पत्रकार जी! अभिव्यक्ति की आज़ादी सबको बराबर है!

हमारे देश के अंदर एक खास वर्ग ऐसा है जिसने अभिव्यक्ति की आजादी को भी “कंडीशनल टर्म्स” में बांट दिया है. कहने का मतलब यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी उनके अनुसार अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग प्रकार की होती है. यही कारण है कि जिस प्रबुद्ध वर्ग को देशभर में इतना सम्मान इतने वर्षों से मिला, आज वह अपने डबल स्टैंडर्ड्स के लिए कुख्यात होता जा रहा है.

3 जुलाई 2019. यह वह तारीख है जब इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार यह छापता है कि आरएसएस समर्थक एक समूह ने नागरिकों को एंटी नेशनल सिद्ध करना शुरू कर दिया है. जब आप इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार में ऐसी खबर पढ़ते हैं तो कहीं ना कहीं आपको उस पर विश्वास करने का मन कर जाता है, लेकिन असल सच्चाई आपको तभी पता चलती है जब आप उस एक विषय के ऊपर पूर्ण जानकारी रखते हो. आज सोशल मीडिया एक विडंबना की तरह उभर कर आया है. सोशल मीडिया की शुरुआत लोगों को जानकारी प्रदान करने के लिए की गई थी, लेकिन आज के युग में जानकारी प्रदान करने से ज्यादा लोगों भ्रमित करने का कार्य किया जा रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस का हवाला देते हुए हफिंगटन पोस्ट भी कुछ ऐसा ही लिखता है. हफिंगटन पोस्ट केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को कटघरे में खड़ा करते हुए यह कहता है की सरकार द्वारा उन लोगों को सम्मानित किया गया जो इस देश के लोगों पर एंटी नेशनल जैसे आरोप लगाते हैं. लेकिन आखिर इतना बवाल हुआ किस पर है? आखिर यह लोग कौन हैं जिनके ऊपर इंडियन एक्सप्रेस और हफिंगटन पोस्ट जैसे ऑनलाइन पोर्टल इतना छाप रहे हैं? दरअसल इस टीम का नाम है “क्लीन द नेशन”.

“क्लीन द नेशन” पुलवामा हमलों के बाद गठित लोगों द्वारा बनाया गया एक अनौपचारिक समूह है. हमारी सरकार की सहायता करने के लिए सामान्य नागरिक सक्षम बन सके, इसके लिए एक मंच के रूप में इसका गठन किया गया था. विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की 9 सदस्यीय टीम के रूप में जो शुरुआत हुई, वह बढती-बढती 40 से अधिक सक्रिय सदस्यों तक पहुंच गई. इस मंच का एकमात्र उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों की पहचान करना है जो राष्ट्र के खिलाफ पोस्ट करते हैं या सोशल मीडिया पर आतंकवादियों और देश-द्रोहियों का समर्थन करते हैं.

इस समूह के सदस्यों का कहना है कि वे ऐसा सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह देश से प्यार करते हैं. वे अपनी दैनिक दिनचर्या से रिसर्च के लिए समय निकालते हैं ताकि सोशल मीडिया पर प्राप्त सूचनाओं का सही तरीके से पता लगाया जा सके. ऐसे बहुत से लोग हैं जो राष्ट्र के खिलाफ ना सिर्फ बोलते हैं, बल्कि आतंकवादी और विद्रोहियों का समर्थन भी करते हैं. उनका उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों की पहचान करना है जो देशविरोधी पोस्ट करते हैं अथवा आतंक/विद्रोह का समर्थन करते हैं. इसके साथ ही उनकी उन कंपनियों / संस्थानों को रिपोर्ट करना है जहां वे काम करते हैं / अध्ययन करते हैं ताकि उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सके.

उनका मानना है कि देश के अंदर पुलवामा हमले का जस्टिफिकेशन स्वीकार्य नहीं होगा. देश विरोधी मानसिकता वाले लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी मिले या नहीं, इसमें देश की विभिन्न विचारधाराओं का अपना अलग मत है, लेकिन ये बात पक्की है कि इस देश के अंदर जो भी रहता है उसे इस देश के प्रति वफादार रहना ही होगा. क्योंकि इसी जमीन से उन्हें सबकुछ प्राप्त होता है.

पर मैं ये सब अब क्यों लिख रहा हूँ? पिछले शनिवार को “क्लीन द नेशन” ग्रुप को सोशल मीडिया पत्रकारिता के लिए नारद सम्मान से सम्मानित किया गया. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक “इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र” द्वारा दिया जाने वाला एक सम्मान है. यह सम्मान समारोह नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित हुआ था. विजेताओं को सम्मानित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह मनमोहन वैद्य और केंद्रीय मंत्री श्रीमति स्मृति ईरानी उपस्थित थे.

कहानी कुछ पत्रकारों के लिए यहीं से बिगड़ गई. स्थिति यह हो गई कि निष्पक्ष पत्रकारिता के “स्वयंभू ब्रांड एंबेसडर” रवीश कुमार ने अपनी फेसबुक वॉल पर इस मामले में एक लंबा लेख लिख डाला. इस लेख को लिखने के लिए वह इतिहास के पन्नों में पीछे चले गए. विडंबना यह रही कि अपने हर प्राइम टाइम में सरकार के किसी मंत्री को इतिहास की बातें करते देख वर्तमान और भविष्य की तरफ फोकस करवाने वाले पत्रकार महोदय इस एक बात पर ऐतिहासिक पन्ने बांचने लगे. नाज़ियो की बात होने लगी और उन्होंने CLEAN THE NATION को ऑरवेल की प्रसिद्ध काल्पनिक कृति THOUGHT POLICE से जोड़ दिया. इंडियन एक्सप्रेस का हवाला भी दिया गया और हफिंगटन पोस्ट का भी . लोगों की “अभिव्यक्ति की आजादी” से लेकर उनकी “निजता के हनन” की दुहाइयाँ दी गई. कहा गया कि एक देश के अंदर देशवासियों को ही “एंटी नेशनल” कैसे कहा जा सकता है. यह भी बताया गया कि कौन से लोग “क्लीन द नेशन” द्वारा की गई शिकायतों की वजह से अपनी नौकरी गंवा बैठे हैं या अपने कॉलेज से रस्टिकेट हो चुके हैं.

हमारे देश के अंदर कई दिनों से सिक्के का एक ही पहलू दिखाने का रिवाज चल पड़ा है. इस कहानी में “क्लीन द नेशन” को कटघरे में खड़े करने वाले पत्रकारों को पत्रकारिता के गुण सिखाने की कोई आवश्यकता नहीं. क्योंकि वह पहले से ही इसमें प्रबुद्ध है, लेकिन जब ऐसे प्रबुद्ध लोगों के द्वारा सिर्फ एक खास मकसद से एक समूह का “चरित्र हनन” करते हुए हम देखते हैं तो काफी अफसोस होता है.

पहले जरा तर्कों की बात कर लेते हैं. बात करते हैं अभिव्यक्ति की आजादी की. इस देश के संविधान द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी सभी देशवासियों को दी गई है लेकिन उस अभिव्यक्ति की आजादी के साथ ही कुछ जिम्मेदारियां भी आपके पास आती हैं. आप देश के जवानों की निर्मम हत्या के जस्टिफिकेशन को अभिव्यक्ति की आजादी कहकर इसलिए नहीं खारिज कर सकते हैं क्योंकि कहने वाला कुछ भी कह सकता है. जितने भी नामों को इन सभी पत्रकारों और मीडिया पोर्टल द्वारा दिखाया गया, उनके साथ क्या हुआ यह तो सबने बहुत ही अच्छी तरीके से आपके समक्ष रखा. लेकिन वह क्यों हुआ उसकी एक झलक भी आप तक नहीं पहुंचने दी.

मेरा आपसे अनुरोध है कि इनमें से किसी भी एक केस को उठा कर आप देख सकते हैं कि आखिर उस व्यक्ति की शिकायत क्यों की गई है. कल ऑप इंडिया में छपे एक लेख में टीम के एक सदस्य अविरल शर्मा ने विस्तार से उनका उल्लेख किया है. शिकायत करने वाले व्यक्ति ने बकायदा उस व्यक्ति का स्क्रीनशॉट लेकर उसकी संस्था तक भेजा है। उसके द्वारा की जा रही राष्ट्र विरोधी बातों को सबके समक्ष रखा है. क्लीन द नेशन ने कभी भी यह दावा नहीं किया कि वह किसी भी मीडिया चैनल, पत्रकार या किसी विचारधारा की विरोधी है. “क्लीन द नेशन” का एकमात्र मकसद यह रहा है कि वह राष्ट्र विरोधी विचारधारा को जड़ से खत्म करे. तर्कसंगत तरीके से देखा जाए तो यह कोई ऐसी मांग नहीं है जिसके ऊपर फेसबुक पर लंबे लेख लिखे जाएं. अपने न्यूज़ पोर्टल पर एक तरफा लेख छापे जाएं. इतिहास के पन्नों में जाकर नाजियों और हिटलर को याद किया जाए. यह मात्र इस देश के लोगों द्वारा देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों के प्रति आवाज उठाने का एक माध्यम भर है. इंडियन एक्सप्रेस, हफिंगटन पोस्ट इत्यादि सभी न्यूज़ पोर्टल ने एक तरफा खबर क्यों रखी, यह वही बता सकते हैं. लेकिन ऐसे मीडिया संस्थानों के द्वारा आधे तथ्यों केे ऊपर अतार्किक बातें करना काफी दुर्भाग्यपूर्ण है.

ऐसा भी नहीं है कि “क्लीन द नेशन” ने किसी को धमकाया हो या हिंसा की कोई भी बात भी की हो. क्लीन द नेशन सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया पर प्राप्त जानकारियों पर कार्य करता है. ऐसा भी नहीं है कि क्लीन द नेशन हवा-हवाई बातें करके लोगों की शिकायतें उनके संस्थानों या उनके कॉलेज पर करता है. किसी भी व्यक्ति की शिकायत करने से पहले उसके द्वारा किए गए राष्ट्र विरोधी कार्य को अच्छी तरीके से परखा जाता है. और जहां तक बात है अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने की, तो “क्लीन द नेशन” ने कभी किसी भी इंस्टिट्यूशन या किसी भी संस्था को इस चीज का दबाव नहीं बनाया कि वह अपने किसी कर्मचारी को नौकरी से निकाले या अपने किसी छात्र को सस्पेंड करें अपितु इतना अवश्य कहा कि हमारी अपेक्षा है कि देश विरोधी काम करने पर उपयुक्त कार्यवाही हो, नही तो यही कह दिया जाए कि देश के वीर जवानों की निर्मम हत्या का जश्न मनाना ठीक है. एक प्रजातंत्र में “ज़िम्मेदारियों के साथ अभिव्यक्ति की आजादी” इसी को कहते हैं. अगर इस के लिए किसी को दोषी ठहरा दिया जाए या उसको बदनाम करने के प्रपंच रचे जाने लग जाएँ और वो भी बड़े-बड़े स्वनामधन्य पत्रकारों और मीडिया समूहों द्वारा, तो इस हालात पर तो रोना ही आ सकता है.

आप अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाने वालों तक सीमित नहीं रख सकते. इस देश में सभी को अभिव्यक्ति की आजादी है. किसी संस्था द्वारा एक अच्छे कार्य को किए जाने वाले समूह को सम्मानित करना कोई गलत बात नहीं है. इसके लिए उस संस्था को नाज़ी बताना या उसके पदाधिकारियों को बदनाम करना तो ओछी हरकत ही मानी जाएगी. उस एक समूह की तारीफ आप भले ना करें, लेकिन उसकी आलोचना करने में कुछ तथ्यात्मक तर्क तो आप रख ही सकते हैं. मुझे लगता है कि इतने वरिष्ठ पत्रकार और सालों पुराने न्यूज़ पोर्टल इस बात को भली-भांति जानते हैं। यह उनका कार्य है, लेकिन जब कार्य में ऐसी मिलावट होने लगती है तो यह कहना आवश्यक हो जाता है कि कहीं ना कहीं आपको अपनी कल्पना की लगाम को खींचना पड़ेगा और तथ्यों की जमीन पर उतरना पड़ेगा.

इस देश में हर व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से देश सेवा करना चाहता है. सोशल मीडिया यदि उसको कोई माध्यम उपलब्ध कराता है और वह सोशल मीडिया के द्वारा देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों के खिलाफ कोई कदम उठाता है, तो इसमें गलत क्या है! इस देश के अंदर जवानों के भी अपने अधिकार हैं. उनके परिवार के भी अपने अधिकार हैं. जब आप अपनी खुद की अभिव्यक्ति की आजादी के नीचे उनकी भावनाओं को निर्मलता से कुचलने का प्रयास करते हैं तो वहां पर “क्लीन द नेशन” जैसे समूह हमेशा से पुरजोर विरोध करते आए हैं. अभी ऐसे कई सारे समूह आगे आ सकते हैं. बदलते हुए भारत की तस्वीर को देखने से आप भले ही मना कर सकते हैं लेकिन आप उसके अस्तित्व से इनकार नहीं कर सकते. और यदि आप करेगे भी, तो रेत में सर ही धन्साएंगे. पर याद रखिए, रेत में सर धंसाने से हकीकत नही बदलती.

राहुल कौशिक
सब चीजों की थोड़ी-थोड़ी समझ है, ऐसा मानते हैं.

2 Comments

  1. Avatar
    mayank Jhunjhunwala
    July 6, 2019 - 7:03 pm

    Very good article, most media houses are left leaning . Telegraph Kolkata edition is the most hinduphobic in my view.

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  2. Avatar
    October 12, 2019 - 11:05 pm

    Amoxicillin Clavulanate Rash Bentyl Find No Prior Script Cialis Generico Acquisto viagra Acheter Dapoxetine Chlorhydrate

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