कालचक्र की फांस में फंसे चिदंबरम!

इस समय देश के पूर्व गृह मंत्री और कांग्रेस नेता पी.चिदंबरम के लिए समय स्थितियों के अनुकूल नहीं है. UPA 1 और 2 क शासनकाल के दौरान किये हुए कुछ कार्यों ने इस समय उनके सामने तिहाड़ जेल के दरवाजे खोल दिये हैं. एक गृह मंत्री के पद पर बैठ चुके व्यक्ति के लिए यह बहुत ही हताश कर देने वाला क्षण होगा. लेकिन इसका न्योता भी उन्होंने ही दिया था. करीब एक दशक पहले.

साल 2010 में जब वो देश के गृहमंत्री थे तब अमित शाह के पीछे CBI लगाने वाले वही थे. राजनैतिक प्रतिद्वंदिता की आड़ में देश की इन्वेस्टिगेशन एजेंसीज का इस्तेमाल बहुत ही निंदनीय है, लेकिन सच्चाई यही है कि हर सरकार के दौरान ये होता रहा है. सोचने वाली बात ये है कि आखिर क्यों चिदंबरम इतना भाग रहे हैं. अमित शाह और चिदंबरम के बीच एक सबसे बड़ा अंतर उनके द्वारा दिखाए जा रहे रिएक्शन से पता चलता है, जबकि चिदंबरम के पीछे कांग्रेसी वकीलों और नेताओं का पूरा गुट खड़ा दिखता है.

काँग्रेस भी इसको बदले की भावना से किया जा रहा कार्य बताने के पूरे प्रयास में है. फिर भी बात यहाँ अटकती है कि आखिर चिदंबरम इतने दिनों से भाग क्यों रहे हैं. वकीलों का पूरा गुट और खुद वो अपने बेटे को बचाने के पूरे प्रयास में लगे रहे. चुनावों के दौरान चिदंबरम ने हर वो प्रयास किया जिससे भाजपा या मोदी की सरकार न बने. वैसे एक राजनैतिक प्रतिद्वंदी होने के नाते यह मॉरल ग्राउंड्स पर एक सही कदम भी था, लेकिन हर चीज़ की एक उचित सीमा होती है.

भ्रष्टाचार UPA शासनकाल में सबसे बड़ा मुद्दा था. भाजपा शासन में यह मुद्दा नहीं है. वो भी तब जब नरेंद्र मोदी में अपना पहला कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है. उनकी ये दूसरी पारी है. इन सबके बीच अभी भी लोग कांग्रेस के घोटालों का ही हिसाब मांग रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि एक बहुत बड़ी बुनियादी गलती कांग्रेस से हुई है जिसका खामियाजा वो कब तक भुगतेगी यह सिर्फ ईश्वर ही बता सकता है.

वहीं चिदंबरम के लिए सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वकील खड़े हैं. यह बड़े वकीलों की लिस्ट में आते हैं. आप सोच सकते हैं कि मामला कितना गंभीर है. CBI और ED के चंगुल से बच पाना इस समय चिदंबरम के लिए कठिन लग रहा है. उधर उनके बेटे कार्ति चिदंबरम के भी केस वैसे ही पड़ा हुआ है. राजनैतिक ऊंच नीच को भांपने में इस समय चिदंबरम से भारी भूल हो गयी है. समय का चक्र इस समय उनके खिलाफ खड़ा है, जिस पर चिदंबरम के खुद के किये हुए कुछ ऐसे कर्म है, जो अब उनके गले की फांस बन रही है.

समझ से परे यह है कि आखिर कांग्रेस ने अपनी बुद्धि कौन से फिक्स्ड डिपाजिट में जमा करा दी है. 120 वर्षों से भी पुरानी पार्टी के पास क्या इस समय सोचने के लिए कोई नेता नहीं बचा?

अधिरंजन चौधरी का वक्तव्य हो या उनके खुद के नेताओं का संवेदनशील मसलों पर गैरजिम्मेदाराना रवैय्या, ये सब बताता है कि राजा रजवाड़ों के राज भले चले गए हो, लेकिन अकड़ अभी भी शेष है. कोई बात नहीं. लोकतंत्र ने सबको उसका उचित स्थान दिखाया हुआ है.

2 Comments

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    September 5, 2019 - 5:23 pm

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