मुसलमान सांसद नहीं, ज़िम्मेदार सांसद ढूंढिए पत्रकार महोदय!

2019 के लोकसभा चुनावों में बड़े-बड़े धुरंधरों को धूल चाटनी पड़ी. निश्चित रूप से वह इसकी समीक्षा अवश्य करेंगे, लेकिन उनके समर्थकों और कुछ नेताओं में स्पोर्ट्समैन स्पिरिट की कमी साफ झलकती है. यह उनके दिए जा रहे तर्कों से स्पष्ट भी हो जाता है. सोशल मीडिया पर इनके समर्थकों ने अब एक नया ही शिगूफा छोड़ दिया है.

वह कह रहे हैं कि भाजपा के 303 सांसदों में एक भी मुसलमान नहीं है. कुछ तथाकथित सेक्युलर और निष्पक्ष पत्रकारो के ट्विटर हैंडल से भी अप्रत्यक्ष रूप से यही कहा गया. यह आज की राजनीति से जमीनी स्तर से कटे हुए लोगों की खीझ है लेकिन ये लोग अभी भी नरेंद्र मोदी को स्वीकार करने में असमर्थ नजर आ रहे हैं.

यह बात अभी भी समझ से परे है कि देश की राजनीति में आखिर क्यों सब कुछ मुसलमानों पर केंद्रित कर दिया जाता है. हमारे देश के अंदर पारसी, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध; कुछ ऐसे धर्म है जो अल्पसंख्यकों में आते हैं; लेकिन इसके पश्चात भी अल्पसंख्यकों के नाम पर सिर्फ मुसलमानों की बात की जाती है. उनको तो सेक्युलरिज्म के प्रतीक के रूप में भी दिखाया गया है. यह पुरानी राजनीति अब जनता द्वारा अस्वीकार कर दी गई है.

अगर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों में कोई मुसलमान जीतकर नहीं आया, तो इसमें भारतीय जनता पार्टी की क्या गलती? ऐसा नहीं कि भारतीय जनता पार्टी ने किसी मुसलमान को टिकट नहीं दिया. कई ऐसी सीटें थी जहां पर भारतीय जनता पार्टी ने मुसलमानों को टिकट दिया था. वहां उनका ना जीत पाना स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि वह उनकी व्यक्तिगत हार थी. संगठन ने वहां उनके लिए भी कार्य किया था. इस प्रकार का घिसी-पिटी और अतार्किक बात करके देश का विपक्ष और उनके समर्थक अपने सम्मान को ही कम कर रहे हैं.

देश में एक तबका ऐसा भी है जो अपने आप को पत्रकार कहता है. उन पत्रकारों द्वारा इसी बात को दोहराया जाना बताता है कि भले ही उन्होंने हाथ में कलम पकड़ ली हो लेकिन उनके दिमाग में अभी भी एजेंडा हावी है. आखिर आप निष्पक्षता वाला कोट पहन के इस प्रकार की बेकार बात कैसे कर सकते हैं. हमारे देश के अंदर कुल 543 सांसद हैं. उनको यदि आप हिंदू मुसलमान सिख ईसाई पारसी इत्यादि से हटाकर सिर्फ भारतीय की तरह देखें तो शायद आपकी बुद्धि थोड़ी खुलेगी. ऐसा पता नहीं क्यों किया जाता है लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

देश के मुसलमानों में भारतीय जनता पार्टी और खासकर नरेंद्र मोदी का भय उत्पन्न करना विपक्ष के नेताओं के लिए फायदेमंद अवश्य हो सकता है, लेकिन इन पत्रकारों द्वारा उसी भय को हवा देना क्या विपक्ष के लिए कैंपेनिंग नहीं कहलाएगा? कोई संदेह नहीं कि कुछ पत्रकार विपक्ष की हार पर क्यों बौखलाए हुए हैं. आखिर उन्होंने भी तो जमीनी स्तर पर अपनी तरफ से मोदी को हराने के लिए पूरा प्रयास किया है. ऐसे नतीजे कार्यकर्ताओं के साथ उन पत्रकारों को भी निराश करने वाला है. जिन्होंने एक कार्यकर्ता के रूप में ही जमीन पर कार्य किया है.

सच्चाई यही है कि नरेंद्र मोदी अब अगले 5 साल के लिए भी देश के प्रधानमंत्री हैं. उनको 2014 से बड़ा मैंडेट मिला है. निश्चित रूप से उनकी जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं और कल वाले भाषण में उन्होंने इस बात को स्वीकारा भी है. कुछ पत्रकार, उनके समर्थक और उनकी विचारधारा से तालमेल रखने वाली पार्टियों के लिए अब यही एक बेहतर विकल्प होगा कि वह नरेंद्र मोदी का अंध विरोध करने से ज्यादा अपने क्षेत्र के विकास के लिए कार्य करें.

निष्पक्षता की धुरी पर और ईमानदार रहने का प्रयास करें. भारतीय जनता पार्टी को भले ही एक मुस्लिम विरोधी पार्टी के रूप में स्थापित कर दिया गया हो लेकिन लोकतंत्र की असली खूबी यही है की यहां जनता नेताओं की भाग्य विधाता होती है. कृत्रिम रूप से बनाए गए डर के माहौल को जनता कभी स्वीकार नहीं करती.

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