16 मई 2014 का वो दिन, जब बदल गयी भारतीय राजनीति की धुरी!

आज की तारीख है 16 मई 2019. मात्र 5 साल पहले इसी दिन देश ने एक बड़ा चुनाव किया था. 5 साल पहले इसी दिन से हमारे देश की राजनैतिक व्यवस्था बदल गई. आज 5 साल बाद जब हम उस दिन को याद करते हैं, तथा तत्कालीन परिस्थितियों की आज की परिस्थितियों से तुलना करते हैं, तो हम यह पाते हैं कि इस एक कालखण्ड में और कुछ हुआ हो या ना हुआ हो, लेकिन राजनीति में एक बड़ा अंतर स्पष्ट हो चुका है. 5 साल पहले “मोदी को गुजरात के बाहर जानता ही कौन है” बोलने वाले आज स्वीकार कर चुके हैं कि नरेंद्र मोदी देश की राजनीति की एक धुरी है. वैसे वह यह स्वीकार नहीं भी करते तब भी सत्य वही रहता.

आप भारतीय राजनीति को चाहे कितनी भी अच्छी तरीके से जानते हो, लेकिन परंपरागत राजनीति को इन 5 सालों में सिर्फ चुनौती ही नहीं दी गई, बल्कि बदला भी गया है. 2014 के नतीजे स्पष्ट रूप से कई राजनैतिक विश्लेषकों को चौका गए. उन्हें यह तो पता था कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री उम्मीदवारी के लिए सबसे मजबूत राजनेता है, लेकिन उन्हें इस चीज का आभास नहीं था कि नरेंद्र मोदी जातिगत समीकरणों के परे अपनी सत्ता को हासिल करेंगे. पूरे 30 साल बाद देश के हर वर्ग ने एक व्यक्ति को चुना. इस बात को स्वीकार न करने वाले लोग अपने स्तर पर विभिन्न तर्क देते हैं. मुसलमानों की नाराजगी, 31% वोट शेयर इत्यादि उन्हीं कुछ व्यर्थ भरे तर्कों में से एक है. कहीं ना कहीं नरेंद्र मोदी के उदय के पीछे यह वैचारिक असहिष्णुता भी एक कारण थी. अपने प्रतिद्वंदी की जीत को स्वीकार न कर पाना कांग्रेस के लिए राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता से भी ज्यादा खतरनाक साबित हुआ.

इन 5 सालों में महात्मा गांधी के विचारों को पॉलिसी के रूप में तब्दील किया गया है. महात्मा गांधी कहां करते थे कि किसी सरकार की चुनौती कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति तक सुविधाओं का लाभ पहुंचाना होती है. नरेंद्र मोदी ने उसी कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति तक सरकारी सुविधाओं को मुहैया कराया है. चाहे वह उज्जवला के अंतर्गत मुफ्त गैस सिलेंडर देना हो, शौचालय निर्माण हो, बिजली की पहुंच हो, आवास हो, आयुष्मान योजना हो , मुद्रा योजना हो या फिर जनधन खाते. ऐसे कई प्रोग्राम चलाए गए जो गरीबों के हित के लिए थे. नोटबंदी और GST जैसे मज़बूत निर्णय लिए गए, तो वो भी पूरी दृढ़ता के साथ. क्या कोई इस बात को स्वीकार कर सकता है कि जिस देश के पास दुनिया की तीसरी सबसे मजबूत सेना है, वह देश अभी भी 75% से ज्यादा इलाके में सैनिटेशन कवरेज की बाट जोह रहा था. कोई स्वीकार नहीं कर सकता था कि हमारे देश के अंदर एक बड़ी संख्या में लोगों के पास उनका बैंक अकाउंट ही नहीं था. यह सत्य के धरातल पर एक बेहद ही कटु अनुभव था. गरीबों की तो बात ही क्या करें. इन सभी बुनियादी सुविधाओं का लाभ सभी लोगों तक पहुंचे, इसके लिए पिछले 70 साल में मजबूत कदम नहीं उठाए गए. अगर यह मजबूत कदम उठाए गए होते तो आज इन्हीं योजनाओं के दम पर नरेंद्र मोदी ज्यादातर राज्यों में अपनी सरकार ना बना पाए होते.

