अरुण जेटली : “तुम आये इतै न कितै दिन खोये?”

मैंने सुनहरी बाग़ रोड की तरफ अपनी कार मोड़ी ही थी कि अचानक से मेरे मोबाइल की घंटी बजी और दूसरी ओर आवाज़ आई कि माननीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्री अरुण जेटली बात करेंगे. कुछ हैरान – कुछ आल्हादित, मैं थोड़ा सकपकाया. सुनहरी मस्जिद रोड के बगल में ही अपनी कार लगाईं.

जब आप बेरोज़गार पत्रकार हों और अचानक केंद्रीय और प्रसारण मंत्री का फोन आपके मोबाइल पर आ जाये तो आदमी यूँ भी हड़बड़ा जाता ही है.

दूसरी ओर से अरुण जी की संयत सी आवाज़ आई “कैसे हो उमेश?”
1999 के चुनाव के तुरंत बाद मेरी नौकरी चली गयी थी. चैनल के मालिक ने अनाप शनाप आरोप लगाकर मुझे नौकरी से हटाया था। घर में अगले महीने तक के राशन तक के पैसे नहीं थे.
संयोग हुआ कि #अरुणजेटली सूचना और प्रसारण मंत्री बन गए.
मैं अरुण जी को जानता तो था पर कई साल से उनसे भेंट भी नहीं हुई थी.

उन्होंने फोन पर हालचाल पूछा और कहा कि चैनल के मालिक उन्हें गुलदस्ता भेंट करने आये थे तो उन्होंने उनसे एक ही बात उनसे पूछी थी “उमेश के काम से आपको कोई तकलीफ थी क्या?”

यहाँ ये याद रखने की बात है कि इस बारे में अरुण जी से मेरी कोई बात नहीं हुई थी. मैं तो उनसे मिला तक नहीं था. नेताओं से मिलने में हमेशा मेरा स्वभावगत संकोच रहा है. कॉलेज के दिनों से उनसे मेरी पहचान थी तो थी पर मेरी नौकरी जाने के बारे में उनसे कोई बात नहीं हुई थी. अरुण जी पत्रकारों की खोज खबर रखते थे और किसी और से उन्हें पता पड़ा था कि मेरी नौकरी चली गयी है.

अरुण जी ने फोन पर ही मुझसे नौकरी कैसे गयी इसकी जानकारी ली और फिर मिलने को कहकर फोन रख दिया.
खैर, उसी शाम को मालिक साहब को फोन आया मुझे बुलाया और पहले से भी बड़े ओहदे  और तनख्वाह पर नौकरी का प्रस्ताव किया. पर मैंने उनको इंकार कर दिया कि मैं उनके साथ काम करना ही नहीं चाहता. दरअसल मैं उनके व्यवहार से बेहद क्षुब्ध हो चुका था.


कुछ महीने और बीत गए. घर की परेशानियाँ बढ़ चुकीं थीं. काम धंधा था नहीं. छोटे मोटे ट्रांसलेशन के काम से पूरे घर का खर्च कैसे चलता ?
अचानक एक दिन फिर अरुण जी का फोन आया.  “अरे भाई कैसे हो तुम? क्या कर रहे हो?” उस दिन अरुण जी ने मुझे कुछ प्यार भरा उलाहना भी दिया था. “बड़े अजीब हो तुम? इधर आये भी नहीं?”
ऐसा लगा कोई कृष्ण सुदामा से कह रहा हो “तुम आये इतै, न कितै दिन खोये.”
मैंने कहा “जी, मैं आपके पास आता हूँ.”
अरुण जी ने फिर कहा “ठीक है, आ जाना पर अभी तुम दूरदर्शन चले जाओ. वहां जाकर कार्यक्रम बनाने का प्रस्ताव दो और काम करो.”
मेरे संकोची स्वभाव को अच्छी तरह जानने वाले अरुण जी ने मुझसे ज़ोर देकर कहा “और हाँ , मुझे बताना ज़रूर कि क्या हुआ?”

जेठ के तपते रेगिस्तान में प्यासे कंठ में जीवनदायी अमृत बूंदों की तरह था ये अरुण जी का ये फोन.

मैं तुरंत दूरदर्शन गया और वहाँ मेरी एक करेंट अफेयर्स सीरीज़ – ‘दरससल’ कुछ ही दिनों में मंज़ूर हुई. मैं अपने पैरों पर फिर खड़ा हो सका. मेरे उस घोर निराशा, विपन्नता और अभाव के कालखंड में बस दो लोगों ने बिन कहे -बिन पूछे मदद का हाथ बढ़ाया. एक थे अरुण जेटली और दूसरे थे उनके परम मित्र रजत शर्मा. मेरे पूरे जीवन काल में किसी राजनेता द्वारा मदद का बस अरुण जी ही एकमात्र उदाहरण हैं.

मदद भी कैसी? बिन कहे, बिन मांगे, बिन किसी अपेक्षा और बिन किसी अहसान के.

अरुण जी यों भी मेरे लिए राजनेता कम और बड़े की तरह ज़्यादा थे. उसके बाद उनसे मुलाक़ातें होती रहीं. गपशप ही हुई, जब भी मैंने उनसे उस अहसान का ज़िक्र करना चाहा तो उन्होंने उसे बातों में उड़ा भर दिया. उनसे कई मुलाक़ातें हैं जो स्मृतिपटल पर हमेशा अंकित रहेंगीं. डूसू अध्यक्ष से लेकर देश के वित्तमंत्री का ओहदा उन्होंने बखूबी निभाया.

उनके स्वभाव और व्यवहार को लेकर लोग कई बातें भी करते रहें हैं. पर जिस तरह से उन्होंने मेरी मदद की, वह बताता है कि अरुण जेटली किस मिट्टी के बने थे. छोटों का ज़रुरत के समय ध्यान रखने वाले, हमदर्द और खैरख्वाह. ये उनके जाने का समय नहीं था. उन्हें अभी इस देश और समाज के लिए बहुत करना था. आप बहुत याद आएँगे अरुण जी !! 

उमेश उपाध्याय
उमेश उपाध्याय एक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और विचारक हैं। उन्होंने अपना व्यावसायिक जीवन दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में प्रारम्भ किया था। उन्होंने देश के कुछ प्रतिष्ठित मीडिया प्रतिष्ठानों जैसे पीटीआई, ज़ी टीवी, होम टीवी, सब टीवी, जनमत और नेटवर्क 18 में उच्च प्रशासनिक और सम्पादकीय पदों पर कार्य किया है। वे अक्टूबर 2015 तक नेटवर्क 18 के अध्यक्ष भी रहे।

2 Comments

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    September 5, 2019 - 5:56 pm

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