अलविदा सुषमा जी, लोपक प्रणाम!

देश में धारा 370 की खुशी अभी तरीके से फूटी भी नहीं थी कि एक बेहद ही दुखद खबर इस देश ने देखी. पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा की पूर्व सांसद सुषमा स्वराज जी का कल शाम दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. जब AIIMS से यह खबर सुनाई तब आधे देश को तो यह भरोसा ही नहीं हुआ कि यहां उसी महिला की बात हो रही है जिसने सदन से लेकर UNO तक अपनी गर्जना से विरोधियों को परास्त किया था लेकिन मृत्यु पर किसी का जोर नहीं होता. सुषमा जी का जाना कितना बड़ा आघात है, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगाइये की सरहद पार भी वही दुख देखा जा रहा है. 

आज़ाद देश की आधारशिला रखते समय संविधान निर्माताओं और हमारे पूर्वजों ने एक प्रतिनिधि का चरित्र वर्णन जिस प्रकार से किया होगा, सुषमा स्वराज वही थीं. ट्विटर की चिड़िया को उन्होंने सिर्फ़ गुड गवर्नेंस का माध्यम ही नहीं बनाया बल्कि अपने कटाक्षों से उनको भी चित किया जिनकी शरारतों ने पूरे सोशल मीडिया को दूषित कर रखा है.

सुषमा स्वराज की कार्यशैली का अंदाज़ा आप इसी से लगा लीजिये कि एकबार एक यूजर ने उनकी मृत्यु की कामना कर दी थी. उस पर भी उन्होंने उसका आभार व्यक्त किया था.

यही एक महान राजनीतिज्ञ और एक स्वच्छ छवि की नेता का परिचायक है. छात्र राजनीति में भी उनकी सक्रियता कम नहीं थी. अटल बिहारी बाजपेयी और नरेंद्र मोदी दोनों को ही सबसे अधिक विश्वास सुषमा स्वराज पर ही था. वह एक बेहद स्वच्छ छवि की नेता के साथ ही संगठनात्मक कौशल की धनी भी थी. सोशल मीडिया को उन्होंने डिजिटल ऑफिस में परिवर्तित कर दिया.

ट्रेंड सेटर शायद इसको ही कहते हैं. यही कारण है कि वह सर्वाधिक स्वीकार्य नेताओं में से एक थी. उनका जाना भारतीय राजनीति के साथ ही वैश्विक राजनीति को भी एक झटका है. भाजपा को जब साम्प्रदायिक पार्टी माना जाता था, तब इसी साम्प्रदायिक शब्द को लेकर उन्होंने विपक्षियों को घेर लिया था. दुर्गा का वह रौद्र रूप किसे नहीं याद? यही सुषमा जी की आजीवन अर्जित की गई धरोहर है जिसका कोई काट नहीं है.

मोदी के समर्थक और विरोधी भले हो सकते हैं, लेकिन सुषमा स्वराज का कोई विरोधी नहीं था. राजनैतिक कारणों से भी नहीं. सदन में जब छोटी राजनीति के लिए उनके पति पर आरोप लगे, उस समय भी उन्होंने कांग्रेस को राजीव गांधी और एंडरसन का उदाहरण देते हुए उनको “क्विड प्रो को” समझाया.

मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के चुनावों से पहले ही स्वाथ्य कारणों से उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया. सत्ता की भूख किसी को भी हो सकती है लेकिन सत्ता का मूल्य पहचानने वाले बहुत कम ही लोग राजनीति में शेष है. बहुत कम लोगों के राजनीतिक शब्दकोश में सत्ता का अर्थ सेवा होता है. 

लोपक की ओर से सुषमा स्वराज जी को भावभीनी श्रद्धांजलि!

ॐ शांति!

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