राजनैतिक रूप से तो एक बहुत ही नाटकीय परिवर्तन हुआ. इस नाटकीय परिवर्तन का एक उदाहरण आप बुआ और बबुआ के बीच का गठबंधन देख सकते हैं. लेकिन अगर मुद्दों की बात करें, तो इस बार के चुनाव में ज्यादातर वह मुद्दे उठाये ही नहीं जा रहे हैं, जिनके दम पर 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी थी. जैसे भ्रष्टाचार! 2019 का चुनाव इसलिए भी याद रखा जाएगा क्योंकि इस चुनाव में भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा था ही नहीं. वहीं अगर 2014 की बात करें तो पूरा चुनावी कैंपेन ही भ्रष्टाचार के ऊपर समर्पित था. यह तत्कालीन सरकार और वर्तमान सरकार के बीच का अंतर स्पष्ट दिखाता है.

यही नहीं, राजनैतिक रूप से अपने आप को मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी और अपने अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक के भारत को कवर करने का पूरा रोडमैप तैयार कर लिया. यानी असल में एक अखिल भारतीय पार्टी होने का तमगा हासिल कराने की भूख इन दोनों ही बड़े नेताओं में स्पष्ट दिखी. दूसरी तरफ कांग्रेस उन इलाकों से भी मात्र एक स्मृति बनती चली गई जहां उसकी जड़ें गहरी बताई जाती थी. अब स्थिति यह हो चुकी है कि अमेठी और रायबरेली जैसी सीटों पर भी कांग्रेस को एडी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है.

यह 2014 में देश के द्वारा किए गए चुनाव का नतीजा है. देश में आतंकवाद फैलाने वाले लोग 5 साल से नाकाम होते जा रहे हैं.सर्जिकल स्ट्राइक जैसे शब्द अब गर्व के ‘बैरोमीटर’ हो गए. देश के किसी भी राज्य के किसी भी शहर के अंदर कोई बम धमाका इन 5 सालों में नहीं हुआ. पिछली सरकारों में हमने 26/11 जैसी घटनाएं देखी थी. यही सारी बातें 2019 में नरेंद्र मोदी को एक बार फिर से एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में प्रदर्शित करती है.

2019 चुनावों का आखिरी चरण चल रहा है. 23 मई को यह पता चल जाएगा कि हमारे देश में अगली सरकार किसकी बन रही है, लेकिन इन 5 सालों के अंदर हुए बदलावों को जनता स्पष्ट रूप से महसूस कर रही है. अगर यह सत्य नहीं होता तो देश के विपक्ष को एकजुट होने की बात नहीं करनी पड़ती. यह सत्य है कि विपक्ष की एकजुटता जमीन पर दिखाई नहीं देती, क्योंकि अगर उत्तर प्रदेश को छोड़ दिया जाए तो कहीं भी महागठबंधन वाला फार्मूला जमीनी स्तर पर कार्य नहीं कर रहा. फिर भी नरेंद्र मोदी के नाम से विपक्ष का इतना डर यह साफ़ बताता है कि पुरानी जड़ों के कमजोर होने के बाद यह राजनीतिक पार्टियां कितना ‘इनसिक्योर’ महसूस कर रही हैं. 2014 की नकारात्मकता से 2019 को सकारात्मकता की कहानी इन्हीं 5 वर्षों में निहित है.

2 Comments

  1. Avatar
    May 16, 2019 - 10:35 pm

    And the cheats pass themselves off among the aforementioned.
    Ten decades past, Ming raised some start-up funding from his loved ones and opted to begin his own firm.
    They were rather powerful Martial King! http://ww88thai.com/forum/profile.php?id=542210

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  2. Avatar
    May 16, 2019 - 10:35 pm

    And the cheats pass themselves off among the aforementioned.
    Ten decades past, Ming raised some start-up
    funding from his loved ones and opted to begin his own firm.
    They were rather powerful Martial King! http://ww88thai.com/forum/profile.php?id=542210

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