देश के विपक्ष को फिर एकबार संदेश देता राजनीति के पितामह का ऐतिहासिक भाषण!

उस कालखंड को याद करिए जब अटल बिहारी वाजपई सदन में सोनिया गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों का उत्तर दे रहे थे. अपना जवाब देते हुए अटल बिहारी वाजपेई ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे सोनिया जी के सामने कोई शब्दकोश खोल कर रख दिया गया हो. चुन-चुनकर ‘इरिस्पांसिबल’, ‘इंसेंसिटिव’ और ‘इंकॉम्पेटेंट’ जैसे शब्द निकाले गए हो. उन्होंने सोनिया गांधी द्वारा किए गए कटाक्षों का भी जवाब देते हुए कहा कि राजनैतिक जीवन में आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले साथियों के लिए आपका यह मूल्यांकन है?

तत्कालीन राजनीति में भारतीय जनता पार्टी भले ही उतनी मजबूत ना हो जितनी आज है, लेकिन नेतृत्व क्षमता के मामले में भारतीय जनता पार्टी उस समय भी इतनी ही मजबूत थी, या शायद इससे भी ज़्यादा, क्योंकि उन्होंने इस देश में एक गठबंधन की सरकार चलाई थी. भारतीय राजनीति में गठबंधन की सरकार को पांच साल सफलता से चलाना हर किसी के बस की बात नहीं होती. विभिन्न विचारधाराओं को एक मंच पर लाने वाला व्यक्ति ही असल नेता होता है. इतनी प्रचण्ड जीत के बाद भी मंत्रिमंडल में NDA के अन्य साथियों को जगह देने की चर्चा है. नरेंद्र मोदी खुद अटल बिहारी वाजपेई को अपना गुरु मानते हैं.

इस देश की राजनीति ने अटल बिहारी वाजपेई जैसे वटवृक्ष को भारतीय राजनीति का पितामह जैसे उपाधियों से स्वयं ही सुशोभित किया है. लेकिन अटल जी की वह बात तत्कालीन राजनेताओं को उनके अहंकार को संभालने के लिए कही गई थी. दुर्भाग्यवश अटल जी के कालखंड में उन नेताओं का अहंकार नहीं टूटा. गठबंधन की बैसाखी पर राजनीति के सिंहासन पर विराजमान लोगों ने राजनीतिक शुचिता और शब्दों की मर्यादाओं को किनारे रखते हुए सिर्फ अंकगणित को ही सर्वोपरि माना. यही कारण था कि भारतीय जनता पार्टी 10 साल तक सत्ता से बाहर रही. इसी बीच अटल बिहारी वाजपेई ने भी राजनीति से संन्यास ले लिया. लेकिन पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण में भगवा लहराते हुए देखने का उनका सपना आज साकार हो गया है.

आज जब हम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को इतना मजबूत देखते हैं तो यह पाते हैं कि 1977 के कालखंड के बाद से लगातार चले आते हुए यज्ञ में मुरली मनोहर जोशी, अटल बिहारी वाजपेई, प्रमोद महाजन, और लालकृष्ण आडवाणी जैसी आहुतियां दी गई, जिसका प्रतिफल आज हम भगवा राज के रूप में देख रहे हैं. अपना पूरा जीवन भारतीय जनता पार्टी को इस स्तर तक लाने में बिता देने वाले इन नेताओं ने उस दौर को देखा है जब सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते कांग्रेस द्वारा अहंकार की पराकाष्ठा की गई. उस दौर में भी अटल जी के रूप में विपक्ष के पास एक सनातन नेता हुआ करता था. आज विभिन्न मीडिया चैनलों के स्टूडियो में जब हम यह बात सुनते हुए पाते हैं कि देश के लोकतंत्र के लिए एक कमजोर विपक्ष अच्छा नहीं है, तो हमें भी दुख होता है लेकिन कहीं ना कहीं अपनी इस हालत के लिए विपक्ष खुद जिम्मेदार है.

ऐसा नहीं कि नरेंद्र मोदी को अपना विपक्ष बिल्कुल भी पसंद नहीं. नरेंद्र मोदी के इसी कालखंड में हमने यह देखा कि किस प्रकार से विचारधाराओं में हज़ारों प्रकार की भिन्नता होने के पश्चात भी त्रिपुरा, उड़ीसा, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं में कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है. इसी कालखंड में हमने बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हठधर्मिता को भी देखा. जिसमें वह अपने राज्य के लोगों की आहुति देने को तैयार थी लेकिन केंद्र सरकार से सहायता लेने को तैयार नहीं थी. सत्ता का अहंकार उनके सिर पर तांडव कर रहा था. लेकिन चूंकि ममता उस सेक्युलर लॉबी का हिस्सा है जो सदैव भाजपा वाली राष्ट्रवाद की धारा से विपरीत चलती है, तो उनके ऊपर कोई प्रश्न नहीं उठाया गया.

सीधे तौर पर कहा जाए तो इस देश में एक सीधी लकीर खींच दी गई है. अब इस देश के अंदर विचारधाराओं का जमावड़ा नहीं है. यहां अब सिर्फ दो ही विचारधाराएं काम कर रही हैं. एक जो मोदी समर्थक है, दूसरी जो मोदी समर्थक नहीं है. अटल बिहारी वाजपेई ने भी शायद अपने कालखंड में ऐसी राजनीतिक सफलता प्राप्त नहीं की होगी, लेकिन अटल ने जो कमाया वह पूंजी किसी भी राजनीतिक गद्दी की तुलना में बहुत ऊंचा है. यह कहना बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि नरेंद्र मोदी टेक्नोलॉजी हैं, तो अटल बिहारी वाजपेई की राजनीति साइंस थी. 

निश्चित रूप से कमजोर विपक्ष हमारे देश के लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं, लेकिन इस देश के लोकतंत्र में जनता के बीच जाकर यदि आप उनकी समस्याओं को उठाने में असमर्थ निकलते हैं, तो इसी प्रकार के नतीजे आप को झेलने पड़ेंगे. 2014 के बाद 2019 में इतनी करारी हार झेलने के बाद देश के विपक्ष को यह समझना चाहिए कि अब उन्हें व्यक्तिगत कटुता को किनारे रखकर अपने क्षेत्र और राज्य के लोगों के हितों की चर्चा करनी चाहिए. नरेंद्र मोदी के 15 लाख के सूट, उनकी पत्नी और उनकी माताजी पर व्यक्तिगत कटाक्ष से दूर मुद्दों पर बात करनी चाहिए.

इस देश के लोकतंत्र ने ही नरेंद्र मोदी को इतना मजबूत मकाम हासिल कराया है. अटल बिहारी वाजपेई का वह कथन शायद अब सोनिया गांधी को समझ में आ रहा होगा. एक कालखंड में जिस राजनीतिक अहंकारवश केंद्र की सिरमौर बनी सोनिया गांधी ने अटल बिहारी वाजपेई को शब्दकोश से निकालकर अपशब्द बोले थे, आज देश की जनता द्वारा उनकी भविष्य की पीढ़ी के नेता को वही अपशब्द झेलने पड़े हैं. कांग्रेस आज विपक्ष के नेता का भी पद प्राप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी की दया को मजबूर है.

कांग्रेस पार्टी इस समय एक रिवाइवल की मोहताज है. अगर उसपर से परिवारवाद का फेविकोल नहीं हटाया गया, तो ऐसे ही असफलताओं को अपने ऊपर चिपकाती रहेगी. वैसे भी अरविंद केजरीवाल की स्थिति को देखकर कोई भी अब वैकल्पिक राजनीति को स्वीकार करना नहीं चाहता

3 Comments

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