मायावती की राजनैतिक अधीरता का सबसे ताज़ा शिकार बनें अखिलेश यादव! महागठबन्धन में ‘महा-फूट’

उत्तर प्रदेश से जिस बात के संकेत मिल रहे हैं, वह एक प्रकार की तथाकथित विचारधारा का पतन दिखाई दे रहा है.जिस बहुप्रतिक्षित सपा+बसपा गठबंधन को देश का विपक्ष भाजपा का अंत सिद्ध कर रहा था, यह उनके विश्वास की एक क्रूर हत्या है. मायावती ने हाल ही में दिए अपने भाषण में यह कहा है कि यादवों का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हुए.

इसके साथ ही उपचुनावों में जाने वाली 11 सीटों पर चुनाव के लिए भी मायावती में गठबंधन से अलग खुद लड़ने का दावा चला है. इससे स्पष्ट रूप से कोई यह नहीं कह सकता है कि अब हमारी और आपकी रहें अलग है. फिलहाल अखिलेश यादव इस मामले पर चुप हैं. वह कब तक चुप रहेंगे,  यही यह उनके धैर्य की परीक्षा होगी. मायावती द्वारा तो लगातार उनके धैर्य की परीक्षा ली ही का रही है. मायावती के लिए इस समय जीतना सबसे ज़रूरी चीज़ है. उनके ऊपर राजनैतिक अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा था.

2014 में एक भी सीट न लाने वाली बसपा को इस बार 10 सीटें मिली हैं. लेकिन यहां सबसे अधिक नुकसान अखिलेश यादव को हुआ है. पिछले लोकसभा चुनावों (2014) में उनकी समाजवादी पार्टी को मात्र 5 सीटें ही मिली और इस बार भी वही कहानी दोहराई गयी. अंतर बस इतना है कि इस बार उनकी पत्नी भी हार गई हैं.

मोदी की बात फिर से जनता के सामने सच साबित हो रही है. मायावती का ऐसा कथन मोदी के महा-मिलावट वाले तंज को सिद्ध कर रहा है. आखिर मात्र चुनावों के समय ही साथ आए दलों को कैसे बीते हुए दशकों की अपमानजनक स्थितियाँ याद नहीं रहती? कौन गेस्ट हाउस कांड भूल सकता है? कौन यह भूल सकता है कि मुलायम सिंह यादव के ऊपर न जाने कितने आपराधिक मामले तो खुद मायावती के दर्ज कराए हुए हैं. अब मायावती को ही इन चुनावों में मोदी के बाद सबसे अधिक फायदा हुआ है. पूरे विपक्ष में यदि किसी को सबसे अधिक फायदा हुआ है तो वह मायावती है जिनकी टैली में 10 सीटें हैं. जगहन मोहन रेड्डी का मोदी से गर्मजोशी के साथ तस्वीरें यह बता रही हैं कि आज नहीं तो कल वह भी NDA का ही हिस्सा होंगे.

स्वार्थ के साथ बने हुए रिश्ते ज़्यादा दिनों तक नहीं चलते हैं. मायावती का राजनैतिक धैर्य कितना अधिक है, यह भाजपा जानती है. कल्याण सिंह के साथ जो हुआ उसको राजनैतिक विश्लेषक समझते हैं. उसके ऊपर इस बार तो धुर विरोधी सपा के साथ इनका गठबंधन था जिन्होंने साथ में ही नूरा कुश्ती कर के इन्होंने अपनी राजनैतिक मजबूती बनाई थी.

ऐसी घटना को देखकर कोई भी मान सकता है कि मायावती इस समय सबसे अधिक किस्मत वाली हैं. अखिलेश यादव को इस समय अपने पिता की बातें याद आ रही होंगी. उत्तर प्रदेश की राजनीति अब और अधिक दिलचस्प हो गयी है. इस समय सबसे ज़्यादा ठगे हुए अखिलेश ही लग रहे हैं. सपा के प्रवक्ताओं की छुट्टी करने के बाद वह उन सीटों का आंकलन अवश्य कर रहे होंगे जहां उन्हें जीत की पूरी उम्मीद थी. अब वहां हार के बाद मुलायम सिंह यादव को बैठकर अखिलेश यादव को कुछ खरी-खरी बाते अवश्य सुननी पड़ेंगी…बशर्ते वह सुनने को तैयार हों.

1 Comment

  1. Avatar
    pawan
    June 5, 2019 - 4:50 am

    bhaiya aap log post bahut chhoti likhte ho…main heading me jo rahta hai us se jyada khabar andar nhi rahti bas wahi baat ghuma fira diya..aur to aur post se badi to us se related tasveer ki rahti hai..

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *