अपने इमरान ‘साहब’ का प्रदर्शन देखिये लिबरल महोदय!

अभी गूगल बाबा की शरण में घूमते हुए हमें एक नए तथ्य का पता चला. ताजा खबर यह है कि गूगल बाबा बता रहे हैं कि $1 के मुकाबले पाकिस्तान का रुपया 141.50 रुपए तक गिर गया है. कहानी यह हो चुकी है कि भारत के मुकाबले पाकिस्तान का रुपया दुगनी रफ़्तार से नीचे गिर रहा है. दुनिया भर को अर्थ शास्त्र का ज्ञान पढ़ाने वाले पाकिस्तान के अर्थशास्त्री यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर उनकी इस दुर्गति का कारण क्या है.

हम ऐसा भी कह सकते हैं कि शायद वह यह समझ रहे हैं कि उनकी यह दुर्गति क्यों हुई है, लेकिन वह इस तथ्य को स्वीकार नहीं करना चाहते.

$1 के मुकाबले भारत का रुपया इस समय 69.35 के पास है. यह पाकिस्तान से करीब दोगुनी अच्छी स्थिति है. भारत की अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी है, उतना ही इसमें सुधार भी देखा जा रहा है. ‘मेक इन इंडिया ‘ के इनीशिएटिव ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाए हैं. भले ही यह समुद्र पुल बनाने में गिलहरी की तरह काम कर रहा है, लेकिन इसका अपना एक प्रभाव दिखाई दे रहा है.

एक साथ आजाद हुए दो देशों के बीच में अर्थव्यवस्था का ऐसा अंतर स्पष्ट रूप से दोनों के बीच की नीतियों की स्पष्टता को दर्शाता है. भारत में जहां शुरुआत से ही सकारात्मक रुख अपनाया वही पाकिस्तान की नीतियां हमेशा भारत विरोधी रही.

शायद यदि पाकिस्तान परमाणु बम की धमकियों से आगे सोच पाता तो उसे यह ज्ञात होता कि अर्थव्यवस्था के बिना उनके परमाणु बम भी खिलौने हैं. चलिए, शायद अब समझ जाएं.

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पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की ऐसी स्थिति हमारे देश के लिबरल लोगों को भी एक संदेश देती है. जरा याद करिए 2004 का वह समय जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी थी. उस समय डॉलर के मुकाबले रुपए की स्थिति आज से बेहतर थी.

जब नरेंद्र मोदी ने अपना पदभार संभाला तब डॉलर की कीमत रुपए के मुकाबले 70 के आसपास थी. यानी विरासत में मोदी को सिर्फ घोटाले ही नहीं बल्कि रुपये की खस्ता हालत भी मिली है. नरेंद्र मोदी ने यह स्थिति पिछले 4 साल से स्थिर रखी. यह अपने आप में एक उपलब्धि से कम नहीं है. यह बात अलग है कि हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी और लिबरल इसको मानने से इंकार कर रहे हैं.

दूसरी तरफ दबी जबान में (कभी-कभार तो खुलकर) यही लोग पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की जमकर तारीफ करते हैं. उनकी राजनीति, उनके संघर्ष और उनकी नीतियों की तारीफ करते हैं. आज भी वह इसी बात का तर्क दे सकते हैं कि पाकिस्तान की इस खराब अर्थव्यवस्था का जिम्मेदार नवाज शरीफ की सरकार है.

इमरान खान को आए तो अभी पूरा कार्यकाल भी समाप्त नहीं हुआ. विडंबना देखिये कि जो वैचारिक इम्यूनिटी वह इमरान खान पर दिखाते हैं, वह अपने ही देश के प्रधानमंत्री के ऊपर नहीं दिखाते हैं. यही एक कड़वी सच्चाई है. नरेंद्र मोदी के लिए कुछ लोगों के मन में जो कड़वाहट है वह अभी भी उनकी तर्कशील बुद्धि को चुनौती दे रही है.

स्वप्न से निकलकर सच्चाई के धरातल पर आइए बुद्धिजीवी महोदय! पाकिस्तान अपने अंत की कगार पर है.

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