वैशाखी

वैशाखी पर्व भारत के उन पर्वों में से एक है जिनका सम्बन्ध राष्ट्र के सुरक्षा और स्वतंत्रता के साथ है. नई फसल के स्वागत के साथ ग्रीष्म काल के अभिनन्दन के रूप में हर्षोल्लास से मनाये जाने वाले इस पर्व के साथ दो राष्ट्रीय महत्व के प्रसंग के जुड़ जाने से इसका महत्व राष्ट्रव्यापी हो गया है.

श्री गुरुगोविंद सिंह द्वारा भारत की सशस्त्र भुजा के रूप में खालसा पंथ की स्थापना और अमृतसर के जलियांवाला बाग में सैकड़ों स्वतंत्रता सैनानियों का सामूहिक बलिदान. इस लेख में हम खालसा पंथ पर चर्चा करेंगे.

पंजाब के आनंदपुर साहिब नामक स्थान पर लगभग एक लाख गुरुभक्तों के महासमागम में जब श्री गुरुगोविंद सिंह जी ने पांच शिष्यों के शीश मांगे तो सारा वातावरण सत्य श्री अकाल के जयकारों से गूंज उठा.  देश के कोने कोने से आये गुरु भक्तों में से पांच सिंह अपने शीश देने के लिए मंच पर आ गये.

श्री गुरु महाराज ने इन्हीं पांच शिष्यों के आधार पर एक विशाल राष्ट्रव्यापी खालसा पंथ की स्थापना कर दी. स्थापना के समय ही श्री गुरु गोविन्द सिंह ने अपना ध्येय वाक्य घोषित कर दिया – सवा लाख से एक लडाऊं, तभी गोविन्द सिंह नाम कहाऊं.

दशमेश पिता गुरु गोविन्द सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना कोई नई कौम अथवा राष्ट्र बनाने के लिए नहीं हुई थी. इतिहास साक्षी है कि जब भी विदेशी और विधर्मी आक्रमणकारियों द्वारा भारत भूमि पर आक्रमण करने और यहाँ के जीवन मूल्यों को समाप्त करने का प्रयत्न किया गया तो हमारे यहाँ के आध्यात्मिक महापुरुषों ने आक्रमणकारियों के जुल्मों का सामना किया तथा जनता को जगाने और उसमे एकात्मता स्थापित करने के अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों का निर्वहन किया. खालसा पंथ की सृजना भी इसी उदेश्य हेतु हुई थी.

हमारे इतिहास में दो और भी प्रसंग आते है जब समाज में क्षात्र धर्म की अवधारणा की आवश्यकता पड़ी थी. एक समय यही क्षात्र धर्म सम्राट पुष्यमित्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ तथा दूसरे समय में समाज ने अपने आप को बप्पा रावल के रूप में उठाया.

भगवान राम से लेकर श्री गुरु गोविन्द सिंह तक हमारे राष्ट्र का इतिहास यही स्पष्ट करता है कि भक्ति आन्दोलन या संगठित शक्ति के माध्यम से क्षात्र शक्ति को जगाकर समाज को जिन्दा रखने की परंपरा सदैव रही है. 

श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी अन्य भारतीय महापुरुषों की भांति खालसा पंथ की स्थापना को ईश्वरीय कार्य की संज्ञा दी. हमारे देश की मान्यतानुसार जब भी पाप बढ़ने लगता है तो परमात्मा की योजनानुसार कोई राष्ट्रपुरुष उत्पन्न होता है.

उस महापुरुष के प्रयत्न से संगठित शक्ति का उदय होता है और धर्म की स्थापना होती है. खालसा पंथ के सृजन के समय श्री गुरु गोविन्द सिंह ने भी इसी ईश्वरीय कार्य की घोषणा की थी “आज्ञा भई अकाल की तभी चलायो पंथ”. गुरु गोविन्द सिंह ने यह भी कहा- 

खालसा प्रगटयो परमात्मन की मौज

खालसा अकाल पुरुख की फ़ौज

खालसा के सृजन के समय श्री गुरु ने पांच प्यारों के रूप में सारे देश की एकता का अनूठा संगठित स्वरुप प्रकट कर दिया. ये पांचो प्यारे देश के पांच कोने में से थे. एक लाहौर, दूसरा मेरठ, तीसरा कर्णाटक, चौथा द्वारका तथा पांचवां केरल से था. सारे भारत से असंख्य गुरु भक्त इस राष्ट्रीय उत्सव में आये थे. श्री गुरु के द्वारा दिया गया दर्शन कच्छ- कड़ा- कृपाण- कंघा- केस पूर्णतया भारतीय संस्कृति पर आधारित है.

