अब दक्षिण के किले को जीतने की रणनीति

लोकसभा चुनाव के पश्चात् भाजपा अब अपने संगठन को विस्तार देने की योजना के साथ आगे बढ़ रही है. अमित शाह अब गृह मंत्री भी हैं और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी. यह दोनों दायित्व एक साथ चलाना थोड़ा दुष्कर कार्य था. इसलिए भाजपा आलाकमान ने जेपी नड्डा पर भरोसा जताते हुए उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है.अब पार्टी के संगठनात्मक चुनाव होने तक अमित शाह अध्यक्ष और जेपी नड्डा कार्यकारी अध्यक्ष बने रहेंगे. हालाँकि चर्चा इस बात की भी चल रही है कि आगामी कुछ महीनों में संगठन में बड़ा बदलाव देखते को मिल सकता है. बहरहाल, भाजपा छह जुलाई से दस अगस्त के बीच देशभर में सदयस्ता अभियान चलाने जा रही है. इस बार भाजपा का लक्ष्य 20% नए सदस्यों को पार्टी से जोड़ना है. इसके लिए पार्टी एक व्यापक रणनीति बना रही है.

इस सदस्यता अभियान के केंद्र में दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु जैसे प्रमुख राज्य शामिल हैं. ये वैसे राज्य हैं जहाँ भाजपा तमाम प्रयासों के बावजूद मनचाही सफ़लता हासिल नहीं कर पा रही हैं. हालाँकि बीजेपी की लोकप्रियता इन राज्यों में पहले की अपेक्षा बढ़ी है. अब फिर से बीजेपी इन राज्यों में सदस्यता अभियान पर जोर देकर राज्य से लेकर मंडल स्तर तक कार्यकर्ताओ को जोड़ने की तैयारी में है. इससे पहले अमित शाह ने अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद 1 नवंबर 2014 को सदस्यता अभियान की शुरुआत की थी. सदस्यता अभियान की सफलता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा ने इतिहास रचते हुए विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का मुकुट अपने सिर पर सज़ा लिया था. इस सदस्यता अभियान से भाजपा की सदस्यों की संख्या 2,90,55,220 करोड़ से बढ़कर 30 नवम्बर 2015 तक 11,08,88,547 करोड़ पहुंच गई थी. गौरतलब है कि गत माह पदाधिकारियों की बैठक में अमित शाह ने एक ऐसी बात कही थी जिसने राजनीति के जानकारों को हैरान कर दिया था. लोकसभा चुनाव में मिली प्रचंड विजय के बावजूद भाजपा अध्यक्ष का यह कहना है कि भाजपा अभी अपनी उंचाई पर नहीं पहुंची है, संगठन के विस्तार पर उनका अगला लक्ष्य दक्षिण भारत में जनाधार को बढ़ाना है.

वैसे शाह की अचूक रणनीति और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में भाजपा अपनी सफलता के सबसे बड़े शिखर पर खड़ी है. इसके बावजूद शाह ‘राम काजु किन्हें बिना मोहे कहाँ विश्रामा’ को चरितार्थ करते हुए नजर आ रहे हैं. अमित शाह को यह कई बार कहते हुए देखा गया है कि राजनीति में पार्ट टाइम जैसा कुछ नहीं होता. अगर आप राजनीति में हैं तो केवल राजनीति में हैं. अमित शाह ने संगठन में एक ऐसा तंत्र विकसित किया है, जहाँ संगठन बूथ से राष्ट्रीय स्तर पर संवाद किया जा रहा है. कार्यकर्ता हर समय उत्साह में रहे, इसके लिए समय –समय पर नए –नए कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं. इसी उत्साह की तलाश शाह दक्षिण में भाजपा के लिए कर रहे हैं.और यह जेपी नड्डा के लिए एक अच्छा अवसर है कि वह भाजपा और सरकार इन संतुलन तथा शाह की इस संवाद परंपरा को आगे बढाएं.

भाजपा वर्तमान समय में अपने इतिहास के सबसे स्वर्णिम दौर से गुजर रही है. किन्तु आज भी भाजपा इससे  संतुष्ट नही है. लोकसभा चुनाव का बीते अभी एक महीने भी नहीं बीते थे कि, तब तक अमित शाह ने ये तय कर लिया कि पार्टी पुन: देश भर में सदस्यता अभियान चलाएगी. वह दक्षिण में भाजपा को शिखर पर देखना चाहते हैं. सर्वविदित है कि बीजेपी भाजपा उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण में मजबूत दिखाई नहीं देती लेकिन पूर्वोत्तर के त्रिपुरा ,असम,नागालैंड जैसे राज्यों में अपनी रणनीति के दम पर भाजपा को स्थापित करने वाले शाह का अगला मिशन दक्षिण को फतह करना है. यह सदस्यता अभियान भी इसी मिशन का हिस्सा है.

दक्षिण भारत में भाजपा की दो बड़ी चुनौतियाँ मुख्य रूप से नजर आ रही हैं जिसमें पहला संगठन को सुदृढ़ कर प्रत्येक बूथ तक भाजपा को पहुँचाना है तथा दूसरी चुनौती दक्षिण को क्षेत्रीय क्षत्रपों के वर्चस्व को ध्वस्त करना. पहली चुनौती पर भाजपा ने अपना मिशन शुरू कर दिया है. वहीँ दूसरी चुनौती थोड़ी कठिन है किन्तु कठिन चुनौतिय़ों को स्वीकार करने के लिए. शाह के साथ अब जेपी नड्डा भी हैं और यह दोनों संगठन की रीति –नीति को समझते हैं.  वर्तमान समय में हमें भाजपा की रणनीति देखकर लगता है कि इस समय भाजपा के लिए नामुमकिन जैसा कुछ नहीं है.

इसको समझने के लिए हमें इस लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के परिणाम देखने होंगें जहाँ बीजेपी ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की. लेकिन इसको विस्तार से समझने के लिए त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली प्रचंड जीत को समझना होगा. 2013 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा के पचास में से उन्चास  उम्मीदवारों ने अपने जमानत जब्त करा लिए थे और भाजपा को मात्र 1.87 फ़ीसदी वोट मिले.

2018 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 43 फ़ीसदी वोटों के साथ 35 सीटों पर विजय प्राप्त किया. यह जीत अप्रत्याशित थी और इस बात का प्रमाण भी कि अमित शाह की अगुआई में भाजपा सफलता के सभी बड़े सोपान गढ़ने के लिए तैयार है. उनका मैनेजमेंट, सोशल इंजीनियरिंग  केवल उत्तर भारत ही नहीं वरन देश के हर राज्य की राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करने तथा उसे बदलने का माद्दा रखता है. यही कारण है कि दक्षिण के राज्यों में भी अमित शाह भाजपा को नए सोपान पर देखने के लिए उत्सुक है. वह पार्टी की नीतियों तथा चुनावी योजनाओं का निर्माण सबकी सहमति से करके स्वयं उसे अमल करने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं. तभी तो आज के सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों से अलग उनके आलोचक भी यह बात मानते है कि वह एक अत्यंत परिश्रमी पार्टी अध्यक्ष हैं. 

इस सदस्यता अभियान की अगुआई मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कर रहे हैं. इस अभियान की सफलता का दारोमदार इस बात पर निर्भर करता है कि दक्षिण भारत के राज्यों में बीजेपी कितने सदस्यों को अपने साथ जोड़ती है. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *