सावरकर के बारे में हर बार क्यों प्रोपगंडा चलाया जाता हैं?

जब 2014 में भाजपा की सरकार आई तब लिबरल्स को यह डर सताने लगा कि भाजपा NCERT और अन्य पाठ्यक्रमों को भगवा रंग दे देगी. नेहरु गांधी और मुग़लों के अलावा किसी भी अन्य शहीद या देश से प्रेम करने वाले व्यक्ति का पाठ्यक्रम में शामिल किया जाने का मतलब है उसे भगवा रंग देना.

राजस्थान में वसुंधरा सरकार ने तीन साल पहले विनायक दामोदर सावरकर की वीरता और क्रांति की कहानी पाठ्यक्रम में शामिल की थी. लेकिन अब कांग्रेस शासन में नए सिरे से तैयार स्कूली पाठ्यक्रम में उन्हें वीर की जगह जेल की यातनाओं से परेशान होकर ब्रिटिश सरकार से दया मांगने वाला बताया गया है. इसके साथ ही नए तथ्य भी जोड़े गए हैं. लेफ़्ट हमेशा से ही यह झूठ फैलाता आया है कि वीर सावरकर ने अंग्रेज़ सरकार से माफ़ी माँगी थी जिसके तहत वो देश भक्त नहीं बल्कि ग़द्दार थे.

पर इस बात में कितनी सच्चाई है? क्या कभी लेफ़्ट या लिबरल्स या कांग्रेस सरकार ने कोई ऐसा सबूत दिया जिससे यह पता चले कि वीर सावरकर ने माफ़ीनामा दिया था. दरअसल सावरकर ने माफ़ी नामा नहीं दया याचिका दायर की थी. और यह दया याचिका केवल ख़ुद के लिए नहीं बल्कि सभी राजनैतिक बंदियों के लिए माँगी गई थी.

अंडमान जेल में हो रहे क़ैदियों के साथ आमानवीय व्यवहार को देखते हुए शायद यह दया याचिका दायर की गई होगी. क़ैदियों से कोल्हू के बैलों की तरह काम करवाया जाता था, तरह तरह की यातनाएँ दी जाती थी. कई बंदियों ने यातनाओं से तंग आकर आत्महत्या भी कर ली थी. सावरकर शायद ये जानते थे कि जेल में सड़कर देश के लिए मरने से बेहतर देश के लिए जीना है. एक मृत इंसान देश के लिए मरने के बाद शायद ही कुछ कर पाए.

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सावरकर यह जानते थे कि कालापानी जेल के अंदर रहकर वो देश की स्वतंत्रता में भाग नहीं ले पाएँगे. सावरकर ने अपनी किताब ”My transportation for life” में लिखा है कि इन यातनाओं से बचने का की तरीक़ा नहीं था. अगर वो कोई पत्र लिखते भी तो उसमें वो जेल में दी जा रही यातनाओं के बारे में नहीं लिख सकते थे. और अगर लिखते भी तो वह पत्र कई अलग अलग अफ़सरों की कांट छाँट के बाद ही पहुँचता.

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सौ: https://savarkarsmarak.com/activityimages/My%20Transportation%20to%20Life.pdf

सावरकर ने इस किताब में यह भी लिखा है कि राजनैतिक क़ैदियों को अन्य क़ैदियों से भी बुरा व्यवहार झेलना पड़ रहा था. राजनैतिक क़ैदी की सज़ा और सुविधाएँ जहाँ अन्य क़ैदियों से अलग होनी चाहिए थी वहीं यह सुविधा यह बोलकर मुहैय्या नहीं कराई जा रही थी कि अन्य क़ैदी इसे पक्षपात मानेंगे.

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सावरकर ने एक आम याचिका दायर की थी ना कि ख़ुद के लिए दया या माफ़ी माँगी थी

सावरकर लिखते हैं कि यह याचिका मैंने ख़ुद को नहीं बल्कि बाक़ी क़ैदियों को जेल से रिहा करने के लिए लिखी थी. और अगर बाक़ी क़ैदियों को रिहा कर दिया जाता है तो मुझे जेल में रहने को कोई दुख नहीं होगा.

यहाँ साफ़ लिखा है कि सावरकर ने ”General amnesty on political prisoners” की माँग की थी, . बैरिस्टर होने के नाते वीर सावरकर अच्छे से अपना हक़ जानते थे और क़ानूनी भाषा में पकड़ अच्छी थी.

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इन बातों से यह साफ़ हो जाता है कि सावरकर की दया याचिका उनके लिए नहीं बल्कि जेल में दी जा रही यातनाओं और अन्य क्रांतिकारियों की आत्महत्या से दुखी होकर भेजी थी. उन्होंने अपनी किताब में ऐसी ही इंदू भूषण नामक क़ैदी की आत्महत्या का विवरण किया है.

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इस बिन्दू पर भी ध्यान देना होगा कि उस वक़्त ब्रिटिश सरकार उस वक़्त शायद भारत को एक स्वतंत्र सरकार देने की मंशा बना रही थी, जिसके चलते सावरकर और अन्य क़ैदियों को जेल में रखने का कोई अर्थ नहीं था. अगर सरकार स्वतंत्र हो रही है तो फिर इतने सारे लोगों को जेल में रखने का क्या अर्थ है? यह किस प्रकार की स्वतंत्रता है जहाँ आधे लोग जेल में सड़ें, भाई भाई से अलग हो.

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सावरकर द्वारा लिखी गई इस किताब को आप मुफ़्त में यहाँ पढ़ सकते हैं

क्या यही कारण है कि लेफ़्ट या कांग्रेस कभी भी सावरकर द्वारा माँगी गई दया का कोई सबूत नहीं दे पाई क्योंकि उन्होंने अपने लिये दया याचना की ही नहीं थी? सावरकर ने केवल अपने साथियों की रिहाई की माँग की थी क्या बात सामने आने पर सावरकर का देश की नज़रों में क़द और बढ़ जाता? क्या इसी भय से लेफ़्ट ने देश को इस बात का इस्तेमाल कर इतने वर्षों तक गुमराह किया?

आख़िर क्या कारण है कि कांग्रेस नेहरु और गांधी के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति जो उनकी सोच से इत्तेफ़ाक ना रखता हो उसकी वीरता का गुणगान करने से कतराती है. सालों से किया गया गांधीवादी ब्रेनवाश, कि केवल गांधी और नेहरु परिवार ने ही देश के लिए कुछ इस बात से पर्दा हटाने के लिए जैसे ही कोई कोशिश होती है कांग्रेस सरकार तुरंत ही तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर व्यक्ति को देशद्रोही साबित कर देती है.

Rashmi Singh
Writer by fluke, started with faking news continuing the journey with Lopak.

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