असफल सिद्ध हो चुके समाजवाद की ओर एक आत्मघाती कदम?

भारतीय चिन्तन परंपरा में चार पुरूषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। अर्थ यानि धन को भी वहीं स्थान हासिल हैं जो धर्म, काम या मोक्ष का है। इसलिए हमारे यहां धन कमाने को या अमीर बनने को कभी पाप नहीं माना गया। प्राचीन काल से ही श्रेष्ठियों को समाज में आदर का स्थान दिया गया। जिस भी राजा ने श्रेष्ठियों का अपमान किया अथवा उन्हें अवांछित तरीके से दंडित किया वह राज्य अधिक नहीं चला। भारतीय चिन्तन परंपरा के विपरीत समाजवादी विचार ने धन कमाना, लाभ अर्जित करने और उसे इकट्ठा करने को घृणित कार्य माना और ऐसे हर प्रयत्न को दंड दिया।

हमारी चिन्तन परंपरा में धनवानों से कर लेने को भी अनुचित नहीं माना गया। लेकिन ये भी कहा गया है कि राजा को कर उसी तरह से लेना चाहिए जैसे मधुमक्खी एक पुष्प से शहद चुराती है। इससे मधुमक्खी का काम भी चल जाता है और पुष्प भी खिला रहता है। यहां ये भी ध्यान रखने की बात है कि समाजवाद पूरी व्यवस्था को सरकार केन्द्रित बनाने पर जोर देता है जबकि भारतीय चिन्तन हर गतिविधि के केन्द्र में समाज को रखता है।

राजनीतिक रूप से भी देखा जाएं तो आजादी के बाद से ही जनसंघ की आर्थिक सोच का नेहरूवादी आर्थिक नीतियों से यही मूलभूत विरोध था लेकिन मोदी 2.0 सरकार का पहला बजट भारतीय चिन्तन परंपरा और पार्टी की मूल सोच से बिल्कुल विपरीत लगता है। वह अधिक कराधान और अमीरो से अधिक पैसा खसोटने की सोच पर आधारित है। नहीं तो ये सरकार 2 करोड़ सालाना से अधिक आमदनी रखने वालों को इस तरह दंडित करने का प्रावधान नहीं करती? पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव के आर्थिक सुधारों से पहले आज़ादी के बाद से कांग्रेसी सरकारों ने समाजवादी आर्थिक नीतियों को ही चुना था। उससे देश कितना पिछड़ा रह गया सब जानते ही हैं। अब यदि भाजपा नीत केंद्र सरकार भी समाजवादी नीतियों पर चलेगी तो फिर भगवान् ही इस देश का मालिक है।

यों भी खुद वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि ऐसे भारतीयों की संख्या 5000 से ज्यादा नहीं है जो दो करोड़ रुपये सालाना से ज़्यादा कमाते हैं। इन अमीर भारतीयों पर अधिक कर लगाने का ‘दंड ‘ लगाने से भारत सरकार को कोई 2700 करोड़ रूपये के आसपास का राजस्व मिलेगा। ये राशि इतनी अधिक नहीं है कि ये माना जाए कि वित्तीय साधन जुटाने की मजबूरी में सरकार को ये ‘कर दंड ‘ लगाना पड़ा। इसका मायने तो ये है कि सरकार मानती है कि अधिक आय कमाते हैं उन्हें बताया जाए कि आपने अधिक कमा कर अच्छा नहीं किया। इसलिए वो पैसा सरकार आपसे अधिक कर के रूप में ले लेगी। ये सोच सचमुच विचित्र है और भाजपा के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

सरकार की नीति तो ऐसी होनी चाहिए कि लोगों की कमाई बढे। ये 5000 की संख्या को बढ़ाने का प्रयास सरकार को करना चाहिए ताकि 5 साल बाद वह यह बता सके कि दो करोड़ सालाना कमाने वालों की संख्या 5000 से 5 लाख हो गई। यही लोग देश में नये धंधे खोलेंगे, नए रोजगार देंगें और देश को समृद्ध बनाएंगे। लेकिन इस बजट में इन उद्यमी, मेहनती, कल्पनाशील और सामथ्र्यवान लोगों के वर्ग को निरूत्साहित करके सरकार ने उल्टा काम ही किया है।

समाजवादी सोच से प्रेरित होकर उद्यमशील लोगों को प्रताडि़त करने का परिणाम क्या होता है ये पश्चिम बंगाल में ये देश देख चुका है। कथित प्रगतिशील समाजवादी विचारधारा की आड़ में पश्चिम बंगाल में साम्यवादियों ने अपने शासन काल में समृद्ध और औद्योगिक राज्य का बंटाधार कर दिया। वहां से अधिकतर उद्योगपति और प्रोफेशनल पलायन कर गए थे। क्या ये ‘नया समाजवाद’ लाकर केन्द्र सरकार भी ऐसा ही करना चाहती है?

सरकार के नीति-निर्धारकों को सोचना चाहिए कि राजस्व उगाहने के लिए ‘लोकलुभावन’ फैसलों की नहीं बल्कि कल्पनाशील उपायों की आवश्यकता है। अर्थव्यवस्था को लेकर यूं भी इस सरकार के प्रति सदभावना रखने वालों के मन भी गंभीर चिंताएं हैं। अमीरों पर नितांत कल्पनाहीन तरीके से अधिक कर दंड लगाकर वित्तमंत्री ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। वित्त मंत्रालय को अपनी नीतियों पर पुर्नविचार की आवश्यकता हैं अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो सकता ।

उमेश उपाध्याय
उमेश उपाध्याय एक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और विचारक हैं। उन्होंने अपना व्यावसायिक जीवन दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में प्रारम्भ किया था। उन्होंने देश के कुछ प्रतिष्ठित मीडिया प्रतिष्ठानों जैसे पीटीआई, ज़ी टीवी, होम टीवी, सब टीवी, जनमत और नेटवर्क 18 में उच्च प्रशासनिक और सम्पादकीय पदों पर कार्य किया है। वे अक्टूबर 2015 तक नेटवर्क 18 के अध्यक्ष भी रहे।

3 Comments

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    September 5, 2019 - 4:27 pm

    It is in reality a nice and useful piece of information. I¦m happy that you just shared this helpful info with us. Please keep us informed like this. Thanks for sharing.

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  2. Avatar
    September 29, 2019 - 12:04 am

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