इतिहास के झरोखे से भविष्य की छवि दिखाते चुनावी इंटरव्यू!

किसी प्रतिनिधि की क्षमता के ऊपर प्रश्न उठेंगे तब उसकी छवि को न्यूज़ चैनल के डिबेट्स और इंटरव्यू के पैमाने पर ही मापा जाएगा. कोई भी प्रतिनिधि कितने बड़े स्तर पर अपनी जनता को लाभान्वित कर सकता है, उसका विज़न क्या है, उसके कार्यक्षेत्र के भीतर वो कैसे बेहतर नतीजे दे सकता है, इन सबका अंदाज़ा आप टीवी चैनल इंटरव्यू से लगा सकते हैं.

2014 और 2019 के बीच में बहुत कुछ बदल चुका है. कई बड़े पत्रकारों की छवि पर लिपटा हुआ निष्पक्षता का कच्चा धागा खुल चुका है. इस बीच पिछले लोकसभा चुनावों के इंटरव्यू पर ध्यान देना आवश्यक है. वह समय जब देश में एक मोदी लहर थी. सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार था और सबसे अधिक चर्चित व्यक्ति नरेंद्र मोदी ही थे. लेकिन उस समय भी एक अप्रत्यक्ष युद्ध मोदी और राहुल के बीच चल रहा था. कांग्रेस के वार मोदी के प्रति जितने कटु और मर्यादाविहीन होते जा रहे थे, मोदी के जवाब भी उतने ही कटु थे, लेकिन वह उस ‘कटाक्ष’ के मखमल में लपेटना कभी न भूलें.

उस समय टाइम्स नाउ के दो इंटरव्यू बहुत प्रचलित हुए. दोनों ही अर्नब गोस्वामी के लिए हुए साक्षात्कार ही थे. यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि हम कहें कि गोस्वामी उस समय निष्पक्षता के एक पैमाने माने जाते थे. हिंदी मीडिया चैनल के एक तथाकथित ‘निष्पक्ष’ पत्रकार (जो पार्ट टाइम नैतिक ज्ञान भी देते हैं) उस समय अर्नब के साथ ही कंपीटिशन में नेक-टू-नेक थे. अर्नब ने मोदी और राहुल, दोनों का ही इंटरव्यू लिया. आश्चर्य यह रहा कि दोनों ही साक्षात्कारों को भाजपा के कार्यकर्ताओं ने उपयोग किया, और कांग्रेस ने किनारा किया. मोदी के लिए चुनावी हवा बनाने हेतु यह साक्षात्कार अंतिम समय में मारा एक सटीक तीर साबित होने जैसा था.

राहुल का इंटरव्यू जहां लोगों को ‘रटा-रटाया’  और बोरियत से परिपूर्ण लगा, वहीं पहली बार किसी राष्ट्रीय नेता द्वारा अर्नब गोस्वामी को बैकफुट पर धकेलते देख लोग हैरान भी थे. हम यहां अर्नब का सामाजिक और नैतिक चरित्र प्रमाण पत्र नहीं छाप रहे. बस उस समय के लोगों के अंदर के भावों को आपको याद दिला रहे हैं. राहुल गांधी आज भी अपनी धुरी से नहीं हटे. हां, ‘राफेल’ ने तत्कालीन ‘वीमेन एम्पावरमेंट’ की जगह अवश्य ले ली है. यही हाल मोदी का भी है. वह भी अपनी ही धुरी पर चल रहे हैं. अपितु वह तो अब भारतीय राजनीति की ही धुरी बन चुके हैं. कोई यह नहीं कह सकता कि मोदी सिर्फ किस्मत के कारण ऐसे लक्ष्य तक पहुंचे है. जिन्हें यह गफलत है, वो एकबार ज़रा मोदी की चुनावी यात्राओं और उनके इंटरव्यू को देख ले. फिर भी कोई संदेह बचे तो जा कर उनकी चुनावी सभाओं की गिनती कर लें. गिनती करते समय वो यह अवश्य ध्यान रखें कि मोदी भाजपा के एक कार्यकर्ता होने के साथ देश के प्रधानमंत्री भी हैं. ऐसी ऊर्जा बहुत कम नेताओं में देखने को मिलेगी. 

2019 का आखिरी चरण पूरा होते ही ओपिनियन/एग्जिट पोल्स का बाजार लग जायेगा. इन सबके बीच एक ही नाम उन पर भी हावी रहेगा और वो है नरेंद्र दामोदर दास मोदी. इस देश के विपक्ष को शायद इस समय EVM की खामियां ढूंढने से पहले अपने दल की खामियां देखने की ही आवश्यकता है. क्योंकि यदि वो मोदी के समक्ष एक चेहरा खड़ा करने में असमर्थ हो रहे हैं तो दुर्भाग्यवश उनका भविष्य खतरे में है. 

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