एग्जिट पोल्स पर ही बिफर पड़े पत्रकारिता के ‘नैतिक पुरुष’; टीवी स्टूडियो में जारी हुआ वैचारिक ब्लैकआउट

पत्रकारिता के ‘नैतिक पुरुष’ इस समय विचित्र ‘जात संकट’ में फंसे हुए हैं. समझ में यह नहीं आ रहा है कि पांच साल एड़ियां रगड़ने के बाद भी वैचारिक मतभेद वाला यह व्यक्ति देश की जड़ों में कैसे घुसता जा रहा है. वो इकोसिस्टम भी अब बेअसर लग रहा है जिसके दम पर वामपंथी चाश्नी में डूबे हुए ‘लिबरल’ रसगुल्ले गप से मुंह में भर लिया करते थे और हवा उड़ती थी; “फलाना कुमार में सच्चाई दिखती है”.

कल के एग्जिट पोल्स में उन्हीं ‘फलाना कुमार जी’ को लोकतंत्र पर हास्यास्पद कटाक्ष दिखाई पड़ रहा है. कहा गया कि यह एक खतरनाक रवैया है. उनको ये चुनाव बहुत खतरनाक प्रतीत होते है और चुनाव आयोग पर तो बंदे का भरोसा ही उठ चुका है. मने अब स्थिति ये हो चुकी है कि पत्रकारिता में नैतिकता के स्तर पर ग्रन्थ लिख देने वाले महाशय इस समय लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही मानने से इनकार करते हैं. वह चुनाव आयोग, जिसकी निष्पक्षता पर एक बार आडवाणी ने उँगली उठाई थी तो महाशय उस समय पूरा पैनल ले कर तार्किक विश्लेषण करने बैठ गए थे कि कैसे आडवाणी की सरकती हुई राजनैतिक ज़मीन उनकी राजनैतिक तर्कशीलता को क्षीण करती चली जा रही है. आज उनके मुख से ये सुन कर सच में समझ आ रहा है कि कैसे समय चक्र बदला है. बंगाल की खतरनाक स्थितियाँ तो जैसे भोले मानस को पता ही नहीं हैं. शायद जब पत्थर साथी पत्रकार पर पड़ता है और अपनी खोपड़ी को बचा लिया जाता है, तब ऐसे तर्क दिए जाते हैं. लेकिन दुःख तो आखिर दुःख होता है, और टीवी स्टूडियो में भी इंसान ही बैठते हैं.

वो यह नहीं समझा पाते कि आखिर बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बंगाल, तमिलनाडु, केरल, अरुणांचल प्रदेश जैसे राज्यों में उनको चुनाव खतरनाक क्यों नहीं लगे? तर्कों के स्वयंभू ‘कार्ल मार्क्स’ इससे अनभिज्ञ हैं. वह अपने मीडिया कर्मियों पर ही अब सवाल उठा रहे हैं. कहते हैं कि जिस प्रकार से मीडिया द्वारा एक राजनैतिक पार्टी की कैंपेनिंग की गई, वह बहुत खतरनाक थी. इसमें अंजाने में ही सही, मगर  वह अपने चैनल को अप्रत्यक्ष रूप से घुसा लेते हैं, क्योंकि मीडिया का एक स्तंभ तो वो भी हैं. वैचारिक कुंठा इतनी खतरनाक होती है.

ये वैचारिक कुंठा किसी तार्किक व्यक्ति को किस रूप से अतार्किक बना देती है, और उनकी तर्कशील बुद्धि का नुकसान करती है, महाशय इसका प्रबल उदाहरण हैं. उनको दुख है कि किसी भी मीडिया चैनल में ‘कांग्रेस’ की न्याय योजना के बारे में बात ही नहीं की. यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक पक्ष के अधिक प्रचार पर ‘सेक्युलर उँगली’ उठाने वाले पत्रकार जी दूसरे पक्ष के चुनावी वादे को न दिखाए जाने के लिए नाराज़ हैं. करोडो रूपये फूँककर सभी चैनलों पर दिखाए जाने वाले ‘अब होगा न्याय’ के प्रचार देखने के बाद भी हम उनसे ऐसी बातें सुन रहे है, तो सोचिये हमें कितना क्रोध आ रहा होगा. परन्तु वो एक सेक्युलर, लिबरल और ठप्पा जड़ित निष्पक्ष पत्रकार हैं. उनकी बातों में कोई तर्क तो होगा. अब वो सत्ता पक्ष के विरोध में हो या विरोधी पक्ष के समर्थन में, तर्क तो होगा. इस बीच वो अपने ही साथी पत्रकारों से ‘कटाक्ष’ झेल रहे हैं. वैसे वो पहले ही सोशल मीडिया से अंतर्ध्यान हो चुके हैं. वो कटाक्ष उन तक पहुंच रहे होंगे भी या नहीं यह बताया नहीं जा सकता, विक्टिम कार्ड जेब से नहीं निकला है, मतलब अभी तक तो डिलीवरी नहीं हुई.

23 मई के दिन काफी मिथक टूटेंगे. एक तथाकथित विचारधारा के विरोध का अड्डा बन चुका निजी मीडिया चैनल वाला स्टूडियो किस प्रकार से भविष्य में विपक्ष को मुद्दे प्रदान करता है, यह दिलचस्प होगा. 

1 Comment

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    November 24, 2019 - 6:50 am

    What a stuff of un-ambiguity and preserveness
    of precious familiarity concerning unexpected feelings.

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