जिस बात को मानने का साहस भारतीय मीडिया में नहीं उसे एक बांग्लादेशी पत्रकार ने कहा.

हाल ही में आए चुनाव नतीजों के बाद लिबरल मीडिया वही ग़लती दुहरा रहा है जो उसने 2014 में की थी. भाजपा की सत्ता को अल्पसंख्यकों के लिए ख़तरा बताने का काम अगर किसी ने किया है तो वह मीडिया ही है, आम जनता में यह भय हो ना हो.

जब इस तरह की बात बार बार दुहराई जाती है तो केवल दर्शक की नज़र से समाचार देख रहा व्यक्ति भी एक बार को सोचने पर विवश हो जाता है. कुछ कड़वे घूँट है जो भारतीय मीडिया ना पीना चाहती है ना ही किसी और को पीने देना चाहती है. सावन के अंधे की तरह केवल एक ही रंग देखने में जुटा लिबरल समाज यह समझ नहीं पा रहा है कि आख़िर क्यों लिबरल समाज का बिखरना अटल था.

ढाका ट्रिब्यून के पत्रकार शफ़ीकुर रहमान  लिखते हैं कि राइट विंग का आगमन एक ऐसा बदलाव नहीं है जो कुछ समय के लिए है, यह एक स्थाई बदलाव है.वह आगे लिखते हैं कि दक्षिण एशिया के एक अमरीकी पाकिस्तानी ब्लॉगर ने कई वर्ष पहले एक सवाल उठाया था कि यदि आधुनिक मानवतावाद और उदारवाद बुरी तरह से असफल होकर टूट जाता है, तो क्या भविष्य के इतिहासकार पीछे मुड़कर देखेंगे और कहेंगे कि इस्लाम वह चट्टान थी जिस पर यह पहली और निर्णायक रूप से टूटा था.

ब्लॉगर का मानना था कि इस्लाम ही उदारवाद की सबसे बड़ी चुनौती है. इस्लाम अल्पसंख्या में होने पर मुख्यधारा में आत्मसात होने का विरोध करता है और जब बहुसंख्यक होता है तो अपने सिद्धांतो को दूसरों पर थोपता है. मुसलमान ना केवल उदारवाद को काम आँकते हैं बल्कि उस पर संशय भी करता है.

भारत में बीजेपी की जीत किसी भी तरह से आश्चर्य की बात नहीं थी. यदि मुसलमान अपनी धार्मिक पहचान और परंपराओं को लेकर अनभिज्ञता से मुखर हो सकते हैं, तो अन्य समूह अपनी संबंधित पहचानों के बारे में क्यों क्षमप्रार्थी रहें? मुसलमान किसी देश या क्षेत्र में भले ही अल्पसंख्यक हों पर वो जनसांख्यिकीय खतरे का भय पैदा करते हैं. दूसरी तरफ़ मुसलमान ख़ुद से भिन्न किसी भी प्रमुख राजनीतिक, सांस्कृतिक और जातीय समूहों भयभीत रहते हैं.

एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात वो इस लेख में लिखते हैं कि लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों में मुस्लिमों को उदारवादियों का समर्थन रहता है. पर उदारवाद का यह समर्थन कहीं नहीं दोमुँहापन है. उदारवाद के सिद्धांत यह तो सब पर लागू होते हैं या फिर किसी पर नहीं.

अगर भारत देश की ही बात करें तो लिबरल समाज मुस्लिम समाज की कुरितियों को ढँकने का काम शुरू से करते आया है. जहाँ एक तरफ़ लिबरल समाज हिंदुओं के हर एक रीति रिवाज को रूढ़िवादी क़रार देकर उनमें बदलाव की माँग करता है, वहीं इस्लाम में किसी भी बुराई को नज़रंदाज़ करना ही ठीक समझता है. ट्रिपल तलाक़ फ़ैसले के वक़्त लिबरल समाज इस फ़ैसले का सम्मान करने की बजाय भाजपा पर मुस्लिमों को नियंत्रित करने और उनके मज़हब में हस्तक्षेप करने की बात कह रहा था. यह दोमुँहापन कहीं ना कहीं लिबरल और मुस्लिम समाज दोनो पर प्रश्न खड़े करता है.

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Rashmi Singh
Writer by fluke, started with faking news continuing the journey with Lopak.

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