भावनाओं का तर्कहीन ‘कमर्शियलाइज़ेशन’ करते आधुनिक युग के डिजिटल पत्रकार

दोस्तों जरा एक बात सोचिये. यदि रास्ते पर कोई चलता हुआ व्यक्ति लड़खड़ा कर गिर जाता है, तो क्या हम जमीन को दोष देंगे? एक तर्कशील व्यक्ति यही कहेगा कि इसमें जमीन की नहीं बल्कि उस चलते हुए व्यक्ति की लापरवाही है. शायद यह तर्क शक्ति हमारे देश में खत्म होती जा रही है. देश के तथाकथित डिजिटल पत्रकारों के पास तो शायद यह शक्ति खत्म हो गई है.

अभी द लल्लनटॉप का एक आर्टिकल पड़ा। आर्टिकल में वह बंगाल के एक छात्र की बात कर रहे हैं. वह छात्र जिसका नाम है अभिषेक जना. अभिषेक जना ने इसी साल दसवीं का पेपर दिया है. दुर्भाग्य की बात यह रही कि वह दसवीं के पेपर में फेल हो गए. इसी ने एक बड़ी खबर की आधारशिला रख दी. कम से कम वह लल्लनटॉप के लिए तो बड़ी खबर है. अभिषेक जना का दर्द यह है कि मोदी जी मे उनकी सहायता नहीं की. किसी एक व्यक्तिविशेष की शैक्षणिक योग्यता के लिए आखिर प्रधानमंत्री कैसे ज़िम्मेदार हो सकते हैं?

लल्लनटॉप ने जिस प्रकार से इस खबर को दिखाया, वह कहीं ना कहीं कुछ सवाल खड़े करता है. किसी एक छात्र की असफलता उसके परिवार की ही नहीं, बल्कि समाज की असफलता होती है. आखिर वह छात्र समाज का ही एक हिस्सा है और आगे चलकर वह समाज में एक बेहतर पदवी पर यदि पहुंचता है तो यह समाज को प्रभावित करेगा. अभिषेक जना का दर्द समझ में आता है, लेकिन उनका तर्क समझ से परे है. वह एक पूर्व मोदी समर्थक बन चुके हैं. जी हां! ‘पूर्व मोदी समर्थक’.

यह एक ऐसा शब्द है जो आज के समय में आपको ज्यादा सुनाई नहीं देगा. उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर चौकीदार अभिषेक जना लिखा था. परीक्षा में असफल होने के बाद उन्होंने बहुत दुखी मन से अपने नाम के आगे इस ‘चौकीदार’ शब्द को हटाते हुए इस असफलता का पूरा ठीकरा नरेंद्र मोदी पर फोड़ दिया. उनका तर्क है कि शिक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री; तीनों ने ही उनकी सहायता नहीं की. वह अपनी असफलता को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. उनका कहना है कि यदि उनका पेपर दोबारा चेक किया गया तो निश्चित रूप से वह दोबारा से पास होंगे.

पेपर रिवैल्यूएशन का उनका तर्क समझ में आता है, लेकिन क्या यह पेपर रिवैल्युएशन प्रधानमंत्री करेंगे? या गृह मंत्री करेंगे? किसी एक स्कूल का पेपर रिवैल्युएशन शिक्षा मंत्री के हाथ में भी नहीं होता. क्योंकि उनका पद इस चीज के लिए नहीं बनाया गया है. निश्चित रूप से शिक्षा की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है, लेकिन वह कुछ बड़ी जिम्मेदारियां हैं. अभिषेक जना को यदि अपना पेपर रिवैल्युएशन चाहिए तो उन्हें अपने स्कूल या सीबीएसई बोर्ड से बात करनी होगी. यदि बोर्ड सहायता नहीं करता, तो वह सरकार से शिकायत कर सकते हैं.

वैसे अभिषेक का सोशल मीडिया पर मज़ाक उड़ाने वालों की जितनी निंदा की जाए कम है. ट्रोल करने वाले यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वो जिसको अपना आदर्श मानते हैं, उनकी ऐसी हरकतें उनके ही नाम पर धब्बा लगा रही हैं. फिर भी, अभिषेक का सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच जाना हज़म नहीं होता. OH MY GOD फ़िल्म में काँजीलाल वाला तर्क ही यहां काम करता है. जब घर में बिजली जाए तो अपने इलाके के संबंधित प्रशासन से सम्पर्क करें. सीधे रिलायंस ऑफिस न पहुंचें!

वैसे अभिषेक जना का एक और टैलेंट भी है. वह बांग म्यूजिक के प्रशंसक हैं. बांग म्यूजिक बंगाल का एक संगीत है. हमारा अभिषेक को सलाह यही रहेगी कि वो इस पर भी ध्यान देंवें. माँ सरस्वती सब पर अपनी कृपा नहीं बरसाती. अभिषेक आज नहीं तो कल यह बात समझ जाएंगे. लेकिन जो लोग समझदार होते हुए भी नासमझ बनने का प्रयास कर रहे हैं उनको कैसे समझाया जाए. हम समझ सकते हैं कि डिजिटल क्रांति में कलम रगड़ु लेखकों की आवश्यकता नहीं. यहां मसाला को ज्यादा तरजीह दी जाती है. लेकिन जब पकवान में मसाला ज्यादा हो जाता है तो उसका स्वाद बिगड़ भी सकता है. डिजिटल पत्रकारिता करने वाले आधुनिक पत्रकारों को इसका ख्याल रखना चाहिए. किसी की भावनाओं का इस प्रकार इस्तेमाल आपकी डिजिटल पत्रकारिता के लिए तो सही हो सकता है परंतु यह समाज के लिए ठीक नहीं है.

लेकिन क्या फर्क पड़ता है? जब तक दुकान चलती है, चलाए जाओ…. वैसे भी जब देश चलाने वाले ही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ ले रहे हैं तो यह तो फिर भी आधुनिक युग के डिजिटल पत्रकार हैं. इनको अपना भी तो पेट पालना होता है. बस अपने नाम के आगे ‘सच्ची पत्रकारिता’ वाली मार्केटिंग न करें. हर जगह ‘सारकाज़्म’ खेल बिगाड़ देता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *