अहकाम-ए-आलमगीरी में औरंगज़ेब ने खुद लिखी शिवाजी से हार की टीस!

मुग़ल सल्तनत में सबसे क्रूरतम शासकों में से एक का नाम औरंगज़ेब था. वो औरंगज़ेब जिससे देश में बहुत से लोग सहानुभूति रखते हैं. टीवी डिबेट्स में बहुत से ऐसे तथाकथित इस्लामिक बुद्धिजीवियों से यह सुनने में आता रहता है कि औरंगज़ेब टोपियां सिलता था. किसी ने भी यह बताने का प्रयास नहीं किया कि आलमगीर के नाम से जाने जाने वाले औरंगज़ेब की आखिरी वसीयत क्या कहती थी.

किसी ने हालांकि इस पर ध्यान भी नहीं दिया. क्योंकि अधिकतर लोगों का ध्यान तो उन इमारतों पर था जो मुगल शासन की बानगी है. अहकाम-ए-आलमगीरी (औरंगज़ेब के किस्से) में यह लिखा हुआ है कि कैसे औरंगज़ेब ने अंतिम क्षणों में भी एक ऐसी मानसिकता का परिचय दिया जो उसके जीवित रहते हुए कुकृत्यों से भी अधिक विभत्स्य था. हालांकि इसको पढ़कर आपको यही लगेगा कि यह एक महान बादशाह का अंतिम पत्र है, लेकिन उस तथाकथित महान बादशाह का इतिहास सिर्फ खून और रक्तपात से भरा हुआ है. और शायद इसका आभास अपने अंतिम क्षणों में औरंगज़ेब को भी था. उसके अंतिम शब्दों में जीवन के मिले कटु अनुभवों का चित्र था.

वह लिखता है कि –

“अधर्म में डूबे इस पापी की ओर से, हसन के मकबरे को ढँक दो, क्योंकि जो लोग पाप के सागर में डूब गए हैं, उन्हें शरणार्थी की तलाश करने के अलावा कोई और सुरक्षा नहीं है. जहां वो क्षमायाचना कर सके. यह महान शुभ कार्य मेरे बेटे प्रिंस अलीजाह द्वारा किया जाना है.”

आगे औरगजेब कहता है कि –

” मेरे द्वारा सिली गयी 4 और 2 रुपयों कीमत वाली टोपियों से जुटे पैसे अइया बेग, महालदार के पास हैं. उसी से इस असहाय प्राणी के कफन पर खर्च करें. कुरान की नकल करने की मजदूरी से 300 रुपये अभी भी मेरे व्यक्तिगत खर्च के लिए है. उन पैसों को मेरी मौत पर फकीरों को समर्पित करें, मेरे कफन पर नहीं. राजकुमार आज़म से मेरे अंतिम संस्कार की शेष आवश्यकताएं लें क्योंकि वह स्पष्ट उत्तराधिकारी हैं, और उन पर कानूनन या गैरकानूनन इसकी जिम्मेदारी है. यह असहाय व्यक्ति उनके लिए जवाबदेह नहीं है क्योंकि मृत व्यक्ति जीवित लोगों के हाथों में होता हैं. “

ये उस व्यक्ति के शब्द हैं जिसने अपने बड़े भाई दारा शिको के साथ 2 और भाइयों की निर्मम हत्या सत्ता के लिए कर दी. इसके साथ ही जिसने अपने पिता शाहजहां को कैदी बनाये रखा. जिसने गुरु तेग बहादुर की निर्मम हत्या कराई. जिसके दामन पर शम्भाजी महाराज के रक्त के छींटे हैं. उनके शरीर को दी गयी असहनीय यातनाओं और उनके शरीर का हर एक टुकड़ा औरंगज़ेब के अंतिम क्षणों के इस असहाय प्रवृत्ति का कारण थे. खुद को ईश्वर मानने वाले उस बादशाह के लिए लिखे गए इस तरह की किताब से यही आभास होता है कि अपने अंतिम क्षणों में वह कितना असहाय होने के साथ ही अपराधबोध से ग्रसित भी था. करोड़ों अपनों को कुचलकर जनसंहार करवाने वाले एक क्रूर शासक के यह शब्द उसकी अंतिम यात्रा से पहले उसकी असहाय स्थिति का द्योतक है.

शाहजहां के बारे में लिखते हुए औरंगज़ेब कहता है – “अपने बेटों पर कभी भी भरोसा न करें, और न ही अपने जीवनकाल में उनके साथ अंतरंग तरीके से व्यवहार करें, क्योंकि अगर सम्राट शाहजहाँ ने दाराशिकोह के साथ इस तरह से व्यवहार नहीं किया होता, तो आज सबको उनके किये इतना खेद नहीं होता.”

यानी अपने अंतिम क्षणों में भी उसको अपने किये पर कोई पछतावा नहीं था. उल्टा उसको इस बात का खेद था कि जीवनपर्यत प्रयास करने के बाद भी वो दक्खन को पूर्ण रूप से अपने अधीन नहीं कर पाया था. कारण सिर्फ एक थे – छत्रपति शिवाजी महाराज!

एक ऐसा बादशाह जिसके किस्सों में बहादुरी कम, वहशियाना रवैय्या ज़्यादा है. एक ऐसे शासक का अंत किसी भी प्रजा के लिए प्रसन्नता का विषय होगा. लेकिन तथाकथित आलमगीर के जीवन की वो सबसे बड़ी हार क्या थी? निसंदेह मराठों से जीत न पाना. औरंगजेब ने छत्रपति शिवाजी महाराज के आगरा से भाग जाने की टीस अपने कब्र में जाने तक दिल में रखी. कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने अपने उत्तराधिकारी छत्रपति संभाजी महाराज को उनकी हत्या के बाद भी सुनिश्चित किया कि औरंगजेब को उसकी मृत्यु तक संघर्ष करना पड़ा और अंततः वो दक्खन में असफल रहा.

दो प्रसिद्ध नाम संतजी घोरपड़े और धनजी जाधव के थे जिन्होंने एक बार मुग़ल छावनी पर छापा मारा था जहाँ औरंगज़ेब भी रहता था, और सोने के बने ऊपरी हिस्से को गिरा दिया जहाँ औरंगज़ेब रहता था. गुरिल्ला युद्ध और प्रिय मित्र महान सहयाद्रि की मदद से मराठों ने सालों तक राजा या साम्राज्य के बिना संघर्ष किया और कभी भी मुगलों को दक्खन को पूरी तरह से हड़पने नहीं दिया.

शिवाजी से मिली इस कूटनीतिक हार का दंश औरंगज़ेब में इतना था कि उसने इसका ज़िक्र भी किया है. उसने कहा है कि –

“सरकार के मुख्य स्तंभ को साम्राज्य की खबर में अच्छी तरह से बताया जाना है. एक पल के लिए लापरवाही लंबे समय के लिए अपमान का कारण बन जाती है. मेरी लापरवाही के कारण उस नीच शिवाजी का पलायन हुआ और मुझे मेरे जीवन के अंत तक कठिन श्रम करना पड़ा”

एक हारे हुए बादशाह का शिवाजी के लिए “नीच” जैसे शब्द का प्रयोग करना ये बताता है की उसके अंदर हार की टीस कितनी पीड़ादायक थी. यही शिवाजी और मराठों की सबसे बड़ी जीत थी.

औरंगज़ेब ये भी लिखता है कि वो दक्खन में हुई बेज़्ज़ती का जिम्मेवार है.

“साम्राज्य के शासक (मेरा उत्तराधिकारी) के लिए यह उचित है कि वह इस असहाय पापी (आलमगीर) के असहाय सेवकों का इलाज करे, जो रेगिस्तान और जंगल में (दक्खन) मेरे कारण घूम रहे है. भले ही उनके द्वारा यदि अपराध किया जाता है, तो उन्हें क्षमा करें”

इससे अधिक लज्जा का विषय स्वयम्भू बादशाह के लिए हो ही नहीं सकता. यह कहना गलत नहीं होगा कि खुद औरंगज़ेब की टीस में यह पता चलता है कि मुग़ल साम्राज्य के दौरान मराठों का एक अपना वर्चस्व था. एक ऐसा बादशाह जिसके पास अंतिम क्षणों में भी बताने के लिए छत्रपति शिवाजी से मिली हार थी. अब आप खुद तय करिये की ऐसा बादशाह महान कैसे हो सकता है जो इतना हारा हुआ हो कि खुद की वसीहत में भी उसके पास खुद का बताने के लिए कुछ नहीं था, सिवाए अपनी खीझ के.

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