अपनी नाकामियों को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकारता राहुल गांधी का ‘निष्पक्ष’ इंटरव्यू!

अभी रविश कुमार जी का राहुल गांधी द्वारा दिया गया इंटरव्यू देखा. वैसे तो कई लोगों की यह मांग रही है कि प्रधानमंत्री मोदी को रवीश कुमार को इंटरव्यू देना चाहिए. यह मांग तब है जब इस देश के प्रधानमंत्री में हर साल कम से कम 4 मीडिया हाउसेस को इंटरव्यू दिया है. फिर भी कुछ लोगों की श्रद्धा यदि एक व्यक्ति पर है तो यह उनकी निजी सोच हो सकती है जिसका सम्मान करना चाहिए. लेकिन कल के इंटरव्यू में हमारे रवीश कुमार जी कुछ बदले हुए नज़र आये.

आमतौर पर कठिन सवाल पूछने के लिए ‘विख्यात’ रवीश कुमार ने कल राहुल गांधी से भी कठिन (प्रशंसकों के अनुसार) सवाल पूछे, लेकिन जो जवाब उधर से आया वो सवाल के स्तर के हिसाब से ठीक नहीं था. इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि इन जवाबों को रवीश कुमार जी बड़े आराम से स्वीकार कर गए. आमतौर पर TV स्टूडियो मे बैठकर एक जवाब का पोस्टमार्टम करने वाले रवीश जी जवाब के पहले संस्करण से ही खुश दिखे. शायद AC कमरों से इतनी धूप में पत्रकारिता करने निकले रवीश जी को याद न रहा होगा कि काउंटर क्वेश्चन भी किया जाता है. धूप भी ज़्यादा है और नेता भी व्यस्त हैं. खैर, वह भी तो इंसान ही हैं.

दूसरी तरफ हमारे राहुल गांधी जी का अंदाज़ गजब था. वैसे वो कोई नए कलेवर में नहीं थे, लेकिन रविश कुमार के सामने वह जिस प्रकार से उनकी बातों को काट रहे थे, ऐसे लग रहा था मानो लड़के में नया कंफीडेंस आ गया हो. उनकी गहरी बातें भी जबरदस्त स्तर पर थी. जैसे ‘राहुल गांधी ही राहुल गांधी को हराना चाहता है’. यह सुनने के बाद रविश कुमार को भी 2 मिनट लगे इस शाब्दिक चक्रव्यूह से बाहर आने के लिए. लेकिन वो आ गए. इस पूरे इंटरव्यू में राहुल गांधी लगभग वही बोलते आये जो वो हमेशा अलग-अलग चुनावी रैलियों में बोलते आये हैं. कुछ अलग हो सकता था, यदि इस इंटरव्यू में आंकड़ों की बात होती. लेकिन इसमें आंकड़ों की बात क्कम और सिद्धांतों की बातें ज़्यादा हुई.

राहुल गांधी में यह भी कहा कि वो प्रेम से नरेंद्र मोदी और भारत का दिल जीतना चाहते हैं. जहां तक बात प्रेम की है तो नरेंद्र मोदी पर सबसे ज़्यादा व्यक्तिगत हमले उनकी पार्टी द्वारा ही हुए हैं. स्वयं राहुल गांधी बिना सबूत के प्रधानमंत्री को चोर जैसे अपमानजनक शब्दावली से संबोधित करते हैं. यह किस स्तर का प्रेम है? क्या ये वही प्रेम है जब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षर किए गए अध्यादेश को उनके द्वारा फाड़ा गया था? जो भी राहुल गांधी का पर्चा लिखता है, उसको अपने ज्ञानवर्धन की आवश्यकता है. उसकी गलती के कारण कांग्रेस का भविष्य खतरे में आ जाता है…या आ चुका.

राहुल गांधी ने यह स्वीकार किया कि 2004 में भयंकर आतंकवाद था. यानी उन्होंने अपनी सरकार के समय की नाकामी को स्वीकार किया. इस पर भी पत्रकार महोदय से कोई काउंटर क्वेश्चन नहीं आया कि जब आपके राज मे खुद आतंकवाद ज़्यादा था तो आप नरेंद्र मोदी को कैसे कठघरे में खड़ा कर सकते हैं? लेकिन यह सवाल नहीं पूछा गया. इस इंटरव्यू में रवीश जी से ज़्यादा आक्रामक राहुल गांधी नज़र आये.

इंटरव्यू के अंत में दोनों ही तरफ से एक दूसरे को बहादुरी का तमगा भी दिया गया. देखकर मन प्रफुल्लित हो गया कि आज हमने निष्पक्ष पत्रकारिता का यह भी रूप देख लिया. इस इंटरव्यू की मोदी द्वारा अक्षय कुमार के इंटरव्यू से तुलना की जा रही है. आम और अनार के स्वाद पर तीखे कटाक्ष किये जा रहे हैं. शायद यह कटाक्ष करने वालों ने कभी ‘गैर-राजनीतिक इंटरव्यू’ के बारे में नहीं सुना. वैसे यह देखकर दुख हुआ कि पत्रकारिता में सालों के अनुभव लिए व्यक्ति की तुलना अक्षय कुमार से हो रही है. शायद यही आज के समय की सच्चाई हो…

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