गठबंधन ने ठगा अखिलेश यादव को, बसपा के साथ के बाद भी सपा की एक भी सीट नहीं बढ़ी

2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती जी की बहुजन समाजवादी पार्टी को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी. 2019 में गेस्ट हाउस कांड और अपना तिरस्कार भुला कर मायावती जी ने अखिलेश यादव के साथ फ़ासीवादी ताक़तों को हराने का संकल्प लिया.

अखिलेश यादव को भी इस गठबंधन से उम्मीद जगी. लगभग ख़त्म हो चुकी पार्टी के साथ उन्होंने हाथ मिलाया, एक तरह से कहें तो मायावती जी जो की उनकी प्रतिद्वंदी थी उनके करियर को पुनर्जीवित किया पर नतीजा केवल यही निकला की बबुआ की पार्टी तो वहीं की वहीं रह गयी और बुआ की पार्टी को पाँच सीटें और मिल गयी.

2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को राष्ट्रीय स्तर पर 4.19 प्रतिशत वोट प्राप्त होने के बावजूद एक भी सीट नहीं मिली थी. पर अब बसपा के लिये पांच साल बाद संसद के निचले सदन में फिर से दस्तक देने की उम्मीद जागी है. समाजवादी पार्टी के पिछली लोकसभा में पाँच सीटें मिली थी, और इस बार भी पाँच ही मिली हैं. जबकि बहुजन समाजवादी पार्टी 0 से 10 पर पहुँच गयी है.

जिस गठबंधन को अखिलेश फ़ायदे का सौदा समझ रहे थे दरअसल वो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी साबित हुई. अखिलेश शायद गठबंधन ना करते तो उन्हें टक्कर देने के लिए ना केवल एक पार्टी कम होती बल्कि शायद जहाँ बसपा को वोट गया वो भी उनकी पार्टी को मिल सकता था.

देश भर के पत्रकार चिंता में थे कि कांग्रेस ने गठबंधन में हिस्सा क्यों नहीं लिया. मोदी को हराने की चिंता उन्हें राजनैतिक पार्टियों से भी ज़्यादा थी. पर कांग्रेस पार्टी ने यहाँ समझदारी दिखाई. अखिलेश यादव के लिए एक दूसरी बुरी ख़बर यह भी है कि उनकी पत्नी डिम्पल की एंट्री इस बार लोकसभा में नहीं हो पाएगी

Rashmi Singh
Writer by fluke, started with faking news continuing the journey with Lopak.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *