राष्ट्रविरोधी विचारधारा के पोषित “स्तंभ”

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में खड़ा भारतीय मीडिया इस समय एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जहां उसकी विश्वसनीयता दांव पर लगी है. TRP वो सत्य है जिससे भागा नहीं जा सकता. प्राइम टाइम पर आने वाला शो दिखाने से ज़्यादा वह विषय चुनना आवश्यक हो जाता है जिसपर देश की तथाकथित “सबसे बड़ी डिबेट” चला करती है.

लेकिन “ऑन एयर” होने से आजकल “ऑफ़ एयर” होना ज़्यादा नाम बटोर रहा है. टीवी स्क्रीन के सामने होने पर जो “नैतिकता” का चोगा होता है वो कहीं न कहीं सोशल मीडिया पर उतर जाता है क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर आपको लोग वहां जानते नहीं है. वैसे आज के भारत में जहां रोज़ 1GB इंटरनेट मिल रहा हो, वहां कोई सोशल मीडिया पर न दिखे, यह आश्चर्य वाली बात है. लेकिन ज़्यादातर लोगों की पोल यहीं खुलती है.

विदेशी मीडिया का भारत के प्रति क्या रवैय्या रहा है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है. सोशल मीडिया पर भी एक मीडिया ग्रुप की प्रतिनिधि द्वारा वह किया गया जो लोकतांत्रिक सीमाओं के अंदर “असंवैधानिक” और सामाजिक दृष्टि से “अमर्यादित” कहा गया है. NPR मीडिया ग्रुप की पत्रकार हैं फुरकान खान. पेशे से पत्रकार होने के कारण उनसे ज़ाहिर तौर पर एक परिपक्व और बेहतर आचरण की आशा की जाती है.

लेकिन उनके एक ट्वीट ने एकबार फिर से उस वैश्विक प्रोपेगंडा की पोल खोल दी जिसके कारण आज भी भारत को इतनी तरक्की के बाद भी एक पिछड़ा देश बोला जाता है. एक धर्म विशेष को निशाने पर लेते हुए फुरकान लिखती हैं कि – “अगर भारतीय हिन्दू धर्म का त्याग करते हैं, तो इसके साथ ही वह उन सभी समस्याओं का भी समाधान करेंगे जो गौ-मूत्र पीने वाले और गाय के गोबर की पूजा करने वालों के साथ स्वतः आती हैं.”

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यह पढ़ने और सुनने में जितना खराब लग रहा है, उस बुद्धि की कुटिलता और ज़हर का आप अंदाजा लगा सकते हैं जिसने इन शब्दों को दुनिया के सबसे शांतिप्रिय समाज को लेकर कहें है. ट्वीट डिलीट हो चुका है. माफी मांगी जा चुकी है. नौकरी से हाथ भी धो चुकी हैं. लेकिन क्या इससे दिमाग में बैठी वो नफरत खत्म हो जाएगी जो एक धर्म विशेष के लिए लोगों में है? इस्लाम के लिए कई देश अभी भी काफी सजग हैं. चीन, जापान और कोरिया जैसे देशों में इस्लामिक चिन्ह और इस्लाम के मानने वाले काफी नीची नज़रों से देखे जाते हैं. ऐसा करने के उनके अपने तर्क हैं. वैश्विक आतंकवाद का जो चिन्ह सबके दिमाग में बनकर आता है, वह दुर्भाग्यवश इस्लाम का ही आता है. अब्दुल कलाम का त्याग अजमल कसाब के रक्तपात के आगे कहीं न कहीं छिप जाता है. बिन लादेन और बगदादी के कुकृत्यों के निशान पूरी दुनिया में देखे जाते हैं. यह कारण काफी बड़े हैं. दूसरी तरफ वह धर्म है जिसने योग का प्रचार किया है.

वसुधैव कुटुम्बकम को सोच रखने वाली भूमि के बहुसंख्यकों के विश्वास पर इतना बड़ा उपहास उड़ाकर क्या कोई माफी मांगकर बच सकता है? चार्ली हेब्दो ने जो झेला, वह मात्र सांकेतिक चित्र बनाने का खामियाजा था. कुरान की आयतें न पढ़ पाने वालों को जान से हाथ धोना पड़ा, वहाँ भी किसी को असली दिक्कत का आभास नहीं हुआ था. यह किसी विशेष धर्म को निशाने पर लेने वाली बात नहीं है बल्कि उन चंद लोगों की सोच को निशाने पर लाने की बात है जिनके कुकृत्यों से एक बड़ा समाज स्वयं परेशान है. लेकिन फिर भी एक प्रोपनगंडा पूरी दुनिया में फैला हुआ है कि इसी समाज के लोग सबसे अधिक प्रताड़ित है.

एडोल्फ हिटलर ने कहा था – “प्रोपगैंडा वह हथियार है जिससे लोगों को किसी भी बात का यकीन दिलाया जा सकता है. प्रोपगैंडा का माहिर अपनी दलीलों से स्वर्ग में जीनेवालों की ज़िंदगी को नरक से भयानक साबित कर सकता है और दूसरी तरफ ज़िंदगी के बद से बदतर हालात को स्वर्ग के सुख के बराबर साबित कर सकता है.”

यह उसके अपने शब्द थे. इतिहास ने उसको भले कुछ भी लिखा हो लेकिन उसके शब्दों से एक बड़ा जनसमूह आकर्षित था, उससे कोई इनकार नहीं कर सकता. खुद वो भी जिनकी नज़र में वो एक राक्षस था. यहां भी प्रोपनगंडा ही काम करता है. फुरकान खान ने यह पहली बार कहा हो, ऐसा नहीं है. पहले भी वह देश की संप्रभुता और अखंडता पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले विचार रखती आई हैं. एकबार उन्होंने लिखा था कि – “भारत ने कश्मीरियों के संवैधानिक अधिकारों को न सिर्फ छीना बल्कि यह भी साबित करने का प्रयास किया कि हम भारतीय है.”

यह किसी भी भारतीय को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त है जो भारत की संप्रभुता और अखंडता पर विश्वास रखता है. कश्मीर पर ऐसे बोल सीधे तौर पर भारत विरोधी उसी प्रोपगंडा का हिस्सा है जिसकी बात दूसरे शब्दों में हिटलर ने अपने हिसाब से की थी – “वह हथियार जिससे लोगों को यकीन दिलाया जा सकता है.”

यह यहीं नहीं रुकती हैं. भारत और इजराइल के मैत्री संबंधों से भी इनको ऐतराज है. यह बातें इनके मुंह से तब निकलती हैं जब यह स्वयं दिल्ली में रहती हैं. उनके लिए देश का लोकतंत्र भी दुख का विषय है. यह एक पत्रकार की मनोस्थिति है. वह पत्रकार जो बड़े लोगों के लिए प्रोपगंडा बनाने का वो हथियार बन चुके हैं जिनसे एक बड़े समाज को बहकाया जाता है. निश्चित रूप से यह देशद्रोह की श्रेणी में आता है. किसी की क्षमायाचना उनकी मनोस्थिति का परिचायक हो सकती हैं, लेकिन उसकी सोच का नहीं. यह ज़हर खतरनाक है.

यह ऐसा ज़हर है जो JNU में हमें 2015 में देखने को मिला था. “बंदूक के दम पर आज़ादी” मांगने वाली विचारधारा के “सॉफ्ट सपोर्टर्स” कहीं न कहीं उस वैचारिक आतंकवाद को बढ़ावा ही दे रहे हैं जहां इस देश की व्यवस्था और सरकार, सेना तथा आंतरिक लोकतंत्र पर लोगों जो संदेह हो. यह इस देश के लिए खतरनाक है. किसी भी राष्ट्र के निर्माण में सबसे पहली नींव विश्वास की होती है. उसी विश्वास को खोखला करने का यह प्रयास फुरकान ही नहीं, बल्कि कई लोग कर रहे हैं.

एजेंडे वाली पत्रकारिता को कल भी लोगों द्वारा ना कहा गया था, और आज भी कहा जायेगा. अंतर बस इतना है कि आज की सोशल मीडिया की ताकत हर उस आवाज़ की लोगों के सामने पोल खोल कर रख देगी जो राष्ट्रविरोधी विचारधारा के पोषित हैं.

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