प्रेम और TRP के बीच पिसता एक परिवार का सम्मान!

बरेली से भाजपा के विधायक राजेश मिश्रा इस समय एक विचित्र विडंबना में फंसे हुए हैं. देश में प्यार मोहब्बत जैसी बातें बॉलीवुडिया संस्कृति से भले उठा ली गयी है और युवा समाज प्रेम को सिर्फ बागी तेवर से ही हासिल करने को असली प्रेम समझा है. उनकी बेटी साक्षी मिश्रा को टीवी चैनलों पर बिठाकर TRP की एक रेस छिड़ी हुई है. इस बीच घर की बात बाजार में आने से कहीं न कहीं विधायक जी की प्रतिष्ठा तो दांव पर लग ही गयी है.

लेकिन एक समय के लिए ज़रा हम उनको एक विधायक की हैसियत से नहीं बल्कि एक पिता की हैसियत से देखें. प्रेम एक निश्छल भाव है जिसको आपको शब्दों में बयान नहीं कर सकते हैं. परंतु हर प्रेम की कुछ सामाजिक सीमाएं होती है. भले ही लिब्रलिज़्म की रेस में हम पाश्चात्य संस्कृति के फॉलोवर्स हो गए हों, लेकिन यूँ सरेआम पिता की पगड़ी उछालना कहीं से भी एक अच्छा कृत्य तो नहीं कहा जा सकता. पत्रकारों का एक झुंड इसको ऑनर किलिंग जैसी संज्ञाओं में ढालने का प्रयास कर रहा है. यह सच है कि रसूखदार लोगों की शान के आगे कई जिंदगियां कुर्बान हुई हैं, लेकिन क्या एक बेटी का यह कर्तव्य नहीं होता कि वह अपने प्रेम के साथ पिता के सम्मान की भी रक्षा करे. 

कोई यह नहीं कह रहा है कि साक्षी के भाव में कुछ खोट था. वैसे भी प्रेम में पड़े हुए जोड़ों को घर दिखाई भी कहाँ देता है. लेकिन फिर भी मर्यादाओं की एक सीमा आज भी समाज में है जहां पर हम सभ्य तरीके से दो परिवारों के बीच बात करते हैं. यही हमारे समाज का नियम भी है और तर्कसंगत उपाय भी. लेकिन अब टीवी स्टूडियो में उस बात को तय किया जा रहा है जो कायदे से एक बंद कमरे के अंदर होता है.

साक्षी जिसके प्रेम में है, उन महाशय के भी सोशल मीडिया पर काफी चर्चे हैं. जाति पर भी सवाल उठ रहे हैं. लेकिन आज के समय जाति बहुत पीछे छूट गयी है. असल बात है परिवार का स्नेह जिसकी खिल्लियां सोशल मीडिया और टीवी स्टूडियो में उड़ाई जा रही है. यह सही है कि बालिग हो जाने के बाद किसी भी जोड़े को आपस में शादी करने का अधिकार है, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि घर वालों के दिये हुए प्रेम और वात्सल्य को बाजार में उछाला जाए. समझ में यह नहीं आता है कि स्टूडियो के अंदर बैठ कर एक व्यक्ति का वह अपराध क्यों सिद्ध किया का रहा है जो हुआ ही नहीं है. 

साक्षी अपने भविष्य के प्रति कितनी सजग हैं यह वही जानें, लेकिन एक पिता होने के नाते राजेश मिश्रा तो ज़रूर उसके लिए चिंतित होंगे. इस बीच मीडिया के द्वारा निभाया जा रहा रोल निंदनीय ही कहा जा सकता है. किसी के भी घर के मामले को यूं पूरे देश के सामने उछालना कितना सही है? लाइव टेलीविज़न पर घरवालों को फोन लगाकर जवाब मांगना कहाँ तक न्यायोचित है? यह किसी फिल्म की रील तो नहीं चल रही अपितु यह असल जिंदगी है. यहां दो नहीं बल्कि पूरे परिवार का जीवन तथा सम्मान दांव पर है. क्या इस नैतिक जिम्मेदारी को समझा जाएगा? 

यहाँ किसी को भी क्लीन चिट देने का हमारा प्रयास नहीं है. हम बस इतना कहना चाहते हैं कि सच्चाई सिर्फ एक पहलू की नहीं होती बल्कि अनेकों पहलू उससे जुड़े रहते हैं. इस बात का ध्यान रखा जाए जब आप किसी के घर में तांकझांक करते हैं. 

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