दिल्ली की शिक्षा क्रांति के दीपक तले घना अँधेरा – भाग 2

इस लेख का पहला भाग यह है.

दिल्ली सरकार अगर इतना ख़र्च कर रही है, आलीशान क्लासरूम बना रही है, बजट आवंटित कर रही है तो फिर इसका परिणाम क्या है? क्या बच्चों को इसका फ़ायदा मिल रहा है? या यह बस अख़बारों के पहले पन्नों में सरकार द्वारा दिए गए ऐड्ज़ में ही है.

दिल्ली का शैक्षणिक स्तर राष्ट्रीय औसत से बेहद कम है.

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सरकार द्वारा चलाये गए चुनौती कार्यक्रम के तहत कक्षा-9 में फेल हुए बच्चों को ‘विश्वास समूह’ के रूप में सीधे कक्षा-10 में पत्राचार कार्यक्रम के तहत शिफ्ट किया गया लेकिन 2016-17 में केवल 2 प्रतिशत छात्र ही पास हुए. वर्ष 2017-18 में दिल्ली के सरकारी स्कूलों से ड्राप आउट हुए बच्चों में से केवल 2% बच्चों ने ही यहाँ नामांकन लिया. गम्भीर बात यह है कि बीते 5 वर्षों में इसके तहत पास होने वाले बच्चों का प्रतिशत केवल 4% रहा है.

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क्या किसी नीति के तहत जानबूझ कर बच्चों को नामांकन देने से रोका जा रहा है?

दिल्ली में 10वीं में पास करने वाले विद्यार्थियों का औसत 2016-17 के 92.44% से गिरकर वर्ष 2017-18 में 68.90% पर आ जाता है. बड़ी संख्या में बच्चों को 9वीं एवं 11 वीं में फेल किया जा रहा है, वही 10वीं एवं 12 वीं में फेल हुए बच्चों को दुबारा नामांकन देने से रोकने की व्यवस्था बनाई हुई है ताकि परिणाम अच्छा दिखा सकें. आप सरकार बहाना दे रही है कि इस बुरे परिणाम के पीछे पाठ्यक्रम सीबीएससी होना कारण है पर माजरा कुछ और ही है.

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श्रेय ज़्यादा ज़िम्मेदारी कम

पूरी पार्टी ने कक्षा-12 के परिणाम में मामूली सुधार का श्रेय लुटने में काफी आगे रही. कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख छपवाए गए. लेकिन यह नहीं बताया की दसवीं के परिणाम ख़राब आए हैं.

द प्रिंट नामक पत्रिका ने एक रिपोर्ट में ख़ुलासा किया कि कैसे सरकार ने शिक्षा सुधारने का दिखावा किया .

https://theprint.in/india/governance/delhi-govt-schools-beat-private-schools-in-class-12-results-reason/65484/

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प्रजा फाउंडेशन द्वारा जारी किये रिपोर्ट में आप इसकी भयावहता का अंदाजा लगा सकते है. 2014-15 एक ही बैच के 1 लाख 45 हजार बच्चे नौंवी से बारहवीं तक आते तक शिक्षा-व्यवस्था से दूर हो जाते है. ग़ज़ब की
कि क्रांति है.

RTI से मिली जानकारी से यह जानकारी मिली कि केवल दो तिहाई स्कूलों में साइंस पढ़ने की व्यवस्था ही नहीं है.

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शिक्षा का दीया जलाने वालों के हालात

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 33,783 में 19243 पदों पर ही स्थाई नियुक्ति है, और लगभग 43% खाली पदों पर 8713 अस्थाई शिक्षक गेस्ट टीचर के रूप में नियुक्त है, बाकि के 17% पद खाली ही है.

विडम्बना यह है कि नियुक्ति में शामिल 77% गेस्ट टीचर परीक्षा पास करने के लिए जरुरी न्यूनतम अंक भी नही ला पाए. इस परीक्षा में 21135 गेस्ट टीचर शामिल हुए, लेकिन इनमें से 16383 गेस्ट टीचर फेल हो गए. जो ख़ुद पास नहीं हुए वो दूसरों को क्या शिक्षा दे रहे होंगे ज़रा सोचिए पढ़िए हाई कोर्ट में जमा किये गए जानकारी का हिस्सा

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चिंता की बात तो यह भी है कि 1100 स्कूलों में से 780 स्कूलों में कोई प्रिंसिपल नही है.

चमचमाते आलीशान क्लासरूम, पर सच्चाई क्या?

विधानसभा चुनाव के समय 500 स्कूल खोलने का वादा किया था. जिसे 4.5 सालों में पूरा तो क्या आधा भी नहीं किया जा सका है. केवल 5% प्रतिशत ही पूरा हुआ है जबकि दिल्ली सरकार के पास 82 प्लॉट ख़ाली हैं.

एक RTI के मुताबिक पिछले 4 सालों में 23 नए स्कूल खुले, जबकि केवल एक साल का कार्यकाल यानी कि 2013-14 यानी की शीला दीक्षित की सरकार के समय ही 12 स्कूल खोले गए थे. इस हिसाब से भी औसतन 3 सालो में 36 स्कूल खुलने चाहिए थे (2014-15 में राष्ट्रपति शासन था). जिन 23 नए स्कूलों की बात की गयी, पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह लवली की माने तो उनमे से 10 पिछली सरकार के समय की थी.

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अपने घोषणापत्र में आप ने यह उल्लेख किया है कि “….. सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्रदान करने के लिए जिस प्रकार के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरुरत है, उसे पूर्ण राज्य के दर्जे के बगैर पूरा कर पाना संभव नही है. दिल्ली सरकार के पास ज़मीन और शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति करने का अधिकार न होना इसमें सबसे बड़ी रुकावट है.”

अफ़सोस आप का पूर्ण राज्य न मिलने की वजह से इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी काम न होने के खोखले दावे की पोल उसके घोषणापत्र की पहली उपलब्धि में ही खुल जाती है. आप ने अपनी पहली उपलब्धि ही यह बताया है कि 2015 में दिल्ली सरकार में कुल 24157 कक्षाएं थी. तमाम रुकावटों के बावजूद दिल्ली सरकार ने 8213 नए क्लासरूम बनाये. नवंबर 2019 तक 12748 और नए नए क्लासरूम बनकर तैयार हो जायेंगे.

आखिर जब इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी काम करने के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा ही जरुरी था, फिर ये नए क्लासरूम किसने बनाये? 250 करोड़ रुपया ख़र्च कर आप कुछ 54 मॉडल स्कूलों के तस्वीरें दिखा कर क्रांति का दावा करती है पर इन मॉडल स्कूलों में भी भ्रष्टाचार की कई गंभीर शिकायतें है. यह अलग बात है कि हजार स्कूलों को दरकिनार कर पब्लिसिटी के लिए केवल चंद विद्यालय चुने गए और सरकार इन्ही स्कूलों को दिखाकर वाहवाही लुटती है.  

अब बात करे नए कमरे बनने की तो ये संख्या भी विवादास्पद है. आप का दावा, सरकारी आंकड़े और विपक्ष द्वारा दी जा रही जानकारी मेल ही नही खाते. इकॉनोमिक सर्वे में बताया गया कि वर्ष 2018-19 में 8095 अतिरिक्त कक्षाएं बनी, जबकि आप ने अपने घोषणापत्र में यह संख्या अधिक (8213) बताया है यानी 118 अधिक.

इकॉनोमिक सर्वे के आंकड़े, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से जुड़ी जानकारी साझा की गई है-

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वही बीते दिनों विजय गोयल ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर यह दावा किया कि केजरीवाल द्वारा यह कहना कि 8000 कमरे हमने बना दिए, सरासर झूठ है। इनमें से हजारों कमरे कम्पलीट ही नहीं हुए और जो बने हैं वे बिना नक्शे के खेल के मैदान में बना दिए गए। यमुना विहार में गवर्नमेंट बॉयज सीनियर सैकेंडरी स्कूल जनकल्याण पोर्टा केबिन में चल रहा है। इसकी गैलरी में भी बच्चे बैठे हुए हैं। इसकी जो पुरानी बिल्डिंग बन रही है, जिसमें 40 क्लास रूम चाहिए, उसमें केवल 16 क्लास रूम बन रहे हैं। यहां एक पारी में 1300 बच्चे पढ़ रहे हैं, जहाँ केवल टॉयलेट सिर्फ एक ही है।

आप सरकार को यह बताना चाहिए कि बीते 4.5 सालों में केवल 8000 कमरे ही क्यों बनवा सकी, जबकि अभी वह अगले 6 महीने में 12000 से ज्यादा कमरे बनवाने का दावा कर रही है. इतनी रफ़्तार पहले से कहाँ गायब थी? आख़िर जो सरकार अभी तक हर विकास कार्य में पूर्ण राज्य का दर्जा ना होने को रोड़ा बात रही थी वह अब अचानक इतने कमरे कैसे बना रही है.

यह लेख पूर्णतः अभिषेक रंजन के इस ब्लॉग पर आधारित है.


Rashmi Singh
Writer by fluke, started with faking news continuing the journey with Lopak.

4 Comments

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