दिल्ली की शिक्षा क्रांति के दीपक तले घना अँधेरा (भाग -1 )

दिल्ली की शिक्षा क्रांति के बारे में हम सभी कई सालों से सुन रहे हैं. पहले मोहल्ला क्लिनिक और फिर दिल्ली के सरकारी स्कूलों की चमकती हुई तस्वीरें. शीशे के महलों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेकते और महलों में रहने वाले राजसी हों यह भी ज़रूरी नहीं. केजरीवाल सरकार ने सरकारी स्कूलों को महल जैसा तो बना दिया पर बच्चों को शायद पढ़ाना भूल गए.

इन चमचमाती तस्वीरों के पीछे का सच जो न आपको मीडिया बताएगी न ही शायद खुद अरविन्द केजरीवाल और उनके चेले. घोष्णापत्र में केजरीवाल ने कहा था की दिल्ली की शिक्षा को 26% बजट जो कि उनके मुताबिक देश में सबसे ज़्यादा शिक्षा बजट था.

हालाँकि वो यहाँ यह बताना भूल जाते हैं कि दिल्ली राजधानी होने के चलते सबसे ज़्यादा धन पाती है. दिल्ली का रेवेन्यू सरप्लस भी ज़्यादा है जहाँ कई और राज्य कर्ज़े में डूबे हैं.

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यह भी दिखाया देता है दिल्ली शिक्षा पर सबसे ज़्यादा खर्च करती है जो कि सत्य नहीं है. असल में कई ऐसे राज्य रह चुके हैं जो कि 20-30 प्रतिशत बजट शिक्षा को दे चुके हैं. आंकड़े देखे तो मेघालय ने 23.7 फीसदी शिक्षा को आवंटित किये हैं. आम आदमी पार्टी ने भले ही शिक्षा को प्रतिशत तो ज़्यादा दिया है पर खर्च बहुत कम किया. 2014-15, 15-16 , 16-17 में 62%, 57% और 79% ही खर्च किया है. बजट में आंकड़ा ज़्यादा दिखाया जाता है और रिवाइस्ड बजट में कम.

अगर पिछले वित्तीय वर्ष के आंकड़े देखे तो वे साफ़-साफ़ दर्शाते है कि कागज पर दिखाए आंकड़ों की असलियत कुछ और ही है. जनवरी, 2019 में शिक्षा के लिए आवंटित राशि की हालत देखिये 

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इन सब आकंड़ों से हटें तो ज़मीनी स्तर पर एक कड़वी सच्चाई सामने आती है. अगर आपकी सरकार इतना ही खर्च कर रही है तो सरकारी स्कूलों के नामांकन क्यों घट रहे हैं. 2016-17 से 2017-2018 के बीच 132138 विद्यार्थी कम हो गए.

इस अवधि में 8 % गिरावट आई. आठवीं में कक्षा 7 के97% बच्चे गए वही 9वीं में यही वर्ग 55% कम हो गया. सातवीं के 311824 में से केवल 138829 ही 9वीं में गए. वहीँ 11वी में एक तिहाई बच्चे फेल हो गए पर सरकार अच्छे परिणाम के आंकड़े दिखाकर वाहवाही लूट रही है .

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दिल्ली सरकार के इकोनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट भी यही कहती है कि प्राइवेट स्कूल में नामांकन बढ़ रहे हैं क्योंकि सरकारी स्कूल छोड़कर बच्चे प्राइवेट स्कूल में जा रहे हैं.

यह भी कहा जा रहा है दिल्ली सरकार बड़ी संख्या में बच्चों को स्कूल से दूर रखने की साज़िश रच रही है. जहाँ बड़ी संख्या में बच्चों को नौवीं से बारहवीं में पहुंचने ही नहीं दिया जा रहा. जो बच्चे फेल हो रहे हैं उन्हें दुबारा नामांकन ही नहीं लेने दिया जा रहा है. हो सकता है यह रणनीति की तहत किया जा रहा हो कि पढाई में कमज़ोर बच्चों को दूर ही रखा जाए ताकि परीक्षा परिणाम अच्छे दिखाए जा सकें.

नौवीं से बारहवीं के 66% या 155436 में से 102854 को बच्चों को नामांकन लेने नहीं दिया गया, ग्यारहवीं के 58%, बारहवीं 91% और नौवीं के 52% बच्चों को नामांकन लेने से वंचित कर दिया गया. जब एक अधिवक्ता के माध्यम से पेरेंट्स दिल्ली कोर्ट में यह बात लेकर पहुंचे तब जाकर यह विषय लोगों के ध्यान में आया.

ख़बर के अनुसार 10 वीं में फेल हुए 45,503 बच्चों को दुबारा नामांकन लेने से मना कर दिया था.

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क्रमश:…….


यह लेख पूर्णतः अभिषेक रंजन के रीसर्च ब्लॉग पर आधारित हैं, ज्यादा जानकारी के लिए अभिषेक रंजन से समपर्क करें

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