तुम्हें आज सेल्स टैक्स ऑफ़िस जाना होगा

स्कूल से दफ़्तर पहुँचते ही नवरंग जी ने यह फ़रमान सुना दिया. बात 1986 की है. मेरा स्कूल व दफ़्तर साथ ही चलता था. नवरंग जी हमारे बड़े बाबू थे. हमें खाता-बही लिखना, हिसाब मिलाना आदि सिखाते थे. पसीने सुखाकर मैं उनसे मुख़ातिब हुआ और पूछा कि वहाँ जा कर करना क्या है? बैंकों मे मेरा आना जाना था, डिलर्स से तक़ाजे पर भी जाता था मैं पर सरकारी दफ़्तर मे किसी काम से पहली बार जाने का आदेश हुआ था. इसलिए मन मे थोड़ी घबराहट भी थी.

नवरंग जी ने काम समझा दिया; “आज हियरिंग है. यह रजिस्टर दिखा देना. दो फ़ोर्म अभी आए नहीं है, कह देना कि पार्टी को चिट्ठी लिखी हुई है और सबूत मे यह चिट्ठी की प्रतिलिपि दिखा देना. ध्यान रहे कि एसैसमेंट ऑर्डर ले कर ही आना.” मै निकलने लगा तो नवरंग जी ने कहा; “सेल्स टैक्स ऑफ़िसर पूछे कि मै क्यों नहीं आया तो बोल देना बेटी की सगाई के लिये लड़का देखने गये है.”

गरदन हिलाकर, मोटे रजिस्टरों को एक गठरी मे बँधवाकर और झाँके मे लदवाकर मैं सेल्स टैक्स ऑफिस रवाना हो गया. वहाँ रजिस्टरों का बोझ हमें ही ढोना था. इसलिए स्कूली यूनिफ़ॉर्म मे कूली की मानिंद साहब का कमरा खोज ही लिया. चपरासी ने विस्मय के साथ देखा, मानो मै राह भटककर ग़लत जगह आ गया हूँ. मैंने उसकी जिज्ञासा शांत करने के लिये या यह जानने के लिए कि सही जगह ही आया हूँ, पूछा; “घोष बाबू का कमरा यही है? मै फ़लाँ फ़लाँ कम्पनी से हियरिंग के लिये आया हूँ.” वह एक स्कूली छात्र (ग्यारहवी कक्षा का) को सरकारी दफ़्तर आया देखकर अभी भी भौंचक्का ही था. लेकिन उसे यह कम्फ़र्म हो गया कि मै सही जगह ही आया हूँ तो उसने अंदर जाने दिया.

सामने घोष बाबू एक भद्रलोक मानुष के साथ विराजमान थे. झक्क सफ़ेद कुर्ता और धोती (नब्बे के दशक तक कलकत्ता मे बाबू लोग धोती मे दिख जाया करते थे, अब शायद ग्लोबलाइज़ेशन ने रिवाज पूरी तरह ख़त्म कर दिया होगा.) पहने घोष बाबू का भी पहला रिएक्शन वही था जो चपरासी का था. फिर वह गदगद हो कर बोले; “एक यह छोटी उम्र मे काम सीख रहा है और हमारा बीए पास बेटा पाड़ा (मोहल्ला) क्लब मे बैठकर चेंगरों (आवारा) संग पूरे दिन अड्डा मारता है.”

घोष बाबू चुप हुए तो हमने वह दोहरा दिया जो नवरंग जी ने मुझे समझाकर भेजा था. घोष बाबू ने नवरंग जी के ना आने का कारण पूछा और हमने अक्षरश: वही बता दिया जो मुझे नवरंग जी ने सिखाया था. घोष बाबू आश्वस्त तो नही लगे पर बोले कुछ नहीं. उन्होंने बस इतना कहा; “एसेसमेंट ऑर्डर ले जाना.”

दस मिनट बाद चपरासी टिफिन के लिए गोल्ड स्पॉट की बोतल, संदेश (बंगाली मिठाई) और सिंघाड़ा (समोसा) लेकर आया जो मुझे भी परोसा गया. मुझे लगा कि कुछ ख़ास काम ही होता है यह हियरिंंग, तभी इतना आदर सत्कार है वरना फ़िल्मों मे तो सरकारी दफ़्तरों मे दुत्कार ही देखी थी. नाश्ता समाप्त होते ही घोष बाबू बोले; “ऑर्डर टाइप होने मे समय लगेगा, चलो तब तक सिगरेट पी आते है.” मै उन दिनों सिगरेट नहीं पीता था पर उनके साथ जाना पड़ा. 

पनवाड़ी की दुकान पर घोष बाबू ने 555 (उस समय की सबसे महँगी सिगरेट) का डिब्बा माँगा और मुझसे बोले; “इसे पचास रुपया दे दो.” 555 का डिब्बा एक जेब के हवाले करते हुए उन्होंने दूसरी जेब से नेवी कट का डिब्बा निकाला और उसमे से एक सिगरेट सुलगाकर धुआँ उड़ाने लगे. थोड़ी देर बाद हम वापस उनके दफ़्तर पंहुचे, एसेसमेंट ऑर्डर तैयार था.

घोष बाबू ने ऑर्डर पर अपने हाथ से चिड़िया बिठाई, चपरासी से मोहर लगवाई और मुझे ऑर्डर थमाते हुए ऑर्डर सा दिया; “नवरंग जी को बोलना कि आगे से तुम्हें नही भेजे.” मैने पूछा कि क्या मुझसे कोई ग़लती हुई तो उन्होंने कहा कि ऐसा नही है और धीरे से अपनी नाराज़गी का कारण बता दिये. मैंने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. रजिस्टर बाँधकर, एसेसमेंट ऑर्डर लेकर मैं चलने लगा तो चपरासी ने नाश्ता करवाने के पचास रुपये माँगे. यक़ीन हो गया कि हिंदी फ़िल्मों मे सरकारी दफ़्तरों के जो सीन होते है, वे सच ही होते हैं.

दफ़्तर लौटकर हमने नवरंग जी को एसेसमेंट ऑर्डर थमा दिया और हिसाब भी – कुल ख़र्च 125 रुपये. समझ मे नहींं आया कि वह ऑर्डर देखकर ज़्यादा खुश थे या हिसाब देेेखकर. वह आश्चर्य से बोले; “इतने सस्ते मे काम हो गया, मै जाता तो कम से कम तीन-साढ़े तीन सौ तो लग ही जाते.” हिसाब मेंं सिगरेट देखकर वह बोले कि घोष बाबू तुमसे पैसे नही माँग सकते थे, इसलिये उन्होने सिगरेट ख़रीदवा लिया. अब यह 555 का पैकेट पनवाड़ी को लौटाकर बदले मे तीन नेवी कट के पैकेट ले लेंगे. यह मेरे लिए दिन की दूसरी बार चौंकाने वाली बात थी. 

नवरंग जी ने कहा कि आगे से सेल्स टैक्स हियरिंग मे अब तुम ही जाना. मैंने कहा कि घोष बाबू का सख़्त आदेश है कि आगे से मै ना आऊँ. उन्होने सिर्फ़ आप को ही आने के लिये बोला है. मैने उन्हे यह भी बता दिया; “घोष बाबू को पता है कि आपकी एक ही बेटी है जिसकी शादी दो साल पहले ही हो गयी थी.” घोष बाबू के इस ख़ुलासे ने मुझे दिन में पहली बार चौंकाया था और अब नवरंग जी के चौंकने की बारी थी. सकुचाई मुस्कराहट के साथ वह बोले; “हाँ, यह तो मै भूल ही गया था कि बिटिया की शादी मे घोष बाबू भी आये थे.”

नवरंग जी व घोष बाबू के बीच इस शतरंज मे किसकी शह हुई और किसकी मात हुई, यह मै पाठकों पर छोड़ता हूँ पर सरकारी दफ़्तर का यह पहला अनुभव मुझे हमेशा याद रहेगा.


अनुभव सच्ची घटना पर आधारित है. पात्रों के नाम काल्पनिक है

Manu Bhai
शिक्षा से प्रमाणित लेखाकार, पेशे से प्रमाणित सलाहकार. स्थान से ख़ानाबदोश, भारत माँ की जय से पाये जोश. @manu_bajaj

11 Comments

  1. Avatar
    Amitesh Kishore
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    वाह मनुभाई, ऐसे संस्मरण अत्यंत दुर्लभ होते हैं। आभार।

    Reply
  2. Avatar
    पीयूष अग्रवाल
    April 23, 2019 - 3:42 pm

    वाह क्या सही लिखा है। ये सब हम भी झेल चुके है तो बेहतर समझ सकते है।

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