उपनिषदों में समाज के कार्य के लिए तैयार हुई संगठित शक्ति को अमृत शक्ति पुत्र कहा गया है. श्री गुरु गोविन्द सिंह ने भी पांच प्यारों को अमृत छकाकर हिन्दू समाज का कायाकल्प करने हेतु खालसा पंथ बनाया.

अपने ही शिष्यों से अमृत पान ग्रहण करके श्री गुरूजी ने इस संस्था की सर्वकालिक श्रेष्ठता सिद्ध कर दी अर्थात मर्द अंगम्म्ड़ा…… वाहे वाहे गुरु गोबिन्द सिंह आपे गुर चेला. क्यूंकि श्री गुरु ने स्वयं अमृत सिद्धि करके अमृत दान दिया और उन्ही पांच शिष्यों के हाथों स्वयं अमृत पान किया, अत: यह खालसा पंथ आधुनिक प्रजातंत्र का भी प्रतीक है – हिन्दू की रक्षा, हिन्दू के लिए, हिन्दू के द्वारा.

खालसा पंथ में हिन्दू समाज के विविध वर्गों एवं वर्णों से लोगों को दीक्षित किया है. इसलिए यह खालसा पंथ सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है.

श्री गुरु गोविन्द सिंह ने अपने आप को भगवान राम के सूर्यवंश से जोड़ा है. उनकी आत्मकथा के अनुसार वेदी और सोढ़ी वंश दोनों का सम्बन्ध राम के पुत्र लव और कुश से है. दूसरी ओर श्री गुरु गोविन्द सिंह ने स्वयं को श्री कृष्ण की गीता के उस आश्वासन के साथ भी जोड़ा है.

परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम ।

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।

श्री गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी आत्माकथा विचित्र नाटक में कहा है:

या ही काज धरा हम जनमे

समझ लेहू साध सब मनमे

धरम चलावन संत उबारन

दुष्ट सभी को मूल उपारन

वैशाखी पर्व पर आनंदपुर साहिब में सृजित खालसा पंथ को वीरव्रती खालसा पंथ कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. कालांतर में इसी खालसा पंथ के शूरवीरों में से बंदा सिंह बहादुर (वीर बैरागी), सेनानायक बाबा दीप सिंह, सरदार श्याम सिंह अटारी वाले, महाराजा रणजीत सिंह और सरदार हरी सिंह नलवा जैसे शूरवीर उत्पन्न हुए, जिन्होंने कश्मीर से मुगलों का सर्वनाश करने से लेकर अफगानिस्तान तक पठानों को परास्त करते हुए काबुल और कंधार में भगवा धवज फहराया.

5 Comments

  1. Avatar
    May 30, 2019 - 12:45 am

    Wow, this article is pleasant, my sister is analyzing these things, so I am going to tell her.

    Reply
  2. Avatar
    May 30, 2019 - 4:34 am

    My brother recommended I might like this blog. He was totally right.

    This post truly made my day. You cann’t imagine just how
    much time I had spent for this information! Thanks!

    Reply
  3. Avatar
    June 1, 2019 - 5:40 am

    Good post however , I was wanting to know if you could write a litte more
    on this subject? I’d be very thankful if you could elaborate a little bit more.
    Thank you!

    Reply
  4. Avatar
    June 2, 2019 - 1:01 am

    This excellent website definitely has all the information I needed concerning this subject and didn’t know who to ask.

    Reply
  5. Avatar
    June 5, 2019 - 1:21 am

    Hi there, I found your web site via Google whilst looking
    for a comparable matter, your site came up, it looks great.
    I’ve bookmarked it in my google bookmarks.
    Hello there, just became alert to your blog via Google, and located that it’s truly informative.
    I’m going to watch out for brussels. I will appreciate if you continue this in future.
    Lots of other people shall be benefited out of your writing.
    Cheers!

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *