काव्य समीक्षा: कुछ बातें मन की

मनीष मूंदड़ा से मेरा परिचय क़रीब ६ वर्ष पुराना है। पहले मैं इन्हें एक सफल उद्योगपति और एक कुशल फ़िल्म प्रोड्यूसर के तौर पर जानता था, धीरे ट्विटर की कृपा से इनके अंदर के चित्रकार और फ़ोटोग्राफ़र से भी परिचित हुआ। पर मनीष की बहुमुखी प्रतिभाओं में से एक से परसों ही परिचय हुआ जब उनका काव्य संकलन “कुछ अधूरी बातें मन की” मिला।

देर शाम का समय था, तो किताब उठा ली और फिर ऐसा कुछ हुआ कि रात एक बजे तब पढ़ते रहा। मैं समीक्षक नहीं हूँ पर इस काव्य संग्रह ने मन में भावनाओं का ऐसा आवेग बनाया कि लिखने को विवश हो गया। मनीष राजस्थान से हैं और वहाँ की थाली प्रसिद्ध है। मनीष का कविता संग्रह भी एक राजस्थानी थाली की तरह है जिसमें छोटी बड़ी कटोरियों में उन्होंने अनेक भाव परोसे हैं।

१०८ कविताओं के इस संग्रह में प्रेम की कविताएँ हैं तो वियोग की भी। जीवन दर्शन पर भी मनीष ने लिखा है और माँ की ममता पर भी। इनकी लेखनी में छंद मुक्त हैं पर भाव गहरे और सधे हुए हैं, मनीष की भाषा सहज है, और कविता पाठकों से सीधा संवाद करती हैं। इन सब का मिश्रण एक अनूठी शैली को रूप देता है जो “कुछ अधूरी बातें मन की…” को एक बेहद पठनीय काव्य संग्रह बनाता है

जीवन में पीछे छूटी यादें, लोग और घटनाओं की कसक कैसेी होती है ये उनकी कविता “पलाश के फूल” में बड़ी सजीवता से चित्रित है, वहीं “इंतज़ार” और “जाने क्यूँ “ किसी एकाकी मनुष्य की पीड़ा को बख़ूबी दर्शाती है। वैसे तो अधिकांश कविताएँ दिल को छूती हैं पर मैं अपनी सबसे पसंदीदा कविता यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ जिसका शीर्षक है “सपना”

मैंने एक सपना छोड़ा है
बिल्कुल निरीह अकेला
तुम्हारी राह में
तुम्हारे घर के आस-पास
हो सके तो उसको अपना लेना
अपनी नज़रों में कहीं पनाह देना
मेरा सपना था वो
अब तुम्हारा होते देखना चाहता हूँ
मैं दूर ही सही
सपनों को तुम्हारे नज़दीक रख देखना चाहता हूँ

मनीष का काव्य संग्रह अमेजन पर उपलब्ध है और मनीष स्वयं ट्विटर पर @manmundra हैंडल पर। आशा है आगे मनीष ऐसे ही लिखते रहेंगे और यूँ ही भावों को मुक्त छंद में पिरो पाठकों का मन मोहते रहेंगे

Anurag Dixit
Founding Member Lopak - @bhootnath

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