महाभारत का अनसुना प्रसंग – महिला सुरक्षा

द्रौपदी चीर-हरण को सत्ताईस दिन बीत चुके थे. चीर-हरण में असफल उप युवराज दुशासन लगभग डिप्रेस्ड हो चुके थे. हस्तिनापुर एक्सप्रेस के प्रबंध संपादक अबतक कुल चार बार चीर-हरण को उचित ठहराने का प्रयत्न कर चुके थे. भीष्म पितामह आज भी सोते-सोते नींद में सिर हिला कर बोल पड़ते; यह उचित नहीं हुआ वत्स, यह उचित नहीं हुआ.

महामंत्री विदुर मन ही मन युवराज दुर्योधन को दिन में तेरह बार धिक्कार रहे थे. युवराज दुर्योधन प्रजा के बीच बह रही धिक्कार लहर से अनभिज्ञ नहीं थे. उसी का तोड़ निकालने के लिए आज कौरव कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी.

“मुझे किसी का भय नहीं है मामाश्री. मुझे इस बात का भान है कि प्रजा में असंतोष है. कि मुझे अधर्मी बताया जा रहा है. कि अनुज दुशासन को धिक्कारा जा रहा है. परंतु युवराज यदि इन बातों की चिंता करेगा तो उसका जीना ही दूभर हो जायेगा. और मैंने जो किया क्या वह करना मेरा अधिकार न था?” मामाश्री शकुनि से युवराज दुर्योधन ने कहा.

भांजे की बात सुनकर शकुनि बोले; “ मैं मूर्ख नहीं हूँ भांजे जो तुमसे इन छोटी-छोटी बातों पर चिंतित होने के लिए कहूँगा. मैं तो इस बात पर विचार कर रहा हूँ कि मीडिया और प्रजा के बीच के असंतोष को कम कैसे किया जाय”

अभी तक चुप बैठे अंगराज कर्ण बोल पड़े; “परंतु क्या किया जा सकता है मामाश्री? आप ही बताएँ. कोई तो षड्यंत्र होगा आपके पास?”

अंगराज कर्ण की बात सुनकर दुशासन को लगा कि जब कर्ण ने भी अपना योगदान दे दिया है तब उसका चुप रहना उचित न होगा. यदि वह अब भी चुप रहा तो अपने पूर्वजों को क्या मुँह दिखाएगा? वह बोल पड़ा; “आप कहें तो कुछ प्रजाजनों की तुड़ाई करवा दूँ मामाश्री? ये प्रजा के बीच उठ रहे विरोध के पीछे और कोई नहीं बल्कि काकाश्री विदुर के अपने गुप्तचर हैं. मुझे सब ज्ञात है”

“इतना अधीर न हो भांजे दुशासन. जब मैं हूँ तो ऐसा करना ही क्यों? ऐसा कदापि न समझो कि द्यूत क्रीड़ा मात्र एक बार हो सकती है. तुम यह न भूलो कि…हिक हिक हिक..”

ये हिचकी इस बात का संकेत थी कि मामाश्री शकुनि को ब्रेन वेब आ चुकी है. जब भी ऐसा होता था, उन्हें हिचकी आने लगती थी. उन्होंने अपनी आँख सवा सौ छणों तक बंद रखी और फिर खोली. बोले; “कल संध्या-बेला पाँच बजे प्रेस कॉन्फ़्रेन्स बुलाओ वत्स दुर्योधन”

दुर्योधन को पता चल चुका था कि उसके खेवनहार मामाश्री ने कोई विकट हल ढूँढ लिया था.
उसके मुख पर कुटिल मुस्कान थी. उसे देख शकुनि बोले;
“तुम चिंतित न हो वत्स. कल वहाँ क्या कहना है वह मैं तुम्हें आज रात्रि ही लिखकर दे दूँगा”

दूसरे दिन प्रेस कॉन्फ़्रेन्स हुई. युवराज दुर्योधन ने पत्रकारों से कहा;

“आप सब को बताते हुए मुझे हर्ष हो रहा है कि मैंने हस्तिनापुर में नारी-सुरक्षा और समाज में नारी की दयनीय स्थिति पर समग्र चिंतन किया और मैं ग्लानि से भर गया. द्रौपदी तो इन लाखों करोड़ों नारियों में मात्र एक है… आज हस्तिनापुर का हर पुरुष चिंतित है..हर पुरुष लज्जित है. नारी उत्थान के लिए मैंने निर्णय लिया है कि अब से हम राजमहल की ओर से हर नारी को नि:शुल्क साड़ियाँ देंगे. हम हस्तिनापुर की नारियों को उनका सम्मान दिलाने के लिए वचनबद्ध हैं.. मुझे विश्वास है कि इस निर्णय से प्रत्येक नारी निज को सशक्त समझेगी”

युवराज बोल ही रहे थे कि पीछे बैठा एक पत्रकार चिल्ला उठा;

“युवराज दुर्योधन की जय.
मामाश्री शकुनि की जय.
महाराज धृतराष्ट्र की जय…

Shiv Kumar Mishra
Senior Reporter Lopak.in @shivkmishr

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *