प्रेस वार्ता में भी दिखी दो परस्पर विरोधी वैचारिक दलों के बीच मुद्दों की समानता, जो बहुत से लोगों की नज़रों से छूट गयी.

शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस, दोनों की ही प्रेस कांफ्रेंस थी. कहने सुनने के लिए बहुत से अवसर थे लेकिन एक बहुत बड़ा अंतर इन दोनों ही प्रेस कांफ्रेंसेस में दिखाई दिया. दोनो ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य मुद्दा नरेंद्र मोदी थे. ज़ाहिर सी बात है कि वह देश के प्रधानमंत्री हैं तो उनके लिए ज़्यादा लाइमलाइट होगी,लेकिन यह क्या पूर्णतया सच मान लिया जाए कि सत्ता के केंद्र में बैठे व्यक्ति द्वारा ही पूरा लाइमलाइट लिया जाता है? 

पिछले अनुभवों को देखें तो राजनीति का पिछले 5 साल से चला आ रहा दौर कुछ भिन्न नज़र आता है. इसके कई कारण हैं. मनमोहन सिंह को निशाने पर लेने से ज़्यादा गांधी परिवार विपक्ष द्वारा 2014 में निशाने पर लिया गया. इससे यह मिथक तो टूटता नज़र आता हैं कि सत्ता के केंद्र में संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति ही पूर्ण रूप से देश की सत्ता की धुरी नहीं होता, अपितु जिसके हाथ में ताकत होती है, वही राजनैतिक विषयों के निर्धारण में भी बड़ी भूमिका निभाता है. नरेंद्र मोदी के पास यह दोनों है. वो सत्ता के केंद्र में भी है , और शक्ति का संतुलन भी उनके पास है. यही कारण है कि वह भारतीय राजनीति में इतने बड़े नाम बन चुके हैं, लेकिन हम यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात कर रहे थे. यह भी देखने वाली बात है कि क्या इन दोनों ही वैचारिक रूप से मज़बूत दलों की राजनीति में एक बड़ा अंतर आ चुका है?

विपक्ष में बैठी पार्टियों के मुद्दे सत्ताधीशों से अलग ही रहते हैं,लेकिन जब सत्ता और विपक्ष का मुद्दा एक ही हो, और फिर भी वह एक दूसरे के समक्ष सत्ता के संतुलन के लिए भीषण राजनैतिक युद्ध के मध्य खड़े हो तो यह बहुत ही आश्चर्यजनक बात होती है. इस इलेक्शन में भी यही हो रहा है. जहां पक्ष का मुद्दा “मोदी लाओ” है तो विपक्ष “मोदी हटाओ” पर अपने घोड़े दौड़ा रहा है. यही बातें 2019 के चुनाव को और भी दिलचस्प बना देता है. कल की प्रेस वार्ता में भी जहां एक तरफ भाजपा के नेताओं द्वारा भाजपा के काम गिनाएं गए, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस वही पुरानी मोदी विरोधी धुरी पर घूम रही थी. तथ्यों के साथ छेड़छाड़ के चक्कर में खुद उनके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट से क्षमा मांग चुके हैं तो यह और भी दयनीय स्थिति इस देश के विपक्ष की हो गयी है.

दूसरी तरफ देश के प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल की पहली प्रेस वार्ता की और किसी सवाल का जवाब नहीं दिया, ऐसी बातें कहीं जा रही हैं. स्पष्ट रूप से देखें तो मीडिया जगत में भी वैचारिक रूप से दो फाड़ हैं. TRP हर जगह आवश्यक हैं, लेकिन विषयों की भिन्नता देश के चौथे स्तंभ की कार्यशैली में एक बड़ा बदलाव दिखा रहे है. अब जरा सोचकर देखिये कि कोई भी पत्रकार देश के प्रधानमंत्री से क्या सवाल पूछना चाहेगा. उदाहरण के तौर पर,यदि किसी देश का प्रधानमंत्री मीडिया से बात ही नहीं करे तो क्या वो कटघरे में खड़े किए जाने लायक नहीं है? लेकिन तब क्या हो जब हॉल में बैठे अधिकतर पत्रकार वो हो जिनको देश का प्रधानमंत्री पहले से ही अपने इंटरव्यू देकर उनके सवालों का जवाब दे चुका हो? कल भी हॉल में ऐसे ही पत्रकारों की टोली बैठी हुई थी जिनको मोदी पहले ही इंटरव्यू दे चुके हैं.

अब सवाल खड़ा होता है कड़वे सवालों और उसकी लिस्ट का. यह तो बड़ी घनघोर विडंबना हो जाती है कि जिस मीडिया से देश का विपक्ष कड़वे सवाल पूछने की बात करता है, उसी मीडिया के एक हिस्से द्वारा लिए गए इंटरव्यू पर वो विश्वसनीयता के गंभीर प्रश्न उठाया करता है. उसका कहना है कि टीवी इंटरव्यू पहले से ही फिक्स होते हैं. इसका मतलब यह बनता है कि सोनिया गांधी,राजीव गांधी, राहुल गांधी, इंदिरा गांधी, नेहरू, इत्यादि राजनेताओ की स्क्रिप्टेड बातें ही हमने आज तक अपने टीवी चैनलों पर देखें हैं. फिर तो मोदी से पहले इन विभूतियों या इनके समर्थको को इसका जवाब देना चाहिए. कांग्रेस की शब्दावली में यदि हम कहें तो स्क्रिप्टेड इंटरव्यू होने के बाद भी हमने राहुल गांधी को टाइम्स नाउ पर 2014 के भीतर अर्नब गोस्वामी के सामने असहज होते देखा था. अब आप खुद ही तय करिये की स्थितियां क्या हैं.

प्रधानमंत्री द्वारा सवालों के जवाब में वहीं बातें बोली जाती तो उन्होंने अपने द्वारा दिये इंटरव्यू में बोले हुए हैं. पूरी प्रेस वार्ता में सवाल भी वही पूछे गए थे. अब यदि आप इसको दो वैचारिक धुरी वाली पार्टियों के बीच सोच का अंतर, या समानता की तरह देखते हैं, तो आप इसको देख सकते हैं. वैसे भी मोदी-मोदी की आवाज़ें दोनों तरफ से आ रही हैं. अंतर बस इतना है कि एक पक्ष को ‘भक्त’ की संज्ञा दी जा चुकी है और दूसरे का नामकरण नहीं हुआ.

1 Comment

  1. Avatar
    May 19, 2019 - 12:33 pm

    Howdy! Do you know if they make any plugins to safeguard against
    hackers? I’m kinda paranoid about losing
    everything I’ve worked hard on. Any tips?

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