संपर्क का अंत नहीं, संकल्प की शुरुआत है चंद्रयान 2

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा

अपनो के विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज्र बनाने

नव दधीचि हड्डियां गलायें

आओ फिर से दिया जलाएं!”

भारत रत्न और देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की ये पंक्तियां आज ISRO समेत पूरे राष्ट्र के लिए एक सन्देश हैं. चंद्रयान 2 के साथ जो हुआ, उससे भी बड़ी ख़बर देश के प्रधानमंत्री का वो सांकेतिक भाव था जो उन्होंने ISRO के CEO के सिवन के प्रति दिखाया. विज्ञान सदैव प्रयोग पर आधारित होता है. प्रयोग सफल भी होते हैं और असफल भी. मानव की इच्छाशक्ति मात्र से किसी भी प्रयोग का आँकलन किया जाता है.

पूरी दुनिया में चाँद पर उतरने के 38 बार प्रयास हुए हैं. इनमें से मात्र 15 या 16 बार सफलता प्राप्त की गई है. सिवन ने बताया कि चांद पर सफलतापूर्वक उतरने की सफलता दर मात्र 37% है. उस स्थिति में भी चांद पर उतरने का हमारा स्वप्न हमारी प्रबल इच्छाशक्ति का प्रतिबिंब है. चंद्रयान 2 को हम असफल नहीं कह सकते. लेकिन जिस मिशन को लेकर इसकी तैयारी की गई थी, शायद वह अधूरा रह गया है. 

तो चंद्रयान 2 के साथ हुआ क्या. दरअसल इसके दो महत्वपूर्ण भाग थे. एक, इसका ऑर्बिटर जो चंद्रमा के चारो ओर चक्कर लगाते हुए महत्वपूर्ण जानकारियां इकट्ठा करेगा. दूसरा, विक्रम लैंडर जो सतह पर उतरकर अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां इकट्ठा करता. चंद्रयान 2 का ऑर्बिटर अभी भी चंद्रमा के चारो ओर चक्कर काट रहा है और 100% सही तरह से काम कर रहा है. दिक्कत विक्रम लैंडर में आई, जिसका संपर्क चांद की सतह से मात्र 2.1 किलोमीटर की दूरी से टूट गया.

चंद्रमा तक 388,488 किलोमीटर की लंबी यात्रा कर मात्र 2.1 किलोमीटर की दूरी से संपर्क टूट जाना बताता है कि यह मिशन 99% तक सफल रहा. जिस कार्य को करने का मात्र 37% सफलता दर है वहां 99% तक सफलता प्राप्त करना अपने आप में एक उपलब्धि है. लेकिन फिर भी, विज्ञान 100% सफलता को ही स्वीकार करता है. चंद्रयान के साथ गया हुआ ऑर्बिटर अभी भी हमारे बहुत काम आएगा. यह प्रयोग कई मायनों में एक अभूतपूर्व उपलब्धि है. सफलता की लालसा सभी मे होती है, लेकिन असफलता को स्वीकारते हुए आगे बढ़ना ही एक सफल संस्था का वो मूल बीज होता है जिसके आधार पर उसकी नींव खड़ी रहती है.

फिलहाल हमें हमारे वैज्ञानिकों के उस साहस और समर्पण के प्रति नतमस्तक होना चाहिए जिन्होंने हमें इतने बड़े सपने दिखाने के पंख दिए. पड़ोसी देश के कुछ नेता भले ही हमारा मज़ाक उड़ाए, लेकिन असल सच्चाई यही है कि हम उन कुछ चुनिंदा देशों में से एक है जिन्होंने मंगल और चांद, दोनों पर ही अपना ऑर्बिटर सफलतापूर्वक भेजा है. हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की स्थिति जैसी है, वो उनके इसी छोटे हृदय के कारण है. वैसे भी उनकी नकारात्मकता के आगे हमारी सकारात्मक सोच सदैव जीती है. हमारे वैज्ञानिकों को दिया गया मोदी मंत्र देश के सभी लोगों को सुनना चाहिए. देश के अंदर भी कई ऐसे लोग हैं जो चंद्रयान 2 का पूर्ण रूप से सफलता न प्राप्त किये जाने से खुश हैं. सिर्फ इसलिए क्योंकि देश के प्रधानमंत्री मोदी है. 

एक पत्रकार महोदय तो ISRO के एक वैज्ञानिक पर ऐसे भड़क पड़े जैसे उन्हीं का सारा पैसा डूबा हो. ऐसे नाजुक समय में वैज्ञानिको की भावनाओ को समझना चाहिए. इसरो के वैज्ञानिक डॉ कार्णिक के प्रति उनका व्यवहार बहुत निंदनीय था. लेकिन डॉ कार्णिक का संयम उनके चरित्र का गुणगान स्वयं कर गया. यह हमारे देश की युवा पीढ़ी को एक सबक था कि असफलता के समय आपको संयम बनाये रखना चाहिए. 

असफलता के समय हमें नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए. यही शायद देश के प्रधानमंत्री का इसरो के वैज्ञानिकों को सन्देश भी था. चंद्रयान 3 की तैयारियों में हम फिर से जुट जाएंगे. लेकिन उससे पहले हमारे पास गगनयान भी है. सफलता और असफलता के बीच की गहरी उम्मीद की रेखा को बचाये रखना ही देश के प्रति सच्ची देशभक्ति है. इसरो, हमें आप पर गर्व है! 

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