भगवा के विरुद्ध सेक्युलर राजनीतिज्ञों की असहिष्णुता

नरेंद्र मोदी की केदारनाथ यात्रा पर विपक्ष द्वारा काफी कटाक्ष किया जा रहा है. ऐसा बोला जा रहा है कि अपनी यात्रा में कैमरा ले जाने का क्या तुक था. सवाल अपनी जगह सही है. लेकिन जब हर मामले में तर्क देने वाले लोगों की तर्क शक्ति क्षीण हो जाए तो प्रश्न उठते हैं. चुनावी समीकरणों को देखते हुए अपनी तर्क शक्ति का भरपूर इस्तेमाल करने वाले विपक्ष के नेताओं को शायद यह बात अभी भी हजम नहीं हो पा रही है कि नरेंद्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री हैं. ऊपर से कुछ स्वयंभू निष्पक्ष पत्रकारिता की नदी में डुबकी लगा चुके पत्रकारों को भी इसमें राजनीति नज़र आती है. नरेंद्र दामोदरदास मोदी का निजी जीवन भी अब सार्वजनिक हो चुका है. यदि ऐसा नहीं है तो नरेंद्र मोदी की माता और उनकी पत्नी के बारे में कटाक्ष देश का विपक्ष ना कर रहा होता. राहुल गांधी उन्हें झूठे घोटाले में चोर कह सुप्रीम कोर्ट में जाकर 3 बार लिखित में माफी ना मांग रहे होते. लेकिन क्या नरेंद्र मोदी को अपनी आस्था कासम्मान करने का अधिकार नहीं?

नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा करने से पहले देश के विपक्ष को यह बताना पड़ेगा कि आखिर वह नेता कौन थे जो अपना जनेऊ भी ऊपर पहनकर मीडिया कैमरों के सामने से यह दिखाने का प्रयास कर रहे थे कि अब उनका दत्तात्रेय गोत्र वाला ब्राह्मण रक्त उबाल मार रहा है. दूसरी तरफ, प्रियंका गांधी भी मंदिर-मंदिर दौड़ लगा रही है. टेंपल रन के इस खेल में ऐसा कोई मंदिर नहीं होगा जहां प्रियंका गांधी के साथ कैमरा पीछे-पीछे नहीं गया, तो क्या हम उन्हें भी नाटक करने वाली बोलना शुरू कर दें.

दरअसल नेताओं की इस स्तर हीन राजनीति का कारण उनकी हताशा है. 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत से ज़्यादा देश की कुछ पारिवारिक पार्टियों को इस बात का मलाल था कि नरेंद्र मोदी जातिगत समीकरण से ऊपर उठकर यह चुनाव जीते हैं. इसमें उनके परंपरागत वोट बैंक को ही नहीं हिलाया बल्कि भारतीय राजनीति की एक धुरी को ही बदल कर रख दिया.

नरेंद्र मोदी की धार्मिक यात्रा उनकी आस्था को उनके द्वारा सम्मान था. इससे पहले भी नेहरू, इंदिरा और राजीव की यात्राओं को कैमरे में कैद किया जा चुका है. उनकी उन्हीं तस्वीरों को सोशल मीडिया पर शेयर कर उन्हें ‘हिन्दू-हितैषी’ घोषित किया जा रहा है. उन फोटोज पर कोई सवाल नहीं पूछ रहा है, बल्कि धार्मिक आस्थाओं की दुहाई दे रहा है. तो फिर भी आखिर मोदी ही इस कटुता के भागी क्यों बन रहे हैं? हमने मीडिया के कैमरों को एक राजनेता के पालतू श्वान की हरकतों को भी कैद करते देखा है. राहुल गांधी की चुनावी सभाओं को भी मीडिया का कैमरा कैद करता है. यहां तक कि राहुल का जनेऊ का रंग भी कैमरे में कैद किया गया है, तो नरेंद्र मोदी की यात्रा की कवरेज पर इतना गर्म माहौल क्यों? क्या यह दरकती हुई राजनैतिक ज़मीन को बचाने का एक प्रयास है.

इसके इतर एक सवाल यह भी है कि आखिर देश के प्रधानमंत्री की फ़ोटो पर कटाक्ष क्यों किया जा रहा है? मोदी को मीम मटेरियल बनाने के ऊपर खुद मोदी को ऐतराज नहीं है, लेकिन जब किसी पसंदीदा पार्टी को लाभ पहुंचाने के लिए तर्कशील व्यक्तियों द्वारा भी अतार्किक बातें हो तो दुख होता है. यहां वही हो रहा है. कम से कम हम इतनी नैतिकता तो रखें कि किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता को मात्र इसलिए न छीनें क्योंकि वह आपका राजनैतिक विरोधी है. विचारों की लड़ाई को विचारों के स्तर लर लड़ें और ऐसे विचार तो सच में बहुत निचले स्तर के हैं. प्रधानमंत्रियों का वह दौर निकल गया जब भगवा से उनकी दूरी उनको सेकुलरिज्म का सर्टिफिकेट दे देती थी. आज का दौर बदल चुका है. एक गौरवांवित सनातनी का यह अपने धर्म, अपने विश्वास और अपनी मान्यताओं के प्रति आदर है. ये देश परंपराओं से चलेगा, नेताओं के एजेंडे से नहीं. नरेंद्र मोदी आज बद्रीनाथ में भी हैं. पाठकगण कृपया उस पर भी ध्यान बनाएं रखें. मजारों पर चादर चढ़ाने वालों का भगवा के प्रति ऐसी असहिष्णुता को नोट कर के रख लेवें.

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