दिल्ली में बुद्धिजीवियों को नींद से जगाती मरती हुई मानवता, ध्रुव राज त्यागी के जख्म मांगे सेक्युलरिज़्म से हिसाब!

दिल्ली की गलियां एक बार फिर से रक्तरंजित हो गई है. समाज के तमाशबीन लोगों के बीच एक ईमानदार व्यक्ति की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वह अपने घर की इज्जत को बचा रहा था. दिल्ली की यह घटना सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हो चुकी है लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया इस एक खबर से भाग रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति अब जैसे इस देश की सच्चाई बन चुकी है.

दिल्ली स्थित मोती नगर क्षेत्र के बसई दारापुर में एक व्यक्ति की चाकू घोंपकर हत्या कर दी गयी. इसमें मुख्यतः 4 आरोपी पकड़े गए. चारों ही एक विशेष समुदाय से आते हैं. उनमें से दो नाबालिग थे. दो आरोपियों के नाम मोहम्मद आलम और जहांगीर खान के रूप में सामने आए हैं. अब इससे पहले कि आप इस तर्क पर जाएं कि हम एक विशेष समुदाय को निशाना बना रहे हैं, आपको इस घटना के पीछे का कारण बताते हैं.

इस घटना में मृतक का नाम ध्रुव राज त्यागी के रूप में सामने आया है. उनकी आयु 51 वर्ष की थी. रविवार को वह अपनी बेटी और अपने बेटे के साथ अस्पताल से वापस आ रहे थे. रास्ते में इन युवकों ने उनकी बेटी की तरफ अश्लील हरकतें की। मौके की नजाकत को देखते हुए ध्रुव ने अपने बच्चों को सही सलामत घर ले जाना बेहतर समझा. घर पर छोड़ने के बाद वह वापस उन युवकों के घर पहुंच गए.

जाहिर सी बात है कि एक सभ्य समाज में आदमी शिकायत ही कर सकता है. यही ध्रुव से एक बड़ी गलती हो गई. शिकायत करने आये ध्रुव को देखते ही इन युवकों और उनके घर वालों ने उन पर चाकू और लाठी डंडों से हमला कर दिया. इसका पता लगने के बाद उनका बेटा अनमोल भी घटनास्थल पर पहुंच बीच बचाव के लिए आ गया. उसके ऊपर भी चाकू से हमला किया गया. आनन फानन में दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. दुर्भाग्यवश ध्रुव की मृत्यु हो गई. अनमोल इस समय जीवन मृत्यु के बीच में संघर्ष कर रहा है.

देश की राजधानी में इस प्रकार की घटना हो जाती है और हमारे देश के बुद्धिजीवी (जो उसी शहर में रहते हैं) इस पर ऐसी चुप्पी साध लेते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं. विचारधाराओं से मतभेद के कारण एक राजनैतिक विभूति को गोली मारने वाले व्यक्ति को आतंकवादी कह एक पुरे संप्रदाय को आतंकवाद के कटघरे में खड़ा कर देने वाले लोग भी अभी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि इन युवकों को आतंकवादी कहे या ना कहे.

यह सेकुलरवादी राजनीति का एक विभत्स्य चेहरा है. सोच कर देखिए कि एक आम नागरिक अपने घर की अस्मिता को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहा है. व्यक्ति के जीवन का कोई मोल आज के समाज में नहीं रह गया है.

इससे भी हृदय विदारक यह था कि घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने ध्रुव को बचाने की जगह वीडियो बनाना बेहतर समझा. क्या यह एक स्वस्थ समाज की वैचारिक मृत्यु है? समाज के अंदर आखिर ऐसा कौन सा भय व्याप्त है कि वह किसी मानव के जीवन को खतरे में देखने के बाद भी सहायता के लिए आगे नहीं आता. वीडियो बनाने वाले नैतिक रूप से ध्रुव की हत्या के उतने ही जिम्मेदार है जितने वह चार कातिल हैं.

अब जरा संप्रदाय को निशाना बनाने वाले तर्क पर आते हैं. दिल्ली का यह इलाका वह था जहां पर देश के बहुसंख्यक ‘अल्पसंख्यक’ हैं. यानी यहां एक ‘धर्म विशेष’ बहुसंख्यक के रूप में रह रहा है. अब इससे पहले कि इन आरोपियों को वैचारिक समर्थन देने के लिए ‘लैक ऑफ़ एजुकेशन’; ‘लैक ऑफ रिसोर्सेज’ जैसे तर्क दिए जाएं, हम यह आपको पहले ही बता दें कि गरीबी और पढ़ाई लिखाई में कमी अपराध करने के लाइसेंस नहीं होते. यदि ऐसा होता तो देश का एक बड़ा वर्ग अपराधी होता. अपराध एक ऐसी चीज है जो आपको शुरुआती समय में ही मिल जाती है. यह आपके सोचने के तरीके और परिवार की परवरिश पर निर्भर करता है. यह किसी ‘हाइपोथेटिकल सिचुएशन’ के अंदर हुई घटना नहीं है.

