क्या राहुल गांधी के सामने झुक गया इंडिया टुडे?

कल राहुल गांधी द्वारा इंडिया टुडे को एक इंटरव्यू दिया गया. इंटरव्यू में क्या हुआ या क्या नहीं यह तो आप उसको देखने के बाद ही समझ पाएंगे, लेकिन सूत्रों के हवाले से खबर यह है कि राहुल गांधी अपने ही दिए गए इंटरव्यू से ज्यादा खुश नजर नहीं आ रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि इंडिया टुडे के एडिटर राज चैंगप्पा को दिए गए इंटरव्यू को देखने के बाद राहुल गांधी यह समझ गए कि उनसे इस इंटरव्यू में बहुत गलतियां हुई हैं.

इंटरव्यू खत्म होने के बाद राहुल गांधी ने राज चैंगप्पा और इंडिया टुडे ग्रुप से यह प्रार्थना की कि वह इस इंटरव्यू को टेलीकास्ट ना करें. वहां उपस्थित कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इंटरव्यू की कैसेट अपने पास रख ली. इसके बाद इंडिया टुडे ग्रुप इस इंटरव्यू का एक लिखित संस्करण जारी करने को राजी हुआ. ध्यान दीजिएगा कि इंटरव्यू वीडियो फॉरमैट का था लेकिन इसको लिखित संस्करण में प्रकाशित करने के लिए राहुल गांधी द्वारा दबाव बनाया गया.

इसमें भी इंडिया टुडे वालों से एक बड़ी गलती हो गई. दरअसल इंडिया टुडे वालों ने वीडियो का लिखित संस्करण प्रकाशित तो कर दिया लेकिन उसमें शब्दों के साथ भारी छेड़छाड़ पकड़ी गई है. यानी टेक्स्ट है, वीडियो गायब है.

राहुल गांधी से ज्यादा इंडिया टुडे ग्रुप यहां सवालों के कटघरे में खड़ा होता है. राहुल गांधी इस समय हो सकता है विचलित हो. कोई भी राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष अपनी पार्टी की ऐसी स्थिति देखकर विचलित हो सकता है. राहुल गांधी पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से भारतीय राजनीति में सक्सेसफुली लांच होने की बाट जोह रहे हैं. हालांकि अभी तक उनका सक्सेसफुल लॉन्च हो नहीं पाया है. उनके द्वारा यह बौखलाहट समझी जा सकती है. लेकिन इंडिया टुडे की क्या मजबूरी रही होगी. क्या यही निष्पक्ष पत्रकारिता का एक उदाहरण है.

यदि सूत्रों की खबरों को सही माने तो इंडिया टुडे ग्रुप कई सवालों के जवाब देने के लिए बाध्य होगा. पहला सवाल तो यह कि निष्पक्ष पत्रकारिता में किसी भी पार्टी के अध्यक्ष या देश के किसी भी नेता का इनफ्लुएंस नहीं होना चाहिए. यदि राहुल गांधी के कहने पर उस वीडियो संस्करण को हटाकर उसका लिखित संस्करण निकाला गया तो क्या यह पत्रकारिता के ऊपर दबाव नहीं है? क्या यह एक पार्टी द्वारा असहिष्णुता नहीं है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर कड़वे सवालों की बौछार करने वाले पत्रकारों को क्या इस प्रकार एक मुख्य विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष द्वारा किया गया कार्य स्वीकार्य होगा? जिस न्यूटन स्टैंडर्ड की बातें देश का मीडिया करता है क्या उस स्टैंडर्ड के हिसाब से यह कृत्य सही है?

दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी भी इसमें बराबर की भागीदार है. अब राहुल गांधी अपनी रैलियों में किस मुंह से लोगों को यह बताएंगे कि देश में लोकतंत्र नहीं है. जबकि वह खुद लोकतंत्र का सम्मान नहीं करते. किसी इंटरव्यू में अगर आप से गलती हुई है तो उसको स्वीकार करें और आगे बढ़े. क्या इस प्रकार से उस इंटरव्यू को अपने हिसाब से प्रभावित करना पत्रकारिता के ऊपर कुठाराघात नहीं है.

देश के तथाकथित सेक्युलर पत्रकार भी इस बात पर चुप है. टि्वटर पर आए दिन प्रधानमंत्री मोदी के छोटे से छोटे मंत्री द्वारा की गई किसी गलती को बड़ा बनाकर लेख छापने वाले लेखक गण भी अभी बहुत शांति के साथ लोकतंत्र पर हुए इस प्रहार को सह गए हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि यह प्रहार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के ऊपर हुआ है. जिसका वह प्रतिनिधित्व करते हैं. राहुल गांधी भविष्य में प्रधानमंत्री बने या फिर ना बने, लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनने से पहले एक बेहतर नेता बनकर दिखाना चाहिए.

यह माना जा सकता है कि उनके खिलाफ बहुत सारी बातें होती होंगी. वह नेता विपक्ष है तो जाहिर सी बात है राहुल गांधी के लिए स्थितियां आसान नहीं होंगी. लेकिन कठोर से कठोर स्थितियों से भी अपने आप को बाहर निकाल कर अपनी पार्टी को बेहतर स्थिति में लाने वाले नेता को ही हम एक मजबूत नेता कहते हैं. हमारे देश का प्रधानमंत्री पद एक मजबूत नेता का हकदार है.

यदि राहुल गांधी एक पत्रकार के सामने ही पिघल गए तो वह दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों के सामने आखिर क्या करेंगे. फिलहाल नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं. उनको उनके पद से हटाने के लिए राहुल गांधी मैदान में खड़े हैं. दो पहलवानों (कांग्रेस के लिए वह पहलवान ही हैं) की गुत्थम गुत्थी में कोई यह कह कर अपने आप को नहीं बचा सकता कि उससे गलती हो गई. प्रजातंत्र में जनता हर एक गलती की सजा देती है.

पत्रकारिता के साथ ऐसा व्यवहार कांग्रेस पार्टी का इतिहास रहा है. इमरजेंसी भी हमने कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में ही देखी थी. देखने वाली बात यह होगी कि अब भविष्य में राहुल गांधी इसका कैसे जवाब देते हैं. जवाब देते भी हैं या नहीं. कहीं इस बार भी उनको बचाने के लिए रणदीप सुरजेवाला को सामने ना आना पड़े. वैसे कांग्रेस पार्टी के एक समर्पित नेता होने के नाते रणदीप सुरजेवाला द्वारा राहुल गांधी को बचाया जाना कोई आश्चर्य की बात ना होगी.

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