कमलनाथ सरकार के खर्चों ने खोली सोशल मीडिया वाले ‘सोशलिज्म’ की पोल

मध्य प्रदेश में 6 महीने में 500 आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के तबादले हो चुके हैं. ट्रांसफर फण्ड पर ही 30 करोड़ खर्च किये जा चुके हैं. दैनिक भास्कर की यह खबर फिलहाल तथाकथित “जनता का पैसा बचाओ” वाली टीम के कान में शायद नहीं पड़ी है, नहीं तो इतनी शांति उनसे अपेक्षित नहीं थी.

नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार आ जाने के बाद जिस प्रकार से देश में दो फाड़ विचारधारा के स्तर पर हुए हैं, वह इससे पहले सिर्फ इंदिरा गांधी के समय ही देखे गए थे. अंतर बस इतना है कि इंदिरा गांधी के विरोध में उस समय जनता में भारी रोष था. यही कारण था कि वह देश की पहली ऐसी प्रधानमंत्री बनी जिसने कोई चुनाव हारा. लेकिन तब से लेकर अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है. काफी कुछ बदला है. बहुत कुछ बदल रहा है.

इस बीच ‘सोशलिज्म’ की बात करने वाला वर्ग अभी भी जीवित है. वह कहता है कि देश के अंदर सभी संसाधन न सिर्फ बराबरी से बंटे बल्कि उसका दुरुपयोग न किया जाए. मध्य प्रदेश में यही हो रहा है. मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार बनते ही जैसे तबादले शुरू हुए, वह साफ बताते थे कि लोकसभा चुनावों की तैयारियां चल रही हैं. स्वाभाविक सी बात है कि राजनेताओं को सिस्टम अपने वश में करना सबसे प्रिय लगता है. राजनैतिक वफादारी का ही परिणाम है कि हमारे देश के सिस्टम में स्थिरता के नाम पर सिर्फ ‘चापलूसी’ ही रह गयी है.

योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद उनके द्वारा भी कुछ तबादले किये गए. कहा गया कि सिस्टम से उन लोगों को हटाया गया जो पुरानी सरकार के वफादार थे. राजनीति को समझने वाले यह जानते हैं कि यहां खेल सिर्फ वफादारी का ही है. जो जिसके प्रति जितना वफादार होता है, उसकी पदवी उतनी ही बड़ी. फिर भी, उस समय इन्हीं सोशल मीडिया धुरंधरों ने कहा कि इन ट्रांसफर के खेल से लाखों रुपये बर्बाद हो रहे है. शहरों के नाम बदलने का जो दंश था, सो था ही. इसी बीच मध्य प्रदेश की सरकार बदलने के बाद कमलनाथ ने भी वही किया. लेकिन उन सभी धुरंधरों में अब तक मुंह नहीं खोला है. यही उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है. सवाल यह है कि अब क्या इस देश की जनता ‘इकोसिस्टम’ के अस्तित्व को स्वीकार कर ले? यदि ऐसा है तो यह आने वाले भविष्य के लिए अच्छी बात नहीं है. स्पष्ट है कि इतना पैसा सिर्फ एक इकोसिस्टम के लिए खर्च कर देना ठीक नहीं, लेकिन जब तराजू का पलड़ा बराबर न पकड़ा गया हो तब प्रश्न उठते हैं.

यह कितना न्यायोचित है कि आप सिर्फ चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाने से इतने पैसे खर्च कर देंवें. इसका फल अंततः कमलनाथ को नहीं मिला, लेकिन इस दौरान जिस धनराशि की कमी राज्य के कोष को झेलनी पड़ी, उसका जवाब कौन देगा. सबसे बड़ी बात यह कि यहां पर सोशलिज्म की बड़ी बातें करने वाले शांत क्यों हो जाते हैं. संसाधनों का दुरुपयोग तो यहां भी हुआ है. फिर ऐसा शांत हो कर बैठ जाना क्या इसको उनकी मौन स्वीकृति नहीं. दैनिक भास्कर में छपा हुआ यह लेख काफी कुछ कहता है. 2019 के चुनावों के नतीजे यह स्पष्ट करते हैं कि देश की जनता चावल और धान के अंतर को समझ चुकी है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *