लिबरल वर्ग के हीरो बनते यशवंत सिंहा!

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और अटल बिहारी वाजपेई के समय केंद्रीय मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने नरेंद्र मोदी के ऊपर एक और हमला किया है. इस बार इतिहास में से एक नया अध्याय निकाल कर लाए हैं. यशवंत सिन्हा ने यह कहा है कि 2002 के दंगों के बाद अटल बिहारी वाजपेई नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाना चाहते थे. उन्होंने इसका पूरा मन बना भी लिया था, लेकिन उसी समय लालकृष्ण आडवाणी ने नरेंद्र मोदी को बचा लिया और अटल बिहारी वाजपेई को उनका फैसला बदलना पड़ा.

अब इसमें कहां तक सच्चाई है यह तो यशवंत सिन्हा और लालकृष्ण आडवाणी ही जाने क्योंकि इस पूरे मामले की जानकारी सिर्फ दो ही लोगों के पास थी. एक अब दुनिया में नहीं हैं. दूसरे अब राजनीति से सन्यास लेने की तरफ बढ़ चुके हैं. फिर भी लालकृष्ण आडवाणी और यशवंत सिंहा में एक बुनियादी अंतर है. आप लालकृष्ण आडवाणी से चाहे जितने नाराज हो, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी कभी भी यशवंत सिन्हा की तरह बागी नहीं हुए. आडवाणी का गुस्सा भले ही नरेंद्र मोदी के प्रति दिखाया जाता हो, लेकिन उन्होंने इस बात का विशेष कर ख्याल रखा कि इससे पार्टी को कोई नुकसान ना हो. दूसरी तरफ यशवंत सिंहा खुले घोड़े की तरह रेस में दौड़े जा रहे हैं. वह क्या पाना चाहते हैं यह सबको पता है. राजनीति में अहंकार भी एक कारण होता है किसी व्यक्ति के सुर बदल जाने का. मंत्रिमंडल में स्थान न मिलने के कारण जिस प्रकार से भाजपा के नेताओं में बागी सुर सुनाई दिए, वो अजब ही था. विशेषकर शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिंहा.

मंत्रिमंडल की लालसा सभी को रहती है, लेकिन अपने ही नेता को सवालों के घेरे में खड़ा कर के आखिर यशवंत सिन्हा क्या सिद्ध करना चाहते हैं. वैसे यह उनकी अपनी राजनीति है और वो इसके लिए स्वतंत्र हैं. 2002 में जो हुआ, उसके लिए नरेंद्र मोदी को कोर्ट द्वारा क्लीन चिट मिली है. वह भी तब जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. फिर भी यह मुद्दा कुछ लोगों के लिए आज भी खत्म नहीं हुआ है. आज भी इसी दंगे को ले कर एक विशेष समुदाय में भय का माहौल बनाया जाता रहा है. दूसरी तरफ एक सवाल यह भी है कि इस देश की जनता को यह तय करना है कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा. अगर देश का विपक्ष नरेंद्र मोदी से अकेले लड़ने की हिम्मत रखता तो उसको गठबंधन न करना पड़ता. इस पर 42 पार्टियों का भाजपा वाला गठबंधन याद दिलाया जाता है. लेकिन इसी बीच एक बुनियादी तथ्य को बहुत ही चतुर तरीके से छोड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं कि भाजपा एक अखिल भारतीय राजनैतिक पार्टी है. कुछ राज्यों में उसका गठबंधन अवश्य है लेकिन उसका प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ही हैं. विपक्ष के पास जितने चेहरे हैज, उतने ही प्रधानमंत्री भी हैं. यही देश की जनता को चुनाव में एक स्पष्ट रुख अख्तियार करने का अवसर है.

यशवंत सिन्हा के बागी बोल अब जनता को भी हज़म नहीं हो रहे. शायद इसका कारण उनको देश के लिबरलों से मिल रही सांत्वना है. अचानक से 2002 के समय साम्प्रदायिक कहे जाने वाले आडवाणी आज इनके प्रिय हो गए. उस समय यशवंत सिन्हा को भी उनकी आर्थिक नीतियों के लिये यही लोग कठघरे में खड़ा करते थे. आज विडंबना देखिये की यही लोग यशवंत सिन्हा के कंधे पर बंदूक रख कर एजेंडा चला रहे हैं. सिन्हा जी भी फुल लोडेड हैं. 23 मई के नतीजे सच में बहुत से लोगों के दिल तोड़ने वाले होंगे. देखना यह होगा कि किस ओर ज़्यादा क्षति होती है.

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