हॉरर फ़िल्मों से ख़त्म होता हॉरर

एक वक़्त था जब रात मैं रात में हॉरर फ़िल्में देखने से बचा करती थी. देखने का मन होता तो केवल दिन में ही देखती. देखें भी क्यों ना? आख़िर डरने का रोमांच ही अलग होता है. स्क्रीन पर टकटकी लगाए केवल इस बात का इंतज़ार करना कि कब भूत स्क्रीन पर नज़र आएगा? जब फ़िल्म का एक पात्र यह बताए कि उसके घर में एक नकारात्मक शक्ति है तो क्या बाक़ी लोग विश्वास करेंगे? जब वो छोटा बच्चा एक ऐसा दोस्त बना लेगा जिसे किसी ने नहीं देखा तो क्या उसके माँ बाप उसे बचा पाएँगे? 

वक़्त के साथ साथ हॉरर फ़िल्में ‘Jump scares’ पर निर्भर हो गयीं. अर्थात आपको कहानी के भूतिया पात्र से डर नहीं लगेगा पर स्क्रीन पर जब वह अचानक आए तभी डर लगेगा. मैंने कल रात ही ‘Annabelle comes home’ देखी. रात का शो था, मन में डर भी था कि कहीं फ़िल्म इतनी डरावनी न हो कि कई रातों तक अंधेरे कमरे में जाने से और शीशे में देखने से डर लगे. पर इस फ़िल्म ने काफ़ी निराश किया. दोष केवल इसी फ़िल्म का नहीं है.

पिछले कुछ समय में आई कई भूतिया फ़िल्मों ने मुझे निराश किया है. फ़िल्म में एक गुड़िया है जो एक तरह से नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करती है. पिछली Annabelle सीरीज़ की फ़िल्मों में यह गुड़िया किसी ना किसी ने अपने प्रियजन को तोहफ़े में दी होती थी. सबके मन में एक ही सवाल उठता था कि आख़िर कोई इतनी अजीब से दिखने वाली गुड़िया को ख़रीदेगा ही क्यों? इस फ़िल्म में भूतों से लड़ने वाले एड और लॉरेन के घर में यही गुड़िया पादरी से झाड़ फूँक करवाने के बाद रखी होती है. 

लगभग पचास के ऊपर हॉरर फ़िल्में देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि फ़िल्म की कहानी लिखने से पहले कोई नियम क़ायदे की किताब पढ़ी जाती है. कुछ पैटर्न्स हैं जो हर कहानी में आपको देखने मिलेंगे.

नियम नम्बर एक – भूत ग़रीबों के घर नहीं आते. 

आत्माओं को भी विलासी ज़ीवन चाहिए. हवेली महल या कम से 6-7 कमरों के घर से नीचे तो उनको स्वीकार्य ही नहीं है. घर में इतने कमरे होंगे और भूत एक ऐसे कमरे में होगा जो बाक़ी कमरों से अलग होगा. उन्हें भी लगता होगा कि मुफ़्त में रह रहें हैं तो अच्छा वाला कमरा क्यों ले. जब रात में सब सो जाएँगे तब बाक़ी कमरों का लुत्फ़ उठाया जाएगा.

आत्माओं को भी विलासी ज़ीवन चाहिए. हवेली महल या कम से 6-7 कमरों के घर से नीचे तो उनको स्वीकार्य ही नहीं है. घर में इतने कमरे होंगे और भूत एक ऐसे कमरे में होगा जो बाक़ी कमरों से अलग होगा. उन्हें भी लगता होगा कि मुफ़्त में रह रहें हैं तो अच्छा वाला कमरा क्यों ले. जब रात में सब सो जाएँगे तब बाक़ी कमरों का लुत्फ़ उठाया जाएगा.

नियम नम्बर दो – आत्माओं से अच्छा ससपेंस बनाना कोई नहीं जानता 

आपको शीशे में कोई नज़र आता है और जब आप पलट कर देखते हैं तो वो ग़ायब हो जाता है. बाहर कमरे से आवाज़ आती है पर जब आप जाकर देखते हैं तो कुछ नहीं होता. अचानक टीवी चल जाती है, गाने बजने लगते हैं. लगता है आत्माएँ भी हॉरर फ़िल्मों से प्रेरित हैं. सस्पेंस क़ायम करना कोई इनसे सीखे. प्रेतात्माएं सीधे सामने आकर खड़ी नहीं होती. वे हमेशा आपके पीछे खड़ी होती हैं. पाँच छः बार झलक दिखलाने के बाद ही आपके सामने आने की हिम्मत कर पाती है. 

नियम नम्बर तीन – भूत हमेशा दरवाज़ा खटखटाकर और घंटी बजाकर ही अंदर आते हैं 

शिष्टाचार तो कोई प्रेतों से सीखे. हमारे घर से कचरा उठाने वाले भैया भी एक बार दरवाज़ा खटखटाकर खिसक लेते हैं. पर फ़िल्मों की आत्माएँ ऐसा नहीं करती. वो पहले घंटी बजाती हैं, फिर दरवाज़े पर दस्तक देती हैं. अगर आपने दरवाज़ा नहीं खोला तो फिर इतना ज़ोर से दरवाज़ा पीटती हैं कि मूवी हॉल में बैठे सभी दर्शकों के कान फट जाएँ पर बग़ल वाले कमरे में सो रहे घरवालों को भनक तक नहीं पड़ती.  

नियम नम्बर तीन – हवेली महलों में रहने वाले अच्छे ट्यूबलाइट और बल्ब नहीं ख़रीद पाते.

किसी भी अंधेरे कमरे में घुसते ही सबसे पहले हमारा हाथ स्विचबोर्ड पर जाता है. पर डरावनी फ़िल्मों में लोग तब तक बत्ती नहीं जलाते जब तक उन्हें यह शक न हो कि कमरे में कोई है. और अगर बत्ती जलाते भी हैं तो उसकी रोशनी ना के बराबर होती है. सबसे अजीब बात कि हमेशा पीले रंग वाले बल्ब ही होते हैं.  

नियम नम्बर चार – अगर आप भूत से डर कर भाग रहे हैं तो गिरेंगे ज़रूर. कोई भी भूतिया फ़िल्म उठाकर देख लें, भूत से डरकर भागते हुए बिना कारण नीचे ना गिरें ऐसा हो ही नहीं सकता

नियम नम्बर पाँच – भूत देख कर किसी की बोलती बंद नहीं होती. असल ज़िंदगी में अगर आप सपने में कुछ डरावना देख लें तो आपके मुँह से आवाज़ नहीं निकलती. मेरे दादी बताती थी कि अगर सच में कभी भूत देख लोगे तो लड़ना भागना दूर, सबसे पहले पैंट गीली होगी. पर फ़िल्मों में डरावने से डरावने भूत देखने पर भी किसी को न दिल का दौरा पड़ता है, न उनकी बोलती बंद होती है. उलटा भूत देखने के बाद भी वो तहख़ाने में उसे ढूँढने चले जाते हैं.  

नियम नम्बर छः : धार्मिक प्रतीक या यीशू की मूर्ति दिखाते ही भागते हैं भूत. सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि अगर भगवान की मूर्ति से आत्मा इतना ही डरती है तो घर के हर कमरे और कोने में मूर्ति क्यों नहीं लगाई जाती. और अगर आत्माएँ इन चिन्हों और मूर्तियों से इतनी ही भयभीत हैं तो फिर ये घर में प्रवेश ही क्यों करती हैं? या डराने के लिए क्रॉस उलटा कैसे कर देती हैं?

यह लेख हाल ही में देखी हुई फ़िल्म का नहीं है पर हॉरर शैली में बनाई गयी लगभग 95% फ़िल्मों का है. ज़रूरी है कि इस शैली में अब थोड़ी रचनात्मकता दिखाई जाए. ख़ून से लथपथ भूत देखकर अब शायद बच्चे भी नहीं डरते. बच्चों के रोने की आवाज़ और भूत के चिल्लाने के आवाज़ों से अब रातों की नींद नहीं उड़ती. लगभग हर शैली की फ़िल्मों में कई दशकों तक घिसेपिटे प्लॉट का इस्तेमाल किया जाता रहा है.

हॉरर फ़िल्मों में कहीं ना कहीं आज भी पूरी तरह से बदलाव नहीं आया है. कलेजा मुँह तक ले जाने वाले दृश्य आज हास्यास्पद लगते हैं. अगर आपने एन श्यामलन की फ़िल्में देखी हैं तो आपको शायद यह समझ आएगा कि दर्शकों को डराने के लिए प्रेत आत्माओं की जरूरत नहीं है. आपकी कहानी या उसके पात्र भी ऐसे हो सकते हैं जिनके बारे में सोचकर ही आपके रोंगटे खड़े हो जाएँ. फ़िल्मकारों को अब 80 के दशक की कहानियों से ऊपर उठना होगा.

Rashmi Singh
Writer by fluke, started with faking news continuing the journey with Lopak.

1 Comment

  1. Avatar
    Aashish shukla
    July 7, 2019 - 11:54 am

    Horror फिल्म्स खासकर हिंदी फिल्मों में नग्नता के अलावा कुछ नही होता।।।वो ज़माना गया जब 20 साल बाद जैसी फिल्में बनती थीं या साइलेंस ऑफ लैम्ब्स जैसी

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