क्या भारत नहीं था आक्रमणकारी? इतिहास का कहना कुछ अलग है

कारगिल विजय दिवस की संध्या पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस देश ने कभी किसी के ऊपर हमला नहीं किया. हम हमेशा से अहिंसा के पुजारी रहे हैं जिसने सदैव शांति को लेकर पहल की है. उनकी यह बात एक राष्ट्रीय कार्यक्रम में बोलने के लिए तो ठीक थी, लेकिन कुछ तथ्य उनकी इन बातों को “अर्द्धसत्य” बताते है. नहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने झूठ नहीं बोला. किसी भी राष्ट्रीय स्तर का नेता जो हमारे देश का प्रतिनिधित्व करता हो, वो सार्वजनिक मंच पर ऐसी बातें क्यों करेगा जिससे वर्षों पुरानी बनाई गई हमारी “इमेज” पर एक दाग लगे. और वह भी प्रधानमंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति.

परंतु क्या सच में हमने किसी भी देश पर आक्रमण नहीं किया? इतिहास के झरोखे से देखें तो हमें उत्तर कुछ और ही मिलेंगे. चोला साम्राज्य ने इंडोनेशिया के जावा तक आक्रमण कर उसको अपने अधीन किया था. सम्राट अशोक जिसने बाद में बौद्ध धर्म अपना लिया, उसने भी श्रीलंका पर हमला किया था. उसको जीत भी लिया था. यहां तक कि इतिहास के सबसे महानतम सम्राटों में से एक सम्राट चंद्रगुप्त ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर उसको अपने अधीन किया था. यह ऐतिहासिक तथ्य है जिनसे आप मुंह नहीं मोड़ सकते.

गाँधी की विचारधारा सत्य और अहिँसा वाली थी. उस विचारधारा ने पिछली शताब्दी के अधिकतर वर्ष एक दबदबा कायम रखा. या यूं कहें कि परतंत्रता से स्वतंत्रता की ओर बढ़े राष्ट्र को सिर्फ गांधी में ही अपना मसीहा दिखाई दिया. लेकिन उतना ही बड़ा सत्य यह भी है कि ताकतवर का ही सम्मान होता है. आदर्शवादी बातों के बीच यह बात थोड़ी अटपटी लगती है. लिबरल बिरादरी को तो यह गलत भी लगे, लेकिन अस्वीकार्यता और स्वीकार्यता के मध्य सत्य हमेशा अकेला खड़ा रहता है. आज भी यदि हम सुरक्षित हैं तो सीमा पर हमारी सेना खड़ी है, इसलिए हम आज स्वतंत्रता का आनंद उठा रहे हैं.

यहां तक कि गाँधी के नाम से राजनीति को बढ़ाने वाले परिवार की सबसे ताकतवर महिला में भी 1971 में बंग्लादेश पर आक्रमण ही किया था. ताकि उन लोगों को छुड़वाया जा सके जो ईस्ट पाकिस्तान के अंदर पशुओं जैसे तिरस्कृत किये जा रहे थे. कुछ लोग इसको “हमला” नहीं बल्कि “सुरक्षात्मक कदम” कहना अधिक पसंद करेंगे, लेकिन वहां भी यह तथ्य वैसा का वैसा ही रहेगा कि शांति वहीं आती है जहाँ अशांति को रोकने का बाहुबल हो. आज की दुनिया में जहां सभी परमाणु बमों के बटन पर बैठे हुए हैं, वहाँ तो यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है.

दुर्भाग्यवश हमारे देश का इतिहास सिर्फ मुग़ल काल से जानने वाले लोगों की यात्रा गाँधी पर आकर रुक जाती है. उनको शायद वही विचारधारा सबसे प्रिय है. व्यक्तिगत रूप से यह उनका अपना निर्णय है. परंतु इससे तथ्यों में कोई बदलाव नहीं आता है कि हमारे यहां से भी अपनी सुरक्षा और विस्तारीकरण में उचित कदम उठाए गए हैं.

ताकतवर हो तो ताकतवर नज़र आना ज़रूरी है. आज के युग में शांति बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं कार्य कर रही हैं. फिर भी दुनिया में लीबिया, ईरान और इराक जैसे देश मिल ही जाते हैं. उनके साथ ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि उन्होंने इतिहास के एक कोने ने अपनी ऐसी छवि बनाई हुई थी जहां उनको आक्रमणकारी कहा गया. दूसरे की संस्कृति को खत्म किये बगैर अपनी संस्कृति का पोषण कैसे करना है. यह उन सम्राटों से सीखना चाहिए जो इतिहास के पन्नों में अमरता प्राप्त किये हुए हैं.

एक गाल पर थप्पड़ खाने के बाद दूसरा गाल आगे कर देना एक ज़माने में असरदार हुआ करता होगा, लेकिन आज की दुनिया में हाथों को इतना मज़बूत बनाना आवश्यक हो गया है कि सामने वाला  हाथ तो क्या, नज़र उठाने की भी चेष्टा न कर सके.

मोदी जी को भी यह लगता है. तभी तो लगातार सेना के हथियारों का आधुनिकीकरण हो रहा है. बस कुछ आदर्शवादी बातें मंचों पर से करना एक मजबूरी है, क्योंकि सवा सौर करोड़ देशवासियों को एकसाथ जोड़े रखने के लिए यह आवश्यक है कि शांति का माहौल बनाया रखा जाए.

1 Comment

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    Satbeer singh
    July 30, 2019 - 11:00 am

    History read again afgan Lanka both are aryawat area

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