स्मृति ईरानी की कर्मठता से अन्याय करती मीडिया चैनलों की हेडलाइंस!

जब आप किसी राजनैतिक पार्टी की जीत या हार की रिपोर्टिंग कर रहे होते हैं, तब आपको यह ध्यान रखना होता है कि अपने शब्दों में आप बहुत सजगता बरतें. इन चुनावों के अंदर हमने अच्छे-अच्छे पत्रकारों को अपनी सामान्य बुद्धि और निष्पक्षता को खोते देखा है. अमेठी में जीत से उत्साहित स्मृति ईरानी की जीत को पत्रकारों द्वारा राहुल गांधी की हार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है.

हम यहां पत्रकारों को पत्रकारिता का पाठ नहीं पढ़ा रहे हैं. बस यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि स्मृति ईरानी की जीत को राहुल की हार बताकर आप उनकी जीत, उनकी कर्मठता और समर्पण भाव से न्याय नहीं कर रहे है. स्मृति ईरानी ने इन पांच सालों में हारने के बावजूद अमेठी की जनता से अपना जुड़ाव बनाये रखा वहीं गांधी इस बार भी अमेठी से लगभग दूर ही रहें.

स्मृति ईरानी ने इस पूरे दौर में अपनी रैलियों और दौरों का पूरा खाका तैयार रखा. इसी के साथ उन्होंने अपनी जनता का भी तब ख्याल रखा जब उनको सबसे अधिक उनकी आवश्यकता थी. कुल मिलाकर 2014 में हार के बाद भी वो एक सांसद की तरह काम कर रही थी.

उनकी जीत को राहुल गांधी की हार बताने के पीछे एक प्रकार का अन्याय यह भी है कि इन चुनावों में उनके ऊपर व्यक्तिगत स्तर पर हमले हुए. कटाक्ष की सभी सीमाएं पार कर दी गयी. उनके चरित्र पर भी उंगलियां उठाने से कुछ टुटपुँजिये नेताओं ने शर्म नहीं महसूस की थी. एक खास लॉबी ने भी स्मृति ईरानी को अमेठी में राहुल से कमतर आंका था. फिर भी वो मैदान में डंटी रही. इस जीत का पूरा श्रेय स्मृति ईरानी को मिलना चाहिए.

जब 2014 में राहुल गांधी ने अमेठी से जीत हासिल की तब स्मृति ईरानी का जितना मज़ाक बनाया गया, आज वह लोग स्मृति की इस जीत से स्तब्ध होंगे. लोकतंत्र के एक प्रखर प्रहरी के रूप में इस बार देश की जनता ने काम किया है. स्मृति ईरानी के साथ अमेठी की जनता भी बधाई की पात्र है.

अंततः उन्होंने पारिवारिक मोह को त्याग कर परफॉरमेंस को तरजीह दी है. यही इस चुनाव का सबसे सकारात्मक पहलू है. बड़े नामों की हार के पीछे ‘नाम का उनका अहंकार’ चूर-चूर हो गया है. मीडिया को यह समझना होगा कि राहुल गांधी की हार से बड़ी खबर स्मृति ईरानी की जीत है. आप उनसे इसका क्रेडिट नहीं छीन सकते हैं. गाँधीयों का दुर्ग ढहाना कोई छोटी बात नहीं होती. 

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