शिक्षा सुधार हों सरकार की प्राथमिकता

नयी सरकार के एजेंडा की खूब चर्चाएं होती है लेकिन शिक्षा पर कम ही बातें होती हैं. शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है लेकिन इस क्षेत्र में पिछली सरकारों द्वारा शायद ही कोई गंभीर कार्य हुआ है. पिछले किसी मंत्री या पिछली नीतियों की आलोचना किए बिना मैं शिक्षा में किए जाने वाले कुछ सुधारों का प्रस्ताव करता हूँ जिस पर यह सरकार अपने कार्यकाल में विचार कर सकती है.  

सिर्फ संबंधित नीति नियन्ता ही नहीं, बल्कि दुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर प्रभावशाली दक्षिणपंथी लोगों ने भी खुद को एक’मैयोपिक एजेंडे’ तक सीमित कर लिया है, जो ज्यादातर स्कूलों में राइट टू एजुकेशन और इतिहास के पाठ्यक्रम के पक्षपातपूर्ण और पूर्वाग्रही पहलुओं के इर्द-गिर्द घूम रहा है. इन मुद्दों के महत्व से इनकार नहीं करते हुए, भारतीय शिक्षा प्रणाली में और अधिक महत्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है, जो भारत को एक सच्ची वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा के अनुरूप होगा.

सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण है भारत में सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का पुनरोद्धार. आज तक कोई भी महान राष्ट्र निजी शिक्षा प्रणाली की नींव पर नहीं बना है. खासकर, भारत में जिस तरह का प्रचलन है, एक क्षेत्र के रूप में शिक्षा के पास व्यावसायिक मामला नहीं है. एकमात्र तरीका वाणिज्यिक और अर्ध-वाणिज्यिक (शिक्षा ट्रस्टों के रूप में) इकाइयां मुनाफे में बदल सकती हैं या लागत में कटौती करके और खराब गुणवत्ता वाली शिक्षा देने से, या फिर यह बहुत अधिक शुल्क वसूल कर वह बहुत कम लोगों तक पहुंच को सीमित करती है. इसे बदलने की जरूरत है. विशेष रूप से पहला खंड, जिसे अफोर्डेबल प्राइवेट स्कूल या एपीएस के रूप में वर्णित किया गया है.

सरकार को प्यूपिल प्रीमियम ग्रांट (PPG) और अन्य नवाचारों के माध्यम से सार्वजनिक शिक्षा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है.  यदि कॉरपोरेट सीएसआर फंड का उपयोग शौचालय निर्माण के लिए किया जा सकता है, तो उनका उपयोग सरकारी स्कूलों के पुनर्निर्माण के लिए भी किया जा सकता है. टियर फीस, शिक्षा बांड, एट सीटेरा जैसे विभिन्न विकल्प हैं जिनका उपयोग किया जा सकता है.

सीखने के गुणवत्ता भरे परिणामों की जरूरत है :

सिर्फ सरकारी स्कूल का आधारभूत ढांचा तैयार करना तब तक अच्छा नहीं होगा, जब तक वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षण परिणाम नहीं दे सकता.  वर्तमान सरकार को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इनमें से सबसे बुनियादी है, विभिन्न स्तरों पर योग्य शिक्षकों को शिखामित्रों या शिक्षाकर्मियों के स्थान पर लाना जो वर्तमान में दैनिक वेतन पर कार्यरत हैं. इन शिक्षकों के वेतन ग्रेड में बढ़ोतरी और पदोन्नति स्कूल के समग्र प्रदर्शन और उनके द्वारा सिखाई जाने वाली कक्षाओं पर आधारित होनी चाहिए.

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तत्काल मानव संसाधन अंतर को पाटने के लिए, सरकार को 75साल से कम उम्र के सेवानिवृत्त कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों को फिर से नियोजित करने पर विचार करना चाहिए.

आज अधिकांश पेशेवर प्रवेश परीक्षाएं, इंजीनियरिंग, मेडिसिन या कानून के लिए होती हैं और ये केन्द्रीय स्तर पर होती हैं. फिर भी हमारे पास अभी भी विभिन्न राज्यों के पाठ्यक्रम हैं. हमें एक केंद्रीकृत पाठ्यक्रम और एक बोर्ड की आवश्यकता है जो राज्यो के इतिहास और क्षेत्रीय भाषाओं, वगैरह को शामिल करने के लिए लचीला हो.  यहां तर्क शिक्षा राज्य बोर्डों से हटाने का नहीं है,बल्कि शिक्षा में एकरूपता लाने और सभी राज्यों के छात्रों के लिए एक स्तर पर लाने का है.  एक सटीक उदाहरण पुलिस का मामला है.  हालांकि लॉ एंड ऑर्डर एक राज्य का विषय है, फिर भी यह एक सामान्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के दायरे में आता है.

आंकलन : 

एक सामान्य पाठ्यक्रम के साथ, हमें सभी स्तरों पर फॉर्मेटिव और योगात्मक आंकलन, दोनों के लिए सही रूपरेखा की आवश्यकता है. एक सामान्य बोर्ड और पाठ्यक्रम बनाते समय, योगात्मक आंकलन (अंतिम और बोर्ड परीक्षा एट सिटेरा) के मुद्दे को संबोधित करेंगे. एक मजबूत प्रारंभिक मूल्यांकन ढांचा वास्तव में सीखने के उद्देश्यों की डिलीवरी में सुधार और मूल्यांकन में मदद करेगा.

आरटीई को तर्कसंगत करने और भेदभाव को रोकने के अलावा,विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों की योग्यता, कॉस्ट ऑफ लिविंग एडजस्टमेंट (सीओएलए) के साथ पे-लाइन को तर्कसंगत बनाने के लिए मजबूत विनियमन की आवश्यकता है;  और इसलिए असंबद्ध स्कूलों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है.

वास्तव में यह एक लंबी क्रमिक प्रक्रिया है, लेकिन यह असंभव नहीं है.  अगर दूसरे देश ऐसा कर सकते हैं, तो भारत भी कर सकता है और बेहतर तरीके से कर सकता है.

Anurag Dixit
Founding Member Lopak - @bhootnath

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