राजनीतिक ज़मीन पर ‘कमल’ का फैलाया सांप्रदायिक कीचड़ बेनकाब

राजनीति में नए आए कमल हसन को ऐसा लगता है कि वह देश की राजनीति को बेहतर तरीके से समझ चुके हैं. दक्षिण भारत में रील ज़िन्दगी के सुपरस्टार अब राजनीति में अपना भाग्य आजमा रहे हैं. उनको इसका अधिकार भी है. देश का संविधान किसी भी व्यक्ति को लोकतंत्र की मर्यादाओं के अंदर कुछ भी करने की छूट देता है. लेकिन अपनी राजनीति में सुपरस्टार बनने के चक्कर में क्या एक धर्मविशेष को लज्जित किया जाना सही है?

कमल हसन ने देश की बहुसंख्यक आबादी का मखौल उड़ाया है. एक रैली को संबोधित करते हुए कमल हसन ने कहा कि “मैं यह इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि यह मुस्लिम बाहुल्य इलाका है लेकिन आजाद भारत का सबसे पहला आतंकवादी नाथूराम गोडसे था. जिसने महात्मा गांधी की हत्या की थी. वो एक हिंदू था.”

आश्चर्य की बात है कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता” वाला बैनर लिए एक तथाकथित समुदाय का बचाव करने वाले लोग इस बात पर चुप है. कमल हसन से हमें कोई गहरी राजनीति की उम्मीद नहीं थी. इस देश का राजनीतिक इतिहास बताता है कि देश के कलाकारों द्वारा जब राजनीति को अपनाया गया, तो उनमें से बहुत कम ही देश की गहरी राजनीति को समझ पाए हैं. ज्यादातर कलाकारों की राजनीति सतही स्तर पर ही चलती थी.

कमल हसन भी उसी सतही राजनीति का हिस्सा हैं. पता नहीं कि उन्होंने यह बयान क्या सोच कर दिया. लेकिन उनका यह बयान करोड़ों बहुसंख्यको की भावनाओं को आहत कर गया. कमल हसन शायद दक्षिण भारत में अपनी राजनीति को सीमित रखना चाहते हो. यही कारण है कि उन्होंने देश की बहुसंख्यक आबादी का अपमान करने में भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई. लेकिन क्या एक नागरिक के तौर पर वह अपने कर्तव्य को भुला चुके हैं?

दुनिया ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को गिरते देखा. भारत में 26/11 जैसा हमला देखा. दुनिया आज भी इस्लामिक स्टेट के आतंकवाद से जूझ रही है. लेकिन फिर भी कमल हसन को आतंकवाद का धर्म नहीं पता चला. चुनावों के बीच में अचानक उन्होंने देश की बहुसंख्यक आबादी को ही आतंकवादी घोषित कर दिया.

यह कुछ वैसा ही था जैसा कांग्रेसी कालखंड में हुआ करता था. जहां देश के बहुसंख्यको को आतंकवादी घोषित कर दिया गया था. अगर कसाब ना पकड़ा जाता तो दिग्विजय सिंह द्वारा तो पूरी पटकथा तैयार कर ली गई थी. समझ में यह नहीं आता है कि आखिर हमारे देश के तथाकथित सेक्युलर राजनेताओं को हिंदुओं से तकलीफ क्या है?

नाथूराम गोडसे को कुछ लोग आतंकवादी मानते हैं. यह जानते हुए भी कि अंग्रेजी हुकूमत के दौर में सबसे कठिन सजा (काला पानी) की सजा काटकर नाथूराम गोडसे बाहर आए थे. कोल्हू के बैल जैसी उनकी दुर्दशा कर दी गयी थी. हड्डियाँ बाहर निकल आई थी. भोजन और पानी का नामोनिशान नहीं था. अगली सुबह होगी या नहीं, इसका कोई ज्ञान न था. अंधेरे में एक कोठरी तक सीमित हो चुका गोडसे का जीवन जाने बगैर कुछ लोग सिर्फ ‘एक चिट्ठी में माफी’ को देखकर उनके चरित्र पर दाग लगाते हैं. विडंबना देखिये की इनमें से अधिकतर वो हैं जो एक कोर्ट के कागज़ पर तुरंत करबद्ध माफी मांगने लगते हैं. लेकिन फिर भी इस सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि गांधी की छाती पर लगी तीन गोलियां गोडसे की बंदूक से निकली थी.

वैचारिक मतभेद इस देश में कोई नई बात नहीं है लेकिन जब आप का वैचारिक मतभेद में तथ्यों को सिर्फ एक चश्मे से देखने लगे तब दिक्कतें पैदा होती हैं. वह संप्रदाय जिसने दुनिया भर के धर्मों को अपने साथ रहने की इजाजत दी. दुनिया का सबसे शांतिप्रिय संप्रदाय जो शांति का संदेश सच में देता है. इस दुनिया में यदि कोई एक ऐसा धर्म है तो वह सनातन धर्म है. ऐसा कोई एक व्यक्ति हैंतो वह हिंदू है. फिर भी इस देश का एक राजनैतिक वर्ग लगातार उसकी अस्मिता और अखंडता पर इस प्रकार की वैचारिक चोट करता है. जैसे यह उन राजनीतिज्ञों की राजनैतिक डिक्शनरी में लिख दिया गया हो. वह इसको भूलना ही नहीं चाहते.

कमल हसन अपनी फिल्मों में जिस प्रकार से सुपरस्टार बनते हैं, वह भारतीय राजनीति में उतने ही बड़े ‘शून्य’ सिद्ध हो रहे हैं. यदि वह नाथूराम गोडसे को आतंकवादी मानते भी हैं, तब भी उनका नाथूराम गोडसे को हिंदुओं से जोड़ने से क्या तात्पर्य था? उनकी बातों से तो यह स्पष्ट है कि वह गोडसे को आतंकवादी ही मानते हैं.

अब यदि वह एक आतंकवादी को एक धर्म विशेष से जोड़ कर अपनी बात रख रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब यह निकलता है कि वह उस धर्म विशेष को निशाना बनाकर दूसरे धर्म विशेष के वोट बटोर ना चाहते हैं. जानकारी के लिए आपको बता दें कि वह जिस जगह पर अपनी रैली कर रहे थे वहां इलाका मुस्लिम बाहुल्य वाला है. राजनैतिक तौर पर तो बात एकदम स्पष्ट हो जाती हैं.

दक्षिण भारत में कलाकारों का राजनीति में एक अलग ही स्थान है. जयललिता को तो भगवान से सिर्फ एक पायदान ही नीचे तक की ख्याति प्राप्त हुई थी. शायद वहां सिनेमा को असल जिंदगी से ज्यादा तरजीह दी जाती हो, लेकिन फिर भी यह तथ्य तो वैसे का वैसा ही रहने वाला है कि कमल हसन ने जानबूझकर इस प्रकार की हरकत की है. उनके बयान से उनको राजनीतिक नुकसान कितना होता है यह तो 23 मई को ही पता चलेगा, लेकिन इससे भारत की छवि और हिंदुओं की अस्मिता पर एक बड़ा कुठाराघात हुआ है.

कुर्सी की लड़ाई के बीच में इस प्रकार से एक संप्रदाय को पीस देना लोकतंत्र में महा पाप का दर्जा दिया गया है. इस महा पाप करने वाले कमल हसन को राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए. आप किसी व्यक्ति विशेष की गलती के लिए पूरे संप्रदाय को दोषी नहीं ठहरा सकते. इस प्रकार की सेकुलर राजनीति हमारे देश में बहुत खतरनाक स्तर तक जा रही है. सोचकर सिहरन होती है कि यदि 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार ना आई होती तो हमें ऐसे लोगों के रंग देखने को ही ना मिलते…..


दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

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