यह एक छेड़खानी की घटना है, जो विरोध करने पर हत्या की घटना बन गई और एक परिवार दुख में डूबा. इस घटना को हम ‘लिंचिंग’ का नाम भी दे सकते हैं. शायद इस शब्द का पिछले 5 सालों में एक धर्म विशेष के लोगों के लिए ही इस्तेमाल किया गया हो. अगर हमारे देश के बुद्धिजीवी ऐसी घटनाओं पर चुप हैं तो उनके ‘इंटेलेक्चुअलिज्म’ पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होना बनता है. देश के अवार्ड वापसी वाले भी इस समय कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं. यह पहली ऐसी घटना नहीं है जहां पर एक धर्म विशेष को बचाने के लिए इसको सामान्य घटना का चोगा ओढ़ाया जा रहा हो.

मीडिया में इसको ऐसे दिखाने का प्रयास किया जा रहा है जैसे यह कोई सामान्य घटना हो. असल में यह कोई सामान्य घटना नहीं बल्कि एक विशुद्ध सांप्रदायिक घटना है. इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा लीजिए कि पूरे इलाके में इस समय तनाव का माहौल है. भारी सुरक्षा बल की तैनाती इस इलाके में की गई है, ताकि कोई अप्रिय घटना ना घटे. देश के सेकुलर – वादी राजनीति करने वाले नेता इस घटना के ऊपर कुछ बोलने से भी डर रहे हैं. कितनों को तो यह पता ही नहीं है कि यह घटना दिल्ली के अंदर की है.

जबकि वह दिल्ली में ही अपनी राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं. 70 साल की राजनीति में, यह वह जहर है जो अब लोकतांत्रिक जड़ों तक पहुंच चुका है. इसी बीच वहां पुलिस ने आईपीसी 302 (हत्या), 506 (आपराधिक धमकी) और 509 (महिला का अपमान) के तहत केस दर्ज कर पड़ोसी मोहम्मद आलम (20 साल) और जहाँगीर खान (45 साल) को गिरफ़्तार कर लिया है. ये घटना मोती नगर पुलिस स्टेशन की है जहां यह केस दर्ज हुआ है.

मेन स्ट्रीम मीडिया में इसको एक सामान्य घटना की तरह दिखाना कितना जायज है? जहां कलबुर्गी, अखलाक और जुनैद की हत्या पर एक धर्म विशेष का नाम लेकर खबर बनाई गई, वहां ध्रुव की हत्या पर दूसरे धर्म विशेष के लोगों का नाम क्यों नहीं लिखा जा रहा? वैसे यह पत्रकारिता के नियम सिखाने वाली बात नहीं है. हम किसी पत्रकार को ‘किस प्रकार से पत्रकारिता करें ‘ यह भी सिखा नहीं रहे, लेकिन जब एक ही तरह की दो घटनाओं पर दो अलग प्रकार के रुख अख्तियार किए जाएं, तो सवाल उठते हैं.

ऐसे ही प्रशांत पुजारी और दिल्ली के ही रहने वाले अंकित की हत्या पर भी इंटेलेक्चुअल चुप्पी साध ली गई.दिल्ली के एक डॉक्टर को तो उसके क्लीनिक में घुसकर मारा गया लेकिन उस पर भी कोई बड़ी खबर नहीं बनती दिखाई दी. तीनों ही घटनाओं में हत्यारे एक धर्म विशेष के लोग थे लेकिन मजाल जो उनका नाम मेन स्ट्रीम मीडिया चैनलों के हेडलाइंस में आ जाए.?

यह समय शुतुरमुर्ग की गर्दन को वापस दोबारा खड़े करने की है. आने वाले खतरे से बचने के लिए आंख बंद कर लेना सिर्फ मूर्खों के उपाय होते हैं. खुद को बचाने के लिए आवाज उठानी पड़ती है. अपनी संवेदनाओं को मार देने वाली कौम सिर्फ़ एक जिंदा लाश की तरह ही अपना जीवन व्यतीत करती हुई दिखती हैं. अगर आपको ऐसे जीवन व्यतीत करना है तो आप एकदम सही रास्ते पर हो.

परंतु यदि आप अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने विचारों की कुछ त्रुटियों को दूर करना होगा. यह ‘अपोलॉजिस्टिक हिंदू’ वाला चोगा उतारना होगा.

हम यही आशा करते हैं कि अब देश के किसी भी इलाके में वैसे घटना ना हो जो ध्रुव के साथ हुई. लेकिन क्या मुंह बंद रख कर आप अपनी आवाज दूसरों तक पहुंचा सकते हैं? तार्किक रूप से तो असंभव ही है.

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