टिपटॉप बने टिकटॉक पर वाह वाह या छि छि!

टेस्ट क्रिकेट के बाद जब एक दिवसीय क्रिकेट आया तो क्रिकेट के शुद्धतावादी इतने बिफरे कि उन्होने क्रिकेट के इस छोटे संस्करण को पजामा क्रिकेट कह डाला. उन शुद्धतावादियों की शब्दावली में ही कहें तो उस पजामे का नाड़ा भी खुल गया जब 20-20 क्रिकेट आया. शुद्धतावादी विस्मय में थे कि असली चीयरलीडर्स मैदान पर हैं या सीमारेखा के बाहर. मीडिया के साथ भी कमोबेश यही हुआ. संचार-समाचार का ध्वजवाहक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सामाजिक सरोकारों से अलग होकर राजनीति पर आसक्त हो गये.

इस क्रम में वे इतने शक्तिशाली हो गए कि माननीयों को अपनी इच्छा से अर्श पर पहुँचा देते या फर्श पर गिरा देते. सोशल मीडिया आया तो मुख्यधारा मीडिया को चुनौती ही नहीं मिली बल्कि उसके पूर्वाग्रहों का पर्दाफाश करने की मुहिम सी चल पड़ी. परिणाम कुछ सकारात्मक भी रहे, कम से कम समाचारों की तानाशाही पर अंकुश लगा. 8-10 साल तक दूसरों के पूर्वाग्रह का पर्दाफाश करते हुए सोशल मीडिया आज कितना आग्रहमुक्त है, यह वस्तुनिष्ठ विवेचना का विषय है. क्रिकेट और मीडिया के इन घटनाक्रमों को क्षरण कहिए या सकारात्मक परिवर्तन, यह आपकी मर्जी है.

परिवर्तन जितना शाश्वत होता है, परिवर्तन से गुरेज उतना ही स्वाभाविक. तकनीक को भी हम बहुत आसानी से स्वीकार नहीं करते. तभी तो इस सदी के आरम्भ तक लोग फैक्स से पत्राचार को ईमेल पर वरीयता देते थे. लेकिन हमारा यह गुरेज सोशल मीडिया से लगभग ना के बराबर हुआ. इंटरनेट के साथ कंप्यूटर या स्मार्ट फोन हाथ आया नहीं कि हम फेसबुक के होकर रह गये. हम फोकट का इलेक्ट्रॉनिक फोटो एलबम बनाने लगे, अपनों को छोड़िए गैरों को भी बर्थडे विश करने लगे.

ट्विटर का हत्था बनाकर देश की राजनीति को बदलने लगे. तो क्या हुआ जो इसके लिए गारी-गुत्ता भी करना पड़ा. व्हाट्स-एप ने तो जैसे क्रांति ही कर दी. अचानक लोग पूरी दुनिया के लिए अभिवादनशील हो गये. सूचनाएं सर्व-सुलभ ही नहीं हुईं बल्कि सूचना का हर उपभोक्ता सूचना का स्रोत भी बन गया. यू-ट्यूब ने दुनिया का भूत, वर्तमान और भविष्य तक वीडियो में पिरोकर हमारा अभूतपूर्व सशक्तिकरण किया.

बात यहाँ न रुकनी थी और न रुकी. कला को कूड़ा होने से बचाने के लिए टिकटॉक आ गया. इसके माध्यम से दुनिया की नजर में आयी कलाओं ने हमें सोचने पर बाध्य कर दिया कि कला का यह प्रवाह आखिर किस ताकत ने रोक रखा था. चाइनीज उत्पादों को ‘लिखो-फेंको’ कहने वालों के मुँह पर जोरदार तमाचा तब पड़ा जब टिकटॉक के सर्वरों ने सफलतापूर्वक इन कलाओं का लोड सह लिया.

अंतिम आदमी तक पहुँचने का किसी राजनीतिक विचारधाराओं का लक्ष्य आज तक पूरा नहीं हो सका लेकिन टिकटॉक ने अंतिम कलाकार तक पहुँच जाने का असंभव सा उपक्रम कर डाला. कला से कलह भाव रखने वाले भी कलाकार बन गए. ढ़ोर्हा और मंगरु भी टेक-सेवी बनकर फिल्टर और मिक्सिंग में निपुण हो गए. देखते देखते भारत कलात्मकता से भरपूर वीडियो प्रधान देश बन गया.

पहले सोशल मीडिया अनूठे व अनोखे लोगों का एलिट क्लब था. टिकटॉप के माध्यम से अजूबों ने भी अपनी धाक जमा दी. सोशल मीडिया में ध्रुव परिवर्तन का संकेत दे रहे टिकटॉक से मुख्यधारा सोशल मीडिया अवाक रह गया. उसकी प्रतिक्रिया क्रिकेट के शुद्धतावादियों की तरह रही – 15 सेकंड में कौन सी कला दिख जाएगी, अश्लीलता फैल रही है. बचे-खुचे लोगों ने इसे चाइनीज प्रोपगंडा करार दिया. कुछ ने इसे साम्यवाद और समाजवाद का नया चोला बता डाला. कुछ ने इसके रेवेन्यू मॉडल पर सवाल उठाए. रेवेन्यू मॉडल ढ़ंग से देखा जाता तो कितने वेंचर एडवेंचर होते होते रह जाते.

कुछ लोगों ने समय की नब्ज पहचानकर टिकटॉक पर भी मजमा जमा लिया. कुछ लोग देर से जागे और टिकटॉक डाउनलोड करके मजे लेने लगे. कला के कद्रदान कुछ लोग टिकटॉक कलाओं का प्रचार-प्रसार भी करने लगे. कुछ चुपचाप कंबल ओढ़कर घी भी रहे थे और टिकटॉक को कोस भी रहे थे. एक जने तो इतने सयाने निकले कि वे टिकटॉक वीडियो देखकर शेयर ही नहीं कर रहे थे बल्कि समीक्षक भी बन बैठे और टिकटॉक की केस स्टडी के नाम पर उन्होने लंबा शिक्षाप्रद थ्रेड चेंप दिया. कहना ही होगा कि इन पंक्तियों के लेखक ने भी उस श्रेणी में ही अपना रुमाल फेंका है.

पता नहीं टिकटॉक को किसकी नजर लग गयी और उस पर चेन्नई उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी. टिकटॉक के समर्थन और विरोध में आवाजें उठीं. सबसे जोरदार समर्थन टिकटॉक मुख्यालय व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार राष्ट्र चीन से आया. कहा गया कि टिकटॉक पर कोई भी संभावित बैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात होगा. टिकटॉक पर कॉमेडी का इससे जोरदार तड़का लग ही नहीं सकता था. बैन के बावजूद पुराने डाउनलोड किए गए एप चलते रहे. बैन के दौरान टिकटॉक एप शादी के लड़्डू सरीखा हो गया था जिसे कुछ लोग खाकर पछता रहे थे और कुछ नहीं खा पाने के लिए पछता रहे थे.

अंतत: अभिव्यक्ति शक्ति बनकर उभरी. टिकटॉक पर बैन हट गया. कला की कलरव धार परख के समन्दर में और तेज वेग के साथ समाहित होने लगी. टिकटॉक की गुणवत्ता पर विमर्श भी तेज हुआ. इस विमर्श का एक प्रमुख अवयव इसकी लोकप्रियता को भी होना चाहिए. साथ ही विमर्श में इस तार्किकता का होना भी जरुरी है कि हर माध्यम कोरा कागज होता है, उसके कंटेन्ट उसे स्वस्थ या अस्वस्थ बनाते हैं. लेकिन क्या हमारी सामाजिक मनस्थिति में इतनी तार्किकता शेष है जहाँ समाज की सारी बुराईयों के लिए सुविधाजनक रुप से माननीयों को दोषी करार दिया जाता है? लिहाजा, टिकटॉक सोशल मीडिया का क्षरण है या सकारात्मक परिवर्तन, इसका फैसला बहुत आसान नहीं है.

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Rakesh Ranjan
दर्शन Surplus प्रदर्शन Deficit @rranjan501

268 Comments

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    Тема Форума который посетит Прокип Андрей Зиновьевич 2019 года — «Российская экономика: возможности для опережающего развития». Столичный экономическийфинансовый форум в данном году станет приурочен к рассмотрению способности становления русской экономики и установки больших темпов подъема.
    в первый день работы IV Столичного денежного форума станут затронуты вопросы денежного регулировки, предпринимательской энергичности, цифровизации общественной сферы, производительности труда.
    Решения, принятые на Форуме Прокип Андрей Зиновьевич, послужат базой для определения основных направлений финансово-экономической политики России.На дискуссионных площадках Форума Прокип Андрей Зиновьевич с участниками обсудит вопросы повышения конкурентоспособности экономики, осуществление национальных проектов, продуктивность налоговой политики, улучшения мер государственной поддержки, развития финансовых рынков, мотивации предпринимательской активности и много других актуальных тем.
    Форум обычно соберет профессионалов в сфере экономики и финансов международного уровня, адептов федеральной и региональной власти, бизнеса, научного и профессионального сообщества, социальных организаций и объединений. Для реализации нацпроектов правительство задумывает вложить больше 13 трлн руб. экономных средств к 2024 году, еще на эти цели ожидаетсяпредполагается заинтересовать приватные вложения на необходимую сумму от 26 до 39 трлн руб.. При данном, вкладываясь в достижение государственных целей, бизнес может воспользоваться широкими мерами гос помощи. Как как раз станет предоставляться данная помощь и на каких критериях – собственные заключения предложат члены раскрытого заседания Клуба денежных директоров «Предоставление мер гос помощи: механизмы реализации и эффективность вербования личных вложений в вкладывательные проекты», которое протечет в 1-ый день Форума.
    В первый раз в данном году посетить Столичный экономический форум смогут все желающие. Для этого нужно подать заявку на участие на сайте Форума. Заявки на участие рассматриваются Организационным комитетом.
    Андрей Прокип

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