांति का प्रतीक नोबेल दिया जाता है. इस विडंबना के साथ एक और बड़ी विडंबना तब जुड़ गई जब मलाला ने कश्मीर पर UN के दखल की मांग कर दी.

एक श्रृंखला में किये गए उनके ट्वीट्स बताने के लिए काफी है कि आखिर कहीं न कहीं मलाला को समझने में हमसे कुछ गलती हुई है. एक ऐसा राज्य जिसको शुरुआत से ही अस्थिर करने के प्रयास हुए. वह राज्य जहां पर पैसों के दम पर पाकिस्तान प्रायोजित पत्थरबाजी चलती है. वहां पर मलाला का कहना है कि कश्मीर की स्थितियों को देखते हुए UN दखल दे क्योंकि वहां लड़कियों और महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार नहीं हो रहा है. इसके साथ ही सेना के लोगों का लगातार सड़क पर घूमना कश्मीर के लोगों को भयभीत कर रहा है.

मलाला शायद यह भूल गयी कि वो जिस देश से भागी हैं, वहां उन्होंने कभी पलट कर आज तक नहीं देखा है. यह डर सच में बताता है कि मलाला आज भी पाकिस्तान जाने से डरती हैं. लेकिन कश्मीर पर आवाज़ उठाने से पहले वो एकबार कुछ तथ्यों को देख लेती तो बेहतर रहता. पाकिस्तान में हाल ही में हिन्दू और सिख लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन बता रहा है कि पाकिस्तान धरती का एकमात्र नरक है. आंकड़े भी यही कहते हैं.

2014 के हिसाब से बात करें तो एजुकेशन सेक्टर में लिट्रेसी के हिसाब से सिंध में लिट्रेसी रेट सिर्फ 56% की है. वहीं खैबर पख्तून में 50%; बलोचिस्तान में 43% और गिलगिट-बाल्टिस्तान में 65% है. इनमें से भी सिर्फ 2% ही ग्रेजुएट हो पाते हैं. वहीं चाइल्ड राइट्स मूवमेंट की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में 12.5 मिलयन बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं. ये खबर खुद उन्हीं के अखबार “DAWN” की है. लड़कियों के लिए आवाज़ उठाने वाली मलाला को अपने ही देश की लड़कियों का हाल देख लेना चाहिए. पाकिस्तान में होने वाली शादियों में से 34% में लड़कियों की उम्र 16-17 साल होती है. इसमें भी उनकी शादियां चचेरे, ममेरे या फुफेरे भाई बहनों में होती है. 21% लड़कियां 18 साल से पहले और 3% लड़कियां 15 साल से पहले ही शादी के बंधनों में बंध जाती है.

जिस UN में कश्मीर को लेकर मलाला जाना चाहती है उसी की एक संस्था UNICEF ने पाकिस्तान को बाल विवाह में दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बताया है. इसमें भी POK का गिलगिट और बाल्टिस्तान सबसे अधिक पिछड़ा हुआ है. अगर इन सभी शादियों को रोक दिया जाए तो पाकिस्तान की जीडीपी में $6299 मिलयन डॉलर्स की बढ़ौतरी हो सकती है. मलाला ने इस बात को लेकर कभी UN का दरवाजा नहीं खटखटाया है कि इसको रोका जाए. उल्टा इन मामलों में मलाला के मुंह से एक शब्द नहीं निकला. यह उनके दो विचारधाराओं को बताता है.

पाकिस्तान में बच्चे भी सुरक्षित नहीं हैं. पाकिस्तान में 18% बच्चे कुपोषित हैं. पाकिस्तान में खुद उनकी सरकार की रिपोर्ट कहती है कि 5 साल की उम्र वाला हर दसवां बच्चा कुपोषित है. 5 मिलयन बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषित हैं. या तो उनका वजन कम है या उनका कद. खुद पाकिस्तान की सरकार की रिपोर्ट कहती है कि दो से पांच साल के बच्चों के बीच 13% बच्चे किसी न किसी शारीरिक विकलांगता के शिकार हैं. वहीं 50% लड़कियां अनीमिया से ग्रसित हैं. लेकिन किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया.

इतने आंकड़ों से यह तो स्पष्ट है कि मलाला के पास कहने को बहुत कुछ है. पाकिस्तान की स्थिति को सुधारने के लिए वह बहुत कुछ कर सकती हैं लेकिन उनकी ज़बान इस ओर नहीं खुलती है. शिक्षा के स्तर का अंदाज़ आप इसी बात से लगा लीजिये की एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में 33% महिलायें ये मानती हैं कि पति का पत्नी को पीटना जायज है. वहीं 18% महिलाएं तो ये तक मानती हैं कि खाना जल जाने पर भी अगर पति पत्नी को मारता है तो वह जायज है. इसके साथ ही 29% महिलाएं ये मानती हैं कि पति के बिना इजाज़त के घर से बाहर जाने पर यदि पति उनपर हिंसा करता है तो यह जायज है. अब आप शिक्षा का स्तर समझ सकते हैं. शिशु मृत्यु दर में भी पाकिस्तान में 2016 के हिसाब से 64.2% दर है.

अब ऐसे विषयों पर भी जिस मलाला को शांति का नोबल प्राइज मिला है वह बोलने को तैयार नहीं है. यही स्थितियाँ बताती हैं कि कहीं न कहीं दुनिया को यह समझने में एक भारी भूल हुई है कि कैसे नोबल पुरस्कार जैसा विश्वविख्यात पुरस्कार इस बार शायद तर्कों से ऊपर भावनाओ को रखकर दिया गया.

सोर्स

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