रडार पर तर्कों की ‘रेंज’ से बाहर बुद्धिजीवियों के कटाक्ष

क्या किसी देश के राजनेता अपने ही चुने हुए प्रधानमंत्री को एक मूर्ख घोषित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा सकते हैं? बिल्कुल लगा सकते हैं. आज भारतीय राजनीति में यही हो रहा है. 2014 में देश ने एक राजनीतिक परिवार को दरकिनार करते हुए जिस प्रकार से भारतीय जनता पार्टी को 30 साल बाद पूर्ण बहुमत दिया उसके बाद से देश की राजनीति में एक बहुत ही नाटकीय रूपांतरण हुआ.

नरेंद्र मोदी का अभी एक इंटरव्यू हुआ था. एक निजी टीवी चैनल पर इंटरव्यू देते हुए उन्होंने बालाकोट स्ट्राइक का जिक्र करते हुए यह बताया कि उस समय किस प्रकार से भारतीय वायु सेना ने अपनी योजनाएं बनाई थी. उस समय के कालखंड को याद करते हुए नरेंद्र मोदी ने एक बात साझा करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने भारतीय वायु सेना को एक उपाय सुझाया.

उन्होंने बताया कि बादलों के लग जाने के बाद पाकिस्तानी वायुसेना को भारतीय विमानों को निशाना बनाने में दिक्कतें होंगी. तार्किक रूप से यह बात सही भी थी लेकिन इस आधुनिक जमाने में कई ऐसी तकनीक इजाद हो गई है जिसने पिछली दिक्कतों को दूर कर दिया है. पाकिस्तान कितना भी नालायक देश हो लेकिन उसने अपनी देश की सुरक्षा के लिए आधुनिक हथियारों का जमावड़ा लगा रखा है.

अब इसी बात को लेते हुए नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया जा रहा है. उनकी बातों को कोरा झूठ बताया जा रहा है लेकिन क्या तथ्य यह बात स्वीकार करते हैं. कम से कम हमें जो तथ्य मिले उस हिसाब से तो नरेंद्र मोदी की बात में लेश मात्र भी झूठ नहीं है. दरअसल मुख्य चार प्रकार के रडार होते हैं. S-बैंड रडार, X-बैंड रडार, C-बैंड रडार और अंत में L-बैंड रडार.

X-बैंड रडार ऐरक्राफ्ट्स और ज़मीनी स्तर पर लगता है और खराब मौसम में यही सबसे ज़्यादा प्रभावित होता है. ऐसे ही S-बैंड और C-बैंड रडार भी ज़मीन से हवा में मार करने वाली रक्षा प्रणालियों में लगता है. ऐरक्राफ्ट्स के बाद यही सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं. L-बैंड रडार मौसम में खराबी से सबसे कम प्रभावित होता है. इसी रडार को भारतीय वायु सेना (IAF) ने बालकोट हमले में जाम कर दिया था.

बालाकोट हमले में शामिल एक भारतीय पायलट से जब इसके बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि पाकिस्तान के पास स्वीडिश जिराफ रडार थे जो खराब मौसम में भी हलचल का पता लगा सकते थे, लेकिन उनके हथियार ( अंदाजे के अनुसार RBS 70) खराब मौसम में इस्तेमाल करने लायक नहीं थे. उन हथियारों में ‘इंफ्रा-रेड’ का इस्तेमाल हुआ था जो खराब मौसम में काम करने हेतु उपयोगी न थे. इसलिए उनको भारतीय जहाजों को निशाना बनाने मे बहुत मुसीबतें हुई.

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अब ऊपर के तथ्य से आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि नरेंद्र मोदी की युक्ति किस प्रकार से काम कर रही थी. निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी कोई फाइटर पायलट नहीं है. वह देश के कोई सैनिक भी नहीं है. उन्होंने सेना की कोई ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन हर व्यक्ति के अंदर एक कॉमन सेंस होता है. भारतीय सेना भी छठी इंद्रियों के इस्तेमाल की उपयोगिता के बारे में बताती है.

देश का एक आम नागरिक भी देश की सेना की सहायता के लिए अपनी राय दे सकता है. उस राय को मानना या ना मानना सेना के ऊपर होता है. वैसे ही देश का प्रधानमंत्री भी देश की सेना को उपाय सुझा सकता है. उपाय सुझाने का मतलब यह नहीं कि वह कोई आदेश दे रहा है. भारतीय सेना ने यदि इस उपाय को मानकर अपनी जानकारी के अनुसार इस्तेमाल किया तो इसमें भारतीय सेना और देश के नेतृत्व; दोनों की ही भूरी भूरी प्रशंसा की जानी चाहिए.

विडंबना देखिए, देश का विपक्ष सेना की बहादुरी को तो सम्मान देने की बातें करता है लेकिन देश के प्रधानमंत्री की सूझबूझ को दरकिनार करते हुए इसका मजाक उड़ाता है. उसकी सोशल मीडिया सेना भी यही कार्य कर रही है. राजनीतिक कटुता अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है.

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