ममता दीदी के बंगाली भाषा बोलने के दबाव से 2017 के गोरखालैंड आंदोलन की याद ताज़ा होती है, जानिए क्या था यह आंदोलन

बंगाल में डॉक्टरों के ख़िलाफ़ जारी हिंसा के बीच ममता बैनर्जी के जो बयान आ रहे हैं, उनसे तो यही लगता है कि उन्हें इस समस्या का हल निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं है. पहले उन्होंने भाजपा पर डॉक्टर्स को भड़काने का आरोप लगाया. फिर उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में रहना है तो बांग्ला भाषा का इस्तेमाल करना होगा. शायद ममता बैनर्जी यह भूल चुकी है कि ऐसे ही एक बयान ने पश्चिम बंगाल में एक बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा किया था.

कम ही लोग गोरखलैंड आंदोलन के बारे में जानते होंगे. मीडिया ने भी इस मुद्दे पर कभी ध्यान नहीं दिया. यह ज़रूरी है कि देश के इस अभिन्न अंग और गोरखाओं की इस माँग के बारे में हम सभी को जानकारी हो.

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में गोरखालैंड की मांग सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है. इस मुद्दे पर बीते लगभग तीन दशकों से कई बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं. दार्जिलिंग इलाका किसी दौर में राजशाही डिवीजन (अब बांग्लादेश) में शामिल था. उसके बाद वर्ष 1912 में यह भागलपुर का हिस्सा बना. देश की आजादी के बाद वर्ष 1947 में इसका पश्चिम बंगाल में विलय हो गया. अखिल भारतीय गोरखा लीग ने वर्ष 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को एक ज्ञापन सौंप कर बंगाल से अलग होने की मांग उठायी थी.

उसके बाद वर्ष 1955 में जिला मजदूर संघ के अध्यक्ष दौलत दास बोखिम ने राज्य पुनर्गठन समिति को एक ज्ञापन सौंप कर दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार को मिला कर एक अलग राज्य के गठन की मांग उठायी. अस्सी के दशक के शुरूआती दौर में वह आंदोलन दम तोड़ गया. उसके बाद गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बैनर तले सुभाष घीसिंग ने अलग राज्य की मांग में हिंसक आंदोलन शुरू किया. वर्ष 1985 से 1988 के दौरान यह पहाड़ियां लगातार हिंसा की चपेट में रहीं. इस दौरान हुई हिंसा में कम से कम 13 सौ लोग मारे गए थे. उसके बाद से अलग राज्य की चिंगारी अक्सर भड़कती रहती है.

बहुत पुराना है गोरखालैंड आंदोलन का इतिहास )

घिसिंग ने  बीस साल शांतिपूर्वक राज किया. 2007 में GNLF के विमल गुरंग गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की नींव रखी जिससे गोरखालैंड की मांग फिर तेज हो गई. तक़रीबन दस साल बाद इस मुद्दे की आग में घी तब पड़ा जब ममता बनर्जी ने पहली से दसवीं कक्षा तक बंगाली भाषा अनिवार्य कर दी. 16 मई 2017 को लिए गए इस निर्णय पर विमल गुरंग ने 5 जून 2017 को आंदोलन शुरू किया. आंदोलन के दबाव में आकर 8 जून को ममता बनर्जी ने गोरखा बहुतायत इलाक़ों में बंगाली भाषा को ऐच्छिक कर दिया. इसके बाद भी यह आंदोलन ठंडा नहीं पड़ा और तकरीबन 104 दिनों तक चला. आंदोलन कई बार ख़ूनी संघर्ष में भी बदला जिसमें काफ़ी लोगों की जान भी गई और कई लोग घायल भी हुए.

गोरखलैंड की माँग क्यों? 

अलग गोरखालैंड आंदोलन का मुख्य कारण जातीयता, संस्कृति और भाषा में अंतर के कारण किया गया था. पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में नेपाली-भारतीय गोरखा जातीय मूल के लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान के आधार पर राज्य की मांग करते आए हैं, जो बंगाली संस्कृति से बहुत अलग है.

भारत में गोरखाओं ने भी देश के भीतर बहुत भेदभाव का सामना किया है. लोग उन्हें नेपाली समझते हैं और अक्सर पड़ोसी देश के प्रवासियों के रूप में देखे जाते है. असम और मेघालय जैसे राज्यों से गोरखाओं को बाहर निकाला गया है. इन सब के चलते गोरखा एक राज्य (भारतीय संघ के भीतर) चाहते हैं कि वे अपने स्वयं के राज्य को बुला सकें, एक ऐसा राज्य जो उन्हें भारतीयों के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने का अवसर दे.

एक तरह से अल्पसंख्यक होने के बावजूद भी गोरखाओं का देश के लिए योगदान काफ़ी ज़्यादा है. सशस्त्र बलों में उनकी भागीदारी प्रशंसनीय है और भारत के वर्तमान सैन्य इतिहास को गोरखा सैनिकों और अधिकारियों के साहस और बलिदान ने काफ़ी समृद्ध किया है. अन्य क्षेत्रों में भी, गोरखाओं का योगदान सराहनीय रहा है. गोरखालैंड के लिए उनकी मांग जायज है. गोरखलैंड की माँग कई अन्य कारणों से भी की जा रही है. जिसमें सबसे ज़्यादा प्रमुख है बंगलादेशी घुसपैठ. दार्जिलिंग जिला का 200 किलोमीटर तक का हिस्सा जो चार देशों- नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और तिब्बत को 25 किलोमीटर से 60 किलोमीटर तक जुड़ा हुआ है. 4 देशों की सीमाओं से जुड़े होने के चलते यह काफ़ी समवेदनशील इलाक़ा है. 

इस इलाक़े ने बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों का एक बड़े पैमाने पर प्रवाह देखा है, जो कि 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद और भी बढ़ गया. ‘ सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ आज दुनिया के सबसे छिद्रपूर्ण सीमा क्षेत्रों में से एक बन गया है. पाकिस्तान के आईएसआई ने अपने एजेंटों को स्वतंत्र रूप से संचालित करने के लिए इसका उपयोग किया है. वास्तव में, 2002 में, लेखक पिनाकी भट्टाचार्य ने इस बात पर प्रकाश डाला था कि कैसे नॉर्थ ईस्ट में विद्रोहियों को बांग्लादेश के माध्यम से हथियार और गोला-बारूद मुहैया कराने के लिए आईएसआई ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ का इस्तेमाल आपूर्ति मार्ग के रूप में कर रहा था.

बुर्दवान बम विस्फोट की जांच के बाद, मई 2015 में, राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें बताया गया था कि कैसे जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) के पास पश्चिम बंगाल और असम के निचले जिलों में नेटवर्क था, और जेएमबी इन सब कार्यों को पश्चिम बंगाल से संचालित कर कर रहा था. बुर्दवान विस्फोट के मुख्य आरोपी, एक बांग्लादेशी राष्ट्रीय और जेएमबी के मुख्य कमांडर साजिद को पश्चिम बंगाल में गिरफ्तार किया गया था.

यह सब देखते हुए, अगर भारत में एक राज्य है जो वास्तव में आतंकवादियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना है, तो यह पश्चिम बंगाल है. अगर राज्य सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को दूर करने में सक्षम थी, तो यह बहुत पहले हो जाता. बंगाल में आईएसआई मॉड्यूल और विभिन्न इलके के आतंकवादियों की उपस्थिति वास्तव में साबित करती है कि बंगाल में राज्य सरकार इस समवेदनशील क्षेत्र (दार्जिलिंग) की रक्षा करने में सक्षम नहीं.

दार्जिलिंग, तराई और डुआर्स की पहाड़ियों सहित गोरखालैंड का एक स्वतंत्र राज्य इसलिए “चिकन नेक” क्षेत्र के लिए बेहतर सुरक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करेगा. छोटे राज्यों में भी शासन करना आसान होता है और पूरे राज्य की मशीनरी की उपस्थिति एक क्षेत्र में होने से घुसपैठियों पर कड़ी नजर रखने में मदद मिलेगी, जो कोलकाता से सम्भव नहीं.

इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो गोरखलैंड कभी भी पश्चिम बंगाल का हिस्सा था ही नहीं. दार्जिलिंग क्षेत्र केवल 1935 में पश्चिम बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा बना था, जब एक निर्वाचित सदस्य को बंगाल विधानसभा में भेजने की आवश्यकता थी. यह पूरी तरह से तत्कालीन प्रशासनिक सुगमता के लिए किया गया था, क्योंकि अंग्रेज बंगाल से बिहार के भागलपुर की तुलना में दार्जिलिंग क्षेत्र को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकते थे. 

देश में कई राज्य भाषा के नाम पर बनाए गए हैं, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना इसके उदाहरण है. यहाँ तक कि 2013 में तेलंगाना राज्य को अलग करने के बाद गोरखलैंड की फिर उठी थी. ममता बनर्जी की बंगाली भाषा का प्रयोग करने की माँग कहीं ना कहीं अन्य भाषा बोलने वालों को यह अहसास कराता है कि उनकी बंगाल में जगह नहीं है. हालाँकि गोरखालैंड की माँग काफ़ी समय से की जा रही है पर अगर ममता बनर्जी या अन्य सरकारों ने उन्हें आश्वस्त किया होता कि गोरखलैंड की समस्याओं की उपेक्षा नहीं की जाएगी तो शायद यह आंदोलन इतना हिंसक रूप नहीं लेता

ममता बैनर्जी एक तरफ़ बंगाली भाषा थोपने की ज़िद करके गोरखाओं के साथ भेदभाव कर रही हैं, वहीं वो यह भी जानती हैं कि गोरखाओं की माँग मान लेने पर उनका काफ़ी नुक़सान हो सकता है. राजकीय कोष में 15% का योगदान दार्जीलिंग से ही आता है. दार्जीलिंग क्षेत्र हर तरह से भरा पूरा है. चाहे खेती बाड़ी हो, टूरिज़्म हो, शिक्षा हो या फिर बिजली पैदा करने की क्षमता दार्जीलिंग या गोरखलैंड अलग किया जाता है तो भी यह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहेगा. दार्जीलिंग की चाय तो पहले ही विश्व में मशहूर है. छोटा इलाक़ा होने के बाद भी राजकीय कोष में दार्जीलिंग और आसपास के इलाक़े 13000 करोड़ से 18000 करोड़ तक का योगदान देते हैं. बिजली, खेती बाड़ी, शिक्षा इत्यादि से काफ़ी सारा राजस्व सीधे बंगाल के खाते में जाता है. 

केंद्र सरकार ने भी गोरखाओं की माँगों पर ध्यान नहीं दिया और कहीं ना कहीं बंगालियों की नाराज़गी से बचने के लिए भाजपा भी इस मामले पर चुप्पी साधे रही. फ़िलहाल चल रहे डॉक्टरों के आंदोलन का गोरखालैंड से कोई लेना देना नहीं पर ममता बनर्जी काभाषा को लेकर जो जुनून है, उसने इस आंदोलन की यादें ताज़ा कर दी.

Rashmi Singh
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6 Comments

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