जब अपने ही बड़े भाई से लड़ बैठे थे सरदार पटेल!

देश में विचारधाराओं में भिन्नता कोई नई बात नहीं है. विचारों की भिन्नता ने ही समाज में चल रहे एक नैसर्गिक विचारशून्यता को झकझोरकर क्रांति की नई इबारत लिखी है. उदाहरण बहुत से मिल जाएंगे. लेकिन उन उदाहरणों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन सभी विचारों में से कोई श्रेष्ठ नहीं चुना जा सकता. ऐसा ही कुछ कार्य विट्ठलभाई पटेल ने भी किया था. राजनीति में जानकारी न रखने वाले शायद उनको सरदार पटेल के बड़े भाई के रूप में जानते होंगे.

27 सितंबर 1873 में गुजरात के अंदर जन्में श्री विट्ठलभाई पटेल प्रख्यात विधिवेत्ता, स्वतंत्रता आन्दोलन के देश-विदेश में प्रचारक और प्रवर्तक थे. सुभाष चन्द्र बोस के विचारों से वो काफी प्रभावित थे. अपने जीवनकाल के मध्य उन्होंने एक ऐसा भी निर्णय लिया जहां उनके समक्ष स्वयं सरदार पटेल खड़े हो गए थे. फिर भी विट्ठलभाई पटेल का दृढ़ निश्चय अटल रहा.

विट्ठलभाई पटेल गांधी की विचारधारा से सहमत नहीं थे. वह आक्रमकता और निडरता को बढ़ावा देते थे. उनका मानना था कि गांधी की विचारधारा से देश को आज़ादी के लिए बेहद बड़ा मूल्य चुकाना पड़ेगा. विट्ठलभाई की यही सोच कहीं न कहीं बंटवारे के समय सच भी सिद्ध हुई थी.

अपने शुरुआती दिनों में विट्ठलभाई पटेल ने अपनी पढ़ाई बॉम्बे में ही की थी. प्रारंभ से ही स्वतंत्रता आंदोलन में लगे परिवार को देख विट्ठलभाई में भी एक जन्मजात क्रांतिकारी था. प्रारंभिक पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका मन इंग्लैंड में पढ़ाई करने का था. इस सोच को पंख तब लगे जब बड़े भाई के लिए लौह पुरुष सरदार पटेल ने पैसे जमा करने शुरू किए. अंततः उन्होंने लंदन के एक कॉलेज में पढ़ाई शुरू की और 36 माह के कोर्स को मात्र 30 माह में पूरा कर लिया. भारत आने के बाद वह अहमदाबाद में एक अदालत में काफी मशहूर भी हुए थे.

परंतु नियति का खेल ऐसा था कि भारत आते ही उनकी पत्नी का देहावसान हुआ. वह इस धक्के को बर्दाश्त नहीं कर पाए. इस दुख की पीड़ा से ध्यान हटाने के लिए वह लोक सेवा के कार्यों में संलिप्त हो गए जहां उन्हें कांग्रेस पार्टी का साथ मिला. उस समय भी वह महात्मा गांधी से विचारों को लेकर असहमत हुआ करते थे. इतने मतभेदों के बाद भी उनके बीच कोई मनभेद नहीं आया. असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन उसके बाद बिना किसी सलाह के चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लेने के गांधी के निर्णय के खिलाफ उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर उन्होंने स्वराज पार्टी की स्थापना की जो सदन के अंदर कांग्रेस की गलत नीतियों का विरोध करती. फिर भी विट्ठलभाई पटेल और सरदार पटेल को यह नहीं मालूम था कि आगे उनका इंतजार कौन कर रहा है.

एक समय ऐसा भी था जब विट्ठलभाई पटेल से अंग्रेज़ी हुकूमत चिढ़ती थी. बिना किसी जनाधार के राजनीति में आये विट्ठलभाई ने अपनी वाकपटुता और भाषण शैली से एक बड़ा हुजूम अपने पीछे खड़ा कर लिया. कानून का जानकार होने का लाभ उन्हें मिला. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विट्ठलभाई पटेल को जेल हुई. इससे पहले उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा भी दे दिया था और कांग्रेस के पूर्ण स्वराज की मांग पर दोबारा कांग्रेस का हाथ थाम लिया था.  लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के चलते उनको पहले ही जेल से रिहा कर दिया गया. इसके बाद वो अपना इलाज कराने के लिए यूरोप चले गए. वहां उनकी मुलाकात नेता जी सुभाष चंद्र बोस से हुई. वह भी अपना इलाज कराने यूरोप गए हुए थे.

नेता जी की तबियत में तो सुधार होता गया लेकिन विट्ठलभाई की तबियत लगातार नाजुक थी. जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने नेता जी के विचारों से सहमति दिखाते हुए इस बात को स्वीकारा कि नेता जी का कार्य भारत को ब्रिटिश हुकूमत से निजात दिला सकता है. इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने करीब 2 लाख रुपये (उस समय यह धनराशि बहुत हुआ करती थी) देश की सेवा के लिए सुभाष चंद्र बोस के नाम दान की इससे वल्लभ भाई पटेल बहुत नाराज हुए. उन्होंने इसकी एक वसीयत भी बनवाई.

दरअसल जिस वसीहत को लेकर सुभाष चन्द्र बोस देश सेवा में तल्लीन थे, उसी वसीहत को वल्लभ भाई पटेल ने मानने से इनकार कर दिया. कालांतर में इसके खिलाफ बोस कोर्ट भी गए लेकिन उनको वहां भी निराशा हाथ लगी. 

विट्ठलभाई पटेल के एक बहुत करीबी मित्र हुआ करते थे. नाम था गोवर्धन भाई पटेल. उन्होंने विट्ठलभाई पटेल की जीवनी लिखते हुए इस बात का ज़िक्र अपनी किताब “विट्ठलभाई पटेल : लाइफ एंड टाइम्स” में करते हुए यह लिखा कि दोनों भाई कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में से थे लेकिन धीरे धीरे दोनों ही न केवल एक दूसरे से दूर होते चले गए बल्कि गांधी की विचारधारा को लेकर दोनों में मतभेद भी थे. यही कारण था कि सुभाष चन्द्र बोस की विचारधारा से प्रभावित विट्ठलभाई ने 2 लाख रुपये की वसीयत बोस के नाम कर दी. वो बोस की आक्रमकता में स्वयं को देखा करते थे. यही बात वल्लभ भाई पटेल को अच्छी नहीं लगी थी.

गोवर्धन भाई पटेल की मौजूदगी में ही वह वसीयत लिखी गयी थी और उसके पूरे और लागू किये जाने की ज़िम्मेदारी गोवर्धन और डी टी पटेल की थी. उस दौरान विट्ठल भाई पटेल ऑस्ट्रिया में ही थे और वहीं एक क्लिनिक के अंदर वो वसीयत लिखी गई. अब तक लगभग सभी नेताओं को पता था कि दोनों भाई एकदूसरे को नज़रंदाज़ कर रहे हैं.

22 अक्टूबर 1933 को उनकी मृत्यु ऑस्ट्रिया में हुई. विट्ठलभाई पटेल का पार्थिव शरीर जब भारत आया, उस समय सरदार पटेल नासिक जेल में थे. उन्होंने पूरा प्रयास किया कि बड़े भाई के अंतिम संस्कार में सम्मिलित हो, लेकिन हुकूमत के कुछ ऐसे सवाल थे जिसने सरदार पटेल को यह करने से रोक दिया. हुकूमत की उन शर्तों को मानने से सरदार पटेल ने साफ इनकार कर दिया जो उनको स्वाभिमान विरुद्ध लगे.

लेकिन उसके बाद सरदार पटेल ने उस वसीयत पर सवाल उठाए. जब उस वसीयत की एक मूल कॉपी सरदार को नासिक जेल में दिखाई तब उन्होंने वसीयत के हस्ताक्षर के प्रमाणीकरण पर ही प्रश्न चिन्ह लगाए. कानूनी जानकर होने के नाते सरदार पटेल भी दांव पेंच जानते थे.

उनका सवाल था कि अगर जिनेवा में विट्ठलभाई के तीन परिचित भूलाभाई देसाई, वालचंद हीराचंद और अंबालाल साराभाई भी मौजूद थे तो उन्हें मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया? इसके साथ ही वसीयत करते समय तीन बंगाल के लोग ही वहां क्यों थे? उनमें भी एक सुभाष और दो आस्ट्रिया में अध्ययन कर रहे बंगाली स्टूडेंट थे. यह बड़े प्रश्नचिन्ह खड़े करता है जो जवाब के योग्य है.

सरदार पटेल के इन सवालों को सुनकर गोवर्धनभाई पटेल भी सकते में थे. उन्होंने इसका जवाब देने के लिए सुभाष चन्द्र बोस को चिट्ठी लिखी थी. जब कोई जवाब नहीं आया तब गोवर्धनभाई पटेल ने ही यह चिट्ठी हाइकोर्ट के समक्ष रखी. अब तक वसीयत को लेकर काफी बड़ा बवाल बन चुका था. यह इतना बड़ा हो चुका था कि इसके दूरगामी असर सरदार पटेल और नेता जी के रिश्तों पर भी दिखाई देने लगा. वैसे सुभाष को संपत्ति देने के पीछे वसीयत में कारण निहित था जिसमे कहा गया कि स्वतंत्रता आंदोलन के लिए यह धनराशि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को दी जा रही है.

अभी तक सरदार पटेल और सुभाष चन्द्र बोस के रिश्तों में खटास दिखने लगी थी. 1938 में जब सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने तब वल्लभ भाई पटेल ने उस धनराशि को कांग्रेस की एक समिति को देने का सुझाव दिया. सुभाष चन्द्र बोस इस पर राजी थे. बाद में इसी समिति को लेकर दोनों में विवाद बढ़ गया.

इसके बस सुभाष चन्द्र बोस हाइकोर्ट गए जहां बाद में बांबे हाईकोर्ट में जस्टिस बीजे वाडिया ने वल्लभ को उनके बड़े भाई की संपत्ति का कानूनी वारिस माना. वल्लभभाई ने घोषणा की कि ये संपत्ति विट्ठलभाई मेमोरियल ट्रस्ट को दी जाएगी. सुभाष ने इसके खिलाफ अपील की. शरतचंद्र बोस उनके वकील थे. सरदार पटेल बाद में वसीयत का मुकदमा जीत गए और उन्होंने ये पूरी संपत्ति विट्टलभाई पटेल मेमोरियल ट्रस्ट को दे दी थी.

इस पूरे मामले ने एक बड़ी चीज उजागर कर दी. स्वतंत्रता को लेकर विचारों में भिन्नता ने कई बार ऐसे क्षणों से भी परिचित कराया जहां देश के बड़े नेताओं के मध्य द्वंद जैसी स्थितियाँ नज़र आई थी. यह राष्ट्र के लिए अच्छी बात नहीं थी, लेकिन इस पूरे वृत्तांत के मध्य आप किसी को भी दोषी मानें, सत्य यही है कि इसने विट्ठलभाई पटेल की उस आखिरी इच्छा को शायद अधूरी ही रखा जो दुर्भाग्यवश उनके ही छोटे भाई के कारण पूर्ण न हुई